गत 23 सितंबर को बाराबंकी के बरेठी स्थित नारायण सेवा संस्थान द्वारा निर्मित लक्ष्मी नारायण मंदिर का लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि हमारे मंदिर मात्र पुण्य कमाने अर्थात् याचना के स्थान नहीं, बल्कि अन्तर्चेतना जागृति के केंद्र हैं।
एक मंदिर मनुष्य के अंदर की चेतना को जाग्रत रखने से लेकर दूसरे के कष्ट को दूर करने, लोगों की सेवा करने का भाव जगाता है। श्री दत्तात्रेय ने कोरोना महामारी का उल्लेख करते हुए कहा कि संकट काल में कई बार अच्छे काम भी सृजित हो जाते हैं। कुछ समय पूर्व मानवता के सामने आई महामारी कोरोना के समय कई संस्थाओं ने लोगों की सेवा करने और उन्हें रोजगार देने का काम किया।
संघ के स्वयंसेवकों ने भी उस समय लोगों की सेवा का काम किया। उसी से प्रेरणा लेकर कुछ समय बाद ‘नारायण संस्था’ बनी, जिसके परिसर में आज हम उपस्थित हैं।
उन्होंने कहा कि समाज में कार्य करने वाली कोई भी संस्था अपने बैंक खाते से नहीं, बल्कि उसको चलाने वालों के मन, बड़प्पन और कार्यों से बड़ी होती है। कोरोना काल से शुरू हुई यह संस्था न्यास बन गई, इस गांव में अन्यान्य कार्य करते हुए मंदिर स्थापना हुई।
उन्होंने मंदिर निर्माण का उल्लेख करते हुए कहा कि मंदिर अन्तर्चेतना जाग्रत करने के लिए हैं। किसी ने पूछा, ईश्वर जड़-चेतन में हैं, सर्वत्र हैं, तो मंदिर में जाकर ही पूजा क्यों करनी? तो एक भक्त ने उत्तर दिया कि आपकी साइकिल में हवा कम होती है तो आप पम्प से हवा क्यों भरते हैं?
हवा तो सर्वत्र है। ऐसे ही भगवान सर्वत्र हैं, लेकिन मंदिर आवश्यक है। मंदिर की कल्पना स्पष्ट है। ये जनमानस में शिल्पकलाओं के साैंदर्य और एकत्रीकरण का भाव जगाते हैं। हमारे मंदिर एकात्मकता के केंद्र हैं। मंदिर की स्थापना मात्र ईंट-पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि आगम शास्त्र के अनुरूप शास्त्रोक्त है। मंदिर व्यक्ति को परमेष्ठि से जोड़ने का काम करते हैं। इस अवसर पर अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ता और भक्त उपस्थित थे।

















