गुजरात राज्य के काठियावाड़ क्षेत्र में एक छोटा-सा गांव है सरोदर। नवानगर के राजवंश की एक शाखा इस गांव में रहा करती थी। इसी शाखा से जुड़े महाराज रणजी का जन्म 1872 में हुआ था। वे शिक्षा प्राप्ति हेतु राजकोट गए।
वहां राजकुमार कॉलेज का छात्र रहते हुए रणजी ने क्रिकेट खेलना प्रारंभ किया। कुछ ही समय में उन्होंने बल्लेबाजी में दक्षता हासिल कर ली और एक उपयोगी गेंदबाज बन गए।
1892 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से रणजी इंग्लैंड रवाना हुए। उस समय उनकी आयु 20 वर्ष थी। कैम्ब्रिज में रहते हुए उन्होंने बड़ी लगन के साथ बल्लेबाजी का अभ्यास किया।
एक ब्रिटिश विश्वविद्यालय की ओर से क्रिकेट खेलने वाले रणजी प्रथम गैर-अंग्रेज खिलाड़ी थे। अपनी प्रथम झलक में ही उन्होंने दर्शकों को मुग्ध कर दिया था, जो यह देखने के लिए आतुर थे कि एक भारतीय किस प्रकार क्रिकेट खेलता है। रणजी ने 1895 में ससेक्स काउंटी के लिए क्रिकेट खेलना प्रारंभ किया था।
भारत के इस पहले क्रिकेट रत्न के नाम पर ही ‘रणजी ट्रॉफी’ का नाम रखा गया है। यह बात उस अभूतपूर्व उपलब्धि का स्मरण दिलाती है जिसने क्रिकेटरों की भावी पीढ़ियों के लिए दरवाजे खोले और आज भी इसे घरेलू खिलाड़ियों के लिए भारतीय टीम में जगह पाने का प्रवेश द्वार माना जाता है।

















