आदिशक्ति का गुप्त शक्तिपीठ: बड़ी खेरमाई मंदिर और जनजातीय संस्कृति की अनकही कहानी
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आदिशक्ति का गुप्त शक्तिपीठ: बड़ी खेरमाई मंदिर और जनजातीय संस्कृति की अनकही कहानी

जबलपुर में आदिशक्ति के 52वें गुप्त शक्तिपीठ बड़ी खेरमाई की पुनर्स्थापना महान् जनजातीय गोंड सम्राट संग्राम शाह ने करायी थी और जवारे विसर्जन की परम्परा को शिरोधार्य किया था।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Mahak Singh
Sep 28, 2025, 07:00 pm IST
in भारत
मां बड़ी खेरमाई

मां बड़ी खेरमाई

जबलपुर में आदिशक्ति के 52वें गुप्त शक्तिपीठ बड़ी खेरमाई की पुनर्स्थापना महान् जनजातीय गोंड सम्राट संग्राम शाह ने करायी थी और जवारे विसर्जन की परम्परा को शिरोधार्य किया था। सन् 1652 में गोंडवाना के राजा हृदय शाह ने बड़ी खेरमाई माता के लिए बाना पहना और चल समारोह को भव्यता प्रदान की थी। बड़ी खेरमाई मंदिर जनजातीय शक्तिपीठ ही नहीं वरन् हिन्दू संस्कृति का पवित्र तीर्थ भी है। तो फिर कौन जनजातियों को भड़काता है कि जनजातीय समाज में देवी की आराधना नहीं होती? क्या वामपंथी? क्या जय भीम – जय मीम? क्या ईसाई मिशनरीज? क्या तथाकथित सेक्युलर?

भारत का हृदय स्थल जबलपुर है, जहाँ जनजाति संस्कृति की आत्मा बसती है। यही वह नगर है जहां आज भी जनजातीय समाज हिंदू संस्कृति के ऐक्य भाव को समाहित कर मां भगवती की उपासना करते हैं। पूजन पद्धति भले ही अलग हो लेकिन ऐसे कई मंदिर शहर और आसपास विद्यमान हैं जहां सैकड़ों वर्षो से जनजाति अनवरत पूजन करने पहुंचते हैं।

जबलपुर की जनजातीय संस्कृति और खेरमाई माता का पूजन

देखा जाए तो जबलपुर की जनजातीय संस्कृति भारत के लिए एक उपहार है। यहां सैकड़ों वर्षो से खेरमाई माता का पूजन हिंदू-जनजातीय समाज मिलकर कर रहे हैं। जिसमें आज भी सनातन परंपरा का निर्वाह किया जाता है। गोंड संस्कृति में खेरमाई माता का पूजन वर्षों से किया जा रहा है। इन्हीं मंदिरों में हिंदू नवरात्र पर्व पर विशेष आराधना करने पहुंचते हैं। खेरमाई माता मंदिर को पहले खेरो माता के नाम से जाना जाता था। जो ग्राम देवी के रूप में पूजी जाती हैं।

वस्तुतः जनजातियों में खेरमाई को खेरदाई के रुप शिरोधार्य किया गया है। बसाहट के अनुसार मंदिरों की स्थापना भी बढ़ती गई। जबलपुर में मां बड़ी खेरमाई मंदिर भानतलैया और मां बूढ़ी खेरमाई (खेरदाई) मंदिर चार खंबा में सैकड़ों वर्षो से जनजाति और हिंदू मिलकर पूजन कर रहे हैं। धीरे-धीरे उपनगरीय क्षेत्रों में भी खेरमाई माता की स्थापना की गई जिसे अब छोटी खेरमाई मंदिर के नाम से जाना जाता है।

जनजाति और सनातन संस्कृति का संगम

भारत के मानचित्र पर जबलपुर केंद्र बिंदु तो है ही इसे जनजाति संस्कृति का केंद्र भी माना जाता है। यही वह शहर है जहां आज भी हिन्दू जनजाति समाज सनातन संस्कृति के मूल में होकर माँ दुर्गा की उपासना करते हैं। हिन्दू संस्कृति में जनजातीय समाज में बड़ा देव (फड़ा पेन )को मूल माना गया है, वही सनातन संस्कृति में महादेव के रूप में शिरोधार्य हैं। इसलिए दोनों सनातन धर्म का ही मूल स्वरुप हैं। देखा जाए तो जनजातीय और हिंदू संस्कृति किसी भी दृष्टिकोण से पृथक नहीं हैं।

भारतीय संस्कृति में देवी पूजा को मुख्य माना गया है और वही जनजातीय संस्कृति में प्रकृति पूजन के रुप शिरोधार्य है। यही कारण है कि जनजातीय प्रकृति की उपासना करते हुए वन प्रदेशों में रहे और शेष नगरीय क्षेत्रों में निवास करते हैं। संस्कारधानी को देखा जाए तो वह अपने आप में एक संस्कृति है। जहां सभी धर्म के लोग रहते हैं और यहां हर धर्म के उत्सव देखने मिलते हैं।इसलिए आचार्य विनोबा भावे ने इसे संस्कारधानी का नाम दिया। यह एक शाश्वत नगरी है।

जबलपुर में जनजातीय पूजा और ऐतिहासिक शक्तिपीठ का महत्व

जनजातीय प्रकृति पूजन को प्रधानता देते हैं लेकिन प्रकृति के तत्वों से ही मिलकर मूर्ति की स्थापना कर पूजन शुरू हुआ। शहर के बड़े प्राचीन मंदिरों की बात करें तो ये कहीं न कहीं जनजातीय संस्कृति से जुड़े हैं। यही कारण है कि जहां गोंड शासकों ने जहां शहर में कुआं, तालाब और बावड़ियों का निर्माण कर प्रकृति की उपासना की वहीं मंदिरों का भी जीर्णोद्धार कराकर संरक्षित किया।

ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भों में जबलपुर में भानतलैया स्थित बड़ी खेरमाई का मंदिर वस्तुतः देवी पुराण में वर्णित 52 वां गुप्त शक्तिपीठ है, जहाँ सती माता का निचला जबड़ा गिरा था। यद्यपि बड़ी खेरमाई की उपासना का इतिहास अति प्राचीन है परंतु शक्तिपीठ के रुप में मंदिर निर्माण कलचुरि वंश के राजा नरसिंह देव की माता अल्हण देवी ने कराया। कलचुरि काल के अवसान के बाद गोंडवाना साम्राज्य का उदय हुआ।

गोंडवाना में खेरमाई माँ की महिमा और ऐतिहासिक परंपराएं

सन् 1290 में कड़ा और मानिकपुर के तुर्क सूबेदार अलाउद्दीन खिलजी ने गोंडवाना साम्राज्य पर हमला कर दिया तत्कालीन गोंड राजा मदनशाह अचानक हमले के परास्त होकर, भानतलैया स्थित खेरमाई मां की शिला के पास बैठ गए। जहां उन्हें आध्यात्मिक अनुभूति हुई, पूजा के बाद उनमें अद्भुत शक्ति का संचार हुआ और मदनशाह ने तुर्क सेना पर आक्रमण कर अलाउद्दीन खिलजी को परास्त कर खदेड़ दिया। अतः यह कहना कि मदनशाह का युद्ध मुगलों से हुआ था, सर्वथा असत्य है क्योंकि मुगल सन् 1526 में आक्रांता के रुप में भारत आए थे। सन् 1480 में अमानदास गोंडवाना के महाप्रतापी सम्राट बने जो राजा संग्रामशाह के नाम से प्रसिद्ध हैं।

राजा संग्रामशाह ने बड़ी खेरमाई के शक्तिपीठ का कायाकल्प कराकर एक मढ़िया की स्थापना करायी। बड़ी खेरमाई की कृपा से राजा संग्रामशाह जीवन भर अपराजेय रहे। शहर अब महानगर हो गया है लेकिन आज भी मां खेरमाई (खेरदाई) का ग्राम देवी के रूप में पूजन किया जाता है।

सन् 1652 में गोंडवाना के महान् राजा हृदयशाह के समय से नवरात्रि में जवारा विसर्जन चल समारोह प्रारम्भ हुआ, तब से अब 373 वर्ष हो गए, यह महान् परंपरा अनवरत् रुप से जारी है। आदिशक्ति का सर्वव्यापीकरण विशेष कर महाकौशल , बुंदेलखंड और विंध्य में खेरमाई के रूप में हुआ है जो गोंडवाना में खेरदाई के रुप में शिरोधार्य है और जबलपुर के मंदिरों और अन्यत्र अधिष्ठानों में स्थापित खेरदाई की प्रतिमाएं नवरात्र पर्व में मां भगवती के विविध स्वरूपों में पूजनीय हैं। खेरमाई (खेरदाई) अपकारी शक्तियों से हमारी धरती के साथ सभी प्राणियों और वनस्पतियों की रक्षा करती हैं। जबलपुर में नवरात्र पर्व का यह अद्वैत भाव अद्भुत एवं अद्वितीय होने के साथ वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सम्पूर्ण भारत के लिए मार्गदर्शी भी है।

Topics: Sanatan cultureJabalpurTribal CultureGondwana EmpireBadi KhermaaiGupta ShaktipeethKing Sangram ShahKherdai MataHindu-Tribal ConfluenceHistory of ShaktipeethNavratriTribal Worship Tradition
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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