भारत विश्व में कपास और जूट का सबसे बड़ा उत्पादक है, रेशम का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, और हथकरघा एवं हस्तशिल्प का एक वैश्विक केंद्र है। इन प्रमुख रेशों के अलावा, भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र कई विशिष्ट प्राकृतिक रेशों — जैसे एरी, मुगा, केला, रामी और बिच्छू घास (नेटल) — का घर है। ये रेशे पारिस्थितिकीय स्थिरता और सांस्कृतिक विरासत का सुंदर संगम हैं।
प्राकृतिक रेशों की वैश्विक संभावनाएँ और भारत की भूमिका
यद्यपि इन रेशों का उत्पादन सीमित है, परंतु इनका वैश्विक बाजार में अत्यधिक मूल्यवान उपयोग — जैसे सतत फैशन, मेडिकल टेक्सटाइल्स, जियोटेक्सटाइल्स और होम फर्निशिंग — के रूप में अपार संभावनाएँ हैं। ये रेशे भारत की परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) की सच्ची भावना का प्रतिनिधित्व करते हैं। समृद्ध जैव-विविधता और सशक्त सांस्कृतिक परंपराओं के साथ, भारत विश्व का सबसे विविधतापूर्ण वस्त्र उत्पादक देश बनने की दिशा में अग्रसर है।
सतत वस्त्रों की बढ़ती मांग और भारत का अवसर
पर्यावरण अनुकूल और परिपत्र वस्त्र समाधानों की वैश्विक मांग तीव्र गति से बढ़ रही है। अनुमान है कि आने वाले दशक में सतत वस्त्रों का वैश्विक बाजार 10 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का हो जाएगा। यह भारत के लिए घरेलू उद्यमों को सशक्त करने और प्राकृतिक रेशों पर आधारित नवाचार में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने का सुनहरा अवसर है।
सरकारी नीतियाँ और उद्यमिता को बढ़ावा
“वोकल फॉर लोकल”, “आत्मनिर्भर भारत” और “पीएम मित्र पार्क्स” जैसी सरकारी नीतियाँ इस दिशा में उद्यमिता, कौशल विकास और निर्यात के लिए सशक्त मार्गदर्शिका प्रदान कर रही हैं। ये नीतियाँ प्राकृतिक रेशों और हस्तनिर्मित उत्पादों को वैश्विक पहचान देने की दिशा में बड़ा कदम हैं।
राष्ट्रीय सम्मेलन : Weaving India Together
इसी परिप्रेक्ष्य में, आगामी राष्ट्रीय सम्मेलन — “Weaving India Together: Natural Fibres, Innovation and Livelihoods from the North East and Beyond” — भारत की समृद्ध वस्त्र परंपराओं को सतत विकास की राष्ट्रीय दृष्टि से जोड़ने वाला एक ऐतिहासिक आयोजन बनने जा रहा है। यह सम्मेलन मेघालय सरकार, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), वस्त्र मंत्रालय और दीनदयाल अनुसंधान संस्थान (DRI) के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।
प्राकृतिक रेशों और आत्मनिर्भर भारत का संगम
यह सम्मेलन जैविक वस्त्रों और प्राकृतिक रेशों की परिवर्तनकारी भूमिका को प्रदर्शित करेगा, जिससे “वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” के आह्वान को सशक्त किया जाएगा। भारत पहले से ही कपास, जूट और रेशम में अग्रणी है, और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के एरी, मुगा, रामी, केला तथा नेटल जैसे विशिष्ट रेशों को वैश्विक बाजार तक पहुँचाने की अपार संभावनाएँ हैं।
महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण आजीविका पर केंद्र
कार्यक्रम का एक प्रमुख केंद्र महिला सशक्तिकरण रहेगा, क्योंकि बुनाई और रेशा-आधारित उद्यम ग्रामीण एवं जनजातीय महिलाओं के लिए आजीविका, सांस्कृतिक निरंतरता और गरिमा के स्रोत हैं। यह सम्मेलन इन पहलों को केवल आर्थिक गतिविधियों के रूप में नहीं, बल्कि खुशी, जीवन संतोष और सतत आजीविका के प्रतीक के रूप में देखता है।
परिपत्र रेशा अर्थव्यवस्था और नवाचार
यह सम्मेलन “कचरे से संपदा” (Waste to Wealth), “मूल्य संवर्धन” (Value Addition), और “परिपत्र रेशा अर्थव्यवस्था” (Circular Fibre Economy) के मॉडल प्रस्तुत करेगा, जो पर्यावरणीय प्रभाव को घटाते हुए रोजगार और उद्यमिता के अवसर बढ़ाते हैं। परंपरा, संस्कृति और पारंपरिक कौशल को बढ़ावा देना इस संवाद का प्रमुख उद्देश्य है।
नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत का संगम
नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, उद्यमियों, शिल्पकारों और उद्योग के नेताओं को एक मंच पर लाकर यह सम्मेलन एक ऐसा मार्गचित्र तैयार करेगा, जहाँ प्राकृतिक रेशे आर्थिक विकास, समावेशी प्रगति और राष्ट्रीय गौरव के वाहक बनें — और भारत सतत वस्त्रों के क्षेत्र में विश्व नेतृत्व स्थापित करे।
सम्मेलन के प्रति जबरदस्त उत्साह और भागीदारी
सम्मेलन के प्रति पहले से ही जबरदस्त उत्साह और भागीदारी देखने को मिली है। लगभग 75–100 शिल्पकार, बुनकर और उद्यमी अपने कार्यों का प्रदर्शन करेंगे, जबकि 275 से अधिक प्रतिभागी कार्यक्रम के लिए पंजीकृत हो चुके हैं। कार्यक्रम की एक विशेष आकर्षण होगी राष्ट्रीय आइडियाथॉन प्रतियोगिता, जिसमें देशभर के छात्रों से 47 नवोन्मेषी स्टार्टअप विचार प्राप्त हुए हैं, जिनमें से 10 उत्कृष्ट विचार सम्मेलन में प्रस्तुत किए जाएंगे।











