नेपाल में इन दिनों सोशल मीडिया पर एक अभियान जोर पकड़ रहा है—’ओली को गिरफ्तार करो’। यह अभियान विशेष रूप से युवा आंदोलनकारियों, जिन्हें मीडिया में Gen Z कहा गया है, के द्वारा संचालित दिखता है। ये युवा पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के विरुद्ध कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। गत दिनों नेपाल को अपनी गिरफ्त में लेकर सत्ता पलट कराने वाले युवाओं के आंदोलन के दौरान गोली चलने की खबरें भी सामने आई थीं। इस घटना ने देश में राजनीतिक और सामाजिक तनाव को और गहरा किया था। नेपाल की आंतरिक राजनीति में अचानक आए इस भूचाल के बाद, नेपाल में कमोबेश शांति तो है लेकिन कम्युनिस्ट नेता, कथित भ्रष्टाचारी ओली को अब कानून के हवाले किए जाने की मांग तेजी से उठ रही है।

पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली नेपाल के सबसे प्रभावशाली और सबसे विवादास्पद नेताओं में गिने जाते हैं। वह नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के वरिष्ठ नेता हैं और दो बार नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उनके कार्यकाल के दौरान विभिन्न प्रकार के विवाद सामने आए थे। ये विवाद कोविड-19 महामारी के प्रबंधन, संविधान में संशोधन या फिर राजनीतिक अस्थिरता के मुद्दे पर उठे थे। ओली पर ये आरोप भी लगे कि उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग किया और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर किया।
सोशल मीडिया पर इस संदर्भ में हुईं कुछ पोस्ट पर नजर डालें तो उनमें Gen Z के गुस्से की झलक मिलती है। सोशल मीडिया पर #ArrestKPOli, #ArrestRameshLekhak और #ArrestMurderers जैसे हैशटैग वायरल हो रहे हैं। इनका प्रयोग सोशल मीडिया पोस्टरों या पत्रकों में किया गया है जिनमें ओली और लेखाक को प्रदर्शनों के दौरान Gen Z आंदोलनकारियों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।
एक पोस्टर जिसमें ओली और लेखाक की फोटो है, उस पर लिखा है “Arrest the killers, or we will be forced to take action.”
इधर Gen‑Z आंदोलन के नेताओं ने एक प्रेस वार्ता में कहा है कि “ओली, लेखक, और मुख्य जिला अधिकारी छवी रिजाल” को गोलीबारी और मौतों के लिए गिरफ्तार किया जाना चाहिए।
उस हिमालयी देश में हाल ही में सोशल मीडिया पर शुरू हुआ यह ‘ओली को गिरफ्तार करो’ अभियान इस नाराजगी का डिजिटल स्वरूप है, जिसमें युवाओं ने सोशल मीडिया को माध्यम बनाकर अपनी आवाज बुलंद की है। इस अभियान को विशेष रूप से TikTok, Twitter (अब X) और Instagram पर जबरदस्त समर्थन मिल रहा है। इसका नेतृत्व पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करते हुए नेपाल की नई पीढ़ी कर रही है।
युवाओं का वह आंदोलन केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा। नेपाल के विभिन्न शहरों में युवाओं ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किए थे। कई जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं, जिसमें कथित रूप से गोलियां चलने की घटनाएं भी सामने आईं। हालांकि इस बात की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है कि गोली पुलिस की ओर से चली या किसी और ने चलाई, लेकिन इससे आंदोलन की गंभीरता और प्रशासन की प्रतिक्रिया पर सवाल जरूर उठे हैं।
हिंसा की उन घटनाओं ने सरकार की जवाबदेही और प्रेस की स्वतंत्रता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए हैं। कई प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों ने आरोप लगाया कि उन्हें डराने-धमकाने का प्रयास किया गया। इससे आंदोलन को और बल मिला और सरकार के खिलाफ आक्रोश और बढ़ता गया।
इस आंदोलन में सबसे खास बात रही Gen Z की भागीदारी। नेपाल की वर्तमान पीढ़ी इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से सूचनाओं तक त्वरित पहुंच रखती है और इसलिए वह अपने नेताओं से पारदर्शिता की मांग करती है।
ओली के खिलाफ यह नाराजगी केवल उनके राजनीतिक फैसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुरानी राजनीति के तौर-तरीकों के खिलाफ भी भीतर ही भीतर उबल रहे एक व्यापक असंतोष की भी प्रतीक है। युवाओं का मानना है कि जब तक नेताओं को उनके कार्यों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है।

अब तक केपी शर्मा ओली ने इस अभियान को सिरे से खारिज किया है और इसे राजनीतिक साजिश बताया है। उन्होंने कहा है कि यह अभियान उनकी छवि को धूमिल करने के लिए चलाया जा रहा है। वहीं, सरकार की ओर से भी कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है, सिवाय इसके कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है।
हालांकि, यदि सरकार इस आंदोलन को सिर्फ एक “सोशल मीडिया ट्रेंड” समझने की भूल करती है, तो यह उसके लिए भी भारी पड़ सकता है। क्योंकि अब यह केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था की जवाबदेही की मांग बन चुका है।
‘ओली को गिरफ्तार करो’ अभियान केवल एक राजनीतिक नेता के खिलाफ गुस्से का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह नेपाल की नई पीढ़ी की चेतना और सामाजिक जागरूकता का प्रतीक भी है। यह अभियान दिखाता है कि युवा अब राजनीति में किनारे पर बैठे दर्शक नहीं रहना चाहते। वे अपने नेताओं से ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा रखते हैं।
यदि नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लेती, तो आगे चलकर देश में बड़ी सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। बात केवल ओली की गिरफ्तारी की नहीं है, बल्कि राजनीति में नैतिकता की पुनर्स्थापना की भी एक पुरजोर पुकार है, जिसे अनसुना करना नेपाल के लोकतंत्र के लिए घातक हो सकता है।

















