उबल उठा खैबर पख्तूनख्वा 'हत्यारी' पाकिस्तानी फौज के विरुद्ध, दुनिया के सामने गिड़गिड़ा रहे लोग-'हमारी मदद करो'
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उबल उठा खैबर पख्तूनख्वा ‘हत्यारी’ पाकिस्तानी फौज के विरुद्ध, दुनिया के सामने गिड़गिड़ा रहे लोग-‘हमारी मदद करो’

खैबर पख्तूनख्वा में जो हुआ, उसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। आतंकवाद से लड़ने के नाम पर फौज द्वारा अपने ही नागरिकों पर हमला करना न केवल अमानवीय है, बल्कि आगे यह पाकिस्तान की जड़ें हिलाने का भी सामर्थ्य रखता है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Sep 23, 2025, 07:32 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
Representational Image

Representational Image

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में पाकिस्तान की सेना ने जिस प्रकार सैन्य कार्रवाई करते हुए अपने देश के ही नागरिकों को मौत की नींद सुलाया है, उस घटना ने विकराल रूप ले लिया है। इस हमले में 30 से ज्यादा नागरिकों की मौत हुई है। इनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। जिन्ना का पूरा देश इस घटना से सकते में है। पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा नीतियों और फौज की रणनीति पर सवाल खड़े हुए हैं।

असल में पाकिस्तानी फौज ने खैबर पख्तूनख्वा में संदिग्ध आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई के नाम पर हवाई और जमीनी हमले किए थे। लेकिन इस ऑपरेशन का सबसे दर्दनाक पहलू यही रहा कि हमले में आम नागरिकों की बड़ी संख्या में मौत हुई है। बेकसूर महिलाएं और बच्चे मारे गए, कई घर बर्बाद हो गए। इस दर्दनाक घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगे। वीडियो में शवों और घायलों को देखकर जनता का गुस्सा खौल उठा है। यही वजह है कि वहां अब फौज की उस कार्रवाई को ‘आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई’ नहीं, बल्कि ‘नागरिकों पर अत्याचार’ के नाते देखा जा रहा है।

स्वाभाविक था कि उस घटना से पाकिस्तान के अंदर गुस्से की लहर पैदा हो। स्थानीय नेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने खुलकर पाकिस्तानी सेना और सरकार की आलोचना की है। ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर #StopKillingPashtuns और #HumanRightsInKP जैसे हैशटैग ट्रेंड हो रहे हैं। पाकिस्तान के लोगों का अपने ही देश की सरकार से इस कदर भरोसा उठ गया है कि जनता ने शवों और घायल नागरिकों की तस्वीरें दुनिया भर में साझा करके सबाक ध्यान इस हादसे की ओर खींचने और मदद करने की कोशिश की है।

आतंकी हमलों से बेहाल है खैबर पख्तूनख्वा (फाइल चित्र)

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब खैबर पख्तूनख्वा और इस्लामाबाद से शासित जनजातीय क्षेत्र (फाटा) में इस तरह की घटना हुई है। लंबे समय से स्थानीय जनता का आरोप रहा है कि पाकिस्तानी सेना ‘आतंकी संगठनों पर कार्रवाई’ के नाम पर आम लोगों को निशाना बना रही है। इससे स्थानीय जनता और फौज के बीच भरोसा उठता जा रहा है।

खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र दशकों से आतंकवाद, चरमपंथ और फौजी आपरेशन के केंद्र में रहा है। पूर्ववर्ती सोवियत-अफगान युद्ध से लेकर तालिबान के उदय तक, इस क्षेत्र ने हमेशा हिंसा और अस्थिरता ही देखी है। पाकिस्तान की सेना का अक्सर यह दावा रहता है कि वह आतंकवादियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ रही है, लेकिन असलियत यह है कि कई बार इन आपरेशन का खामियाजा बेकसूर नागरिकों को भुगतना पड़ा है।

पश्तून तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) जैसे आंदोलनों ने लगातार इस मुद्दे को उठाया है कि फौज के ‘क्लीन-अप ऑपरेशन’ असल में स्थानीय जनता को कुचलने और यातनाएं देने का जरिया बन गए हैं। इसी वजह से इस ताजा घटना के बाद सरकार और फौज पर कई सवाल उठे हैं। जैसे, क्या इस हमले से पूर्व प्राप्त हुई खुफिया जानकारी सही थी? यदि निशाना आतंकवादियों पर था तो इतने सारे नागरिक कैसे मारे गए?

वहां के लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही चल रहा है कि क्या सेना पर नागरिक हत्याओं के आरोप में कोई कार्रवाई होगी या हमेशा की तरह यह मामला भी कालीन के नीचे दबा दिया जाएगा? पाकिस्तान में सेना की ताकत लोकतांत्रिक संस्थाओं से कहीं बढ़कर है। यह घटना एक बार फिर यह साबित करती है कि सैन्य निर्णयों पर नागरिक सरकार का नियंत्रण लगभग न के बराबर है।

उधर अनेक मानवाधिकार संगठनों ने सेना की इस कार्रवाई की निंदा की है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी अपील की गई है कि पाकिस्तान पर दबाव बनाया जाए कि ऐसे ‘आपरेशन’ से बाज आए। संयुक्त राष्ट्र और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे संगठन संभवतः आने वाले दिनों में इस घटना पर कोई हरकत करें। स्थानीय कार्यकर्ताओं ने भी दुनिया के तमाम मानवाधिकार संगठनों से अपील की है कि वे पाकिस्तानी सेना की ऐसी कार्रवाइयों की स्वतंत्र जांच कराएं।

सवाल यह भी उठा है कि एक तरफ तो पाकिस्तान अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ‘कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन’ का मुद्दा उठाता है, लेकिन अपने ही नागरिकों पर अत्याचार करने की ऐसी घटनाएं होती हैं तो वह अपने गिरेबान में झांकने से बचता है। लेकिन एक बात तो पक्की है कि ताजा घटना पाकिस्तान की राजनीति को बड़े स्तर पर प्रभावित कर सकती है। विपक्षी दल इस मुद्दे को लेकर सरकार पर दबाव बना सकते हैं। साथ ही, सब जानते हैं कि खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे प्रांतों में अलगाववादी भावनाएं और मजबूत हो रही हैं।

खैबर पख्तूनख्वा में जो हुआ, उसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। आतंकवाद से लड़ने के नाम पर फौज द्वारा अपने ही नागरिकों पर हमला करना न केवल अमानवीय है, बल्कि आगे यह पाकिस्तान की जड़ें हिलाने का भी सामर्थ्य रखता है।

Topics: खैबर पख्तूनख्वाKhyber Pakhtunkhwaarmy attackपाकिस्तानPakistanbaluchistanबलूचिस्तानpashtun
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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