देवशिल्पी विश्वकर्मा: प्राचीन भारत के अद्वितीय अभियंता और चमत्कारी शिल्प विज्ञान के अप्रतिम प्रतीक
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देवशिल्पी विश्वकर्मा: प्राचीन भारत के अद्वितीय अभियंता और चमत्कारी शिल्प विज्ञान के अप्रतिम प्रतीक

ऋग्वेद में भी विश्वकर्मा विरचित अनेक प्रकार के विमानों का उल्लेख मिलता है। आर्य-अनार्य दोनों ही पक्षों द्वारा "शकुन", "सुन्दर", "त्रिपुर" एवं "रुक्म" सहित 25 तरह के विमानों के उपयोग का विवरण मिलता है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Sep 17, 2025, 10:57 am IST
inधर्म-संस्कृति
lord vishwakarma

lord vishwakarma

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में उल्लेख मिलता है कि देव शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया पुष्पक विमान मन की गति से चलने वाला तथा यात्रियों की संख्या के अनुसार अपने आकार को बड़ा व छोटा कर लेने वाला विमान था।मोर जैसी आकृति का यह आकाशचारी विमान अग्नि व वायु की समन्वयी ऊर्जा से चलता था। चालक की इच्छानुसार विमान की गति व दिशा को नियंत्रित किया जा सकता था। इसका आकार आवश्यकतानुसार छोटा व बड़ा किया जा सकता था। यह सभी ऋतुओं में आरामदायक यानी आधुनिक संदर्भों में कहें तो वातानुकूलित था। इस अद्भुत विमान की सीढियां, दरवाजे, खंभे व सिंहासन (कुर्सियां) व स्वर्णधातु से बने थे जिसमें मणि-मुक्तक जड़े थे। यह दिन और रात दोनों समय गतिमान रहने में समर्थ था। निर्मित पुष्पक विमान की सबसे अनोखी विशेषता थी कि वह उसी व्यक्ति से संचालित होता था, जिसने विमान संचालन मंत्र सिद्ध किया हो। रामायण का उपरोक्त विवरण देवशिल्पी के उन्नत प्रौद्योगिकी और वास्तुशिल्प की विशेषज्ञता का परिचय देता है।

ऋग्वेद में विश्वकर्मा विरचित अनेक प्रकार के विमानों का उल्लेख

स्कंद पुराण में उन्हें देवयानों का सृष्टा कहा गया है। ऋग्वेद में भी विश्वकर्मा विरचित अनेक प्रकार के विमानों का उल्लेख मिलता है। आर्य-अनार्य दोनों ही पक्षों द्वारा “शकुन”, “सुन्दर”, “त्रिपुर” एवं “रुक्म” सहित 25 तरह के विमानों के उपयोग का विवरण मिलता है। कहा जाता है कि “त्रिपुर” विमान तीन खण्डों (तल्लों) वाला था तथा जल, थल एवं नभ तीनों में विचरण कर सकता था।

जगन्नाथ मंदिर की अनुपम रचना पर मिली “शिल्पावतार” की उपाधि

विष्णु पुराण में उल्लेख है कि जगन्नाथ मंदिर की अनुपम शिल्प रचना से खुश होकर श्री हरि विष्णु ने उन्हें “शिल्पावतार” के रूप में सम्मानित किया था। ज्ञात हो कि विश्वकर्मा जी द्वारा निर्मित श्री जगन्नाथ मंदिर में मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। इसका कारण वैज्ञानिकों को भी हैरान करता है। मंदिर के मुख्य गुंबद की छाया कभी भी धरती पर नहीं पड़ती। किसी भी स्थान से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन नीलचक्र चक्र को देखें तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा। मंदिर की रसोई में प्रसाद बनाने के लिए काष्ठ की सात हांडियां एक-दूसरे के ऊपर रखी जाती हैं। इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है अर्थात सबसे ऊपर रखे पात्र का प्रसाद पहले पकता है। है न चमत्कार।

जल पर चलने योग्य खड़ाऊं समेत दिव्य अस्त्रों-आयुधों के निर्माता

स्कंद पुराण में उल्लेख है कि विश्वकर्मा जी जल, विद्युत, प्रकाश व परमाणु ऊर्जा के साथ वनस्पति व पर्यावरण विज्ञान के भी अनूठे विशेषज्ञ थे। उन्होंने ऐसे-ऐसे यंत्र उपकरणों का निर्माण किया था जिन्हें किसी चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता। विश्वकर्मा शिल्पशास्त्र के इतने बड़े मर्मज्ञ थे कि जल पर चल सकने योग्य खड़ाऊं बनाने की सामर्थ्य रखते थे। यही नहीं, पुरा भारतीय साहित्य में विश्वकर्मा जी द्वारा बनाये गये ऐसे अनेकनेक अस्त्रों-आयुधों व वैमानिक उपकरणों का भी उल्लेख मिलता है जो वर्तमान के अत्याधुनिक यांत्रिक युग के विशेषज्ञों को भी विस्मित कर देते हैं।

प्राचीन ग्रंथों में विश्वकर्मा जी अद्भुत उपलब्धियों का विवरण

पुरा भारतीय साहित्य के अध्येता डॉ. ओंकारनाथ श्रीवास्तव के अनुसार “विश्वकर्मा शिल्पशास्त्र” व “मयमतम्” पुरातन तकनीकी ज्ञान के अद्वितीय ग्रन्थ माने जाते हैं। इन ग्रंथों में इन्हें पदार्थ विज्ञान के आदि पुरोधा रूप में चित्रित किया गया है। पुरा साहित्य में विश्वकर्मा द्वारा निर्मित ऐसे अनेक रथों का भी विवरण मिलता है, जो वायुवेग से चलकर लक्ष्यभेद कर सकने में सक्षम थे। इनमें प्रमुख था अर्जुन का नन्दी घोष रथ। विभिन्न प्रकार के उपकरणों से सुसज्जित इस रथ में एक ऐसा अनोखा यंत्र लगा था, जो आसपास से महत्वपूर्ण सूचनाएं एकत्र करने में सक्षम था। इसी तरह अर्जुन का अक्षय तुणीर व द्रौपदी का अक्षयपात्र भी विश्वकर्मा के चमत्कारी निर्माण माने जाते हैं। इसी तरह चाहे श्री हरि विष्णु का सुदर्शन चक्र हो, इन्द्र का वज्र हो, शिवजी का त्रिशूल हो, मां दुर्गा का भाला हो, यमराज का कालदंड हो, हनुमान की गदा हो या फिर कर्ण के कवच-कुंडल; पौराणिक संदर्भ इन सबके निर्माण का श्रेय भी विश्वकर्मा को ही देते हैं। यही नहीं, प्राचीन काल में जब भी देवों व दानवों के मध्य संग्राम होता था तो भवन, आयुध व अन्य निर्माण कार्य का दायित्व भी विश्वकर्मा ही संभालते थे। यही नहीं, प्राचीन काल में जितने भी सुप्रसिद्ध नगर और राजधानियां थीं, उनके वास्तुकार विश्वकर्मा ही थे। देवराज इन्द्र की अमरावती, धर्मराज की यमपुरी, धनाध्यक्ष कुबेर की स्वर्णनगरी जो कालान्तर में असुरराज रावण की सुवर्ण लंका के नाम से लोकविख्यात हुई से लेकर भगवान श्रीकृष्ण की समुद्र के मध्य बसी अनूठी द्वारिका तथा पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ व सुदामापुरी जैसी सुंदरतम नगरियों का निर्माण देवशिल्पी ने ही किया था।

वास्तुकारों को चकित करते हैं पुरातात्विक उत्खनन

जानना दिलचस्प हो कि विश्वकर्मा जी की भवन निर्माण शैली की विषद वर्णन “मयशिल्पम” नामक ग्रन्थ में मिलता है। पुरातात्विक उत्खनन में मिले मय सभ्यता के अवशेष वर्तमान वास्तुकारों को चकित करते हैं। ज्ञात हो कि दक्षिण अमेरिका में पेरु से इक्वाडोर तक उत्खनन में मिले इन निर्माणों में सौ-सौ टन के शिलाखंड प्रयुक्त हुए थे। इन शिलाखंडों के बीच में किसी सीमेंट जैसी वस्तु के प्रयोग के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं। ये अवशेष इस बात के साक्षी हैं कि शिल्पकार की वास्तुविज्ञान संबंधी जानकारी कितनी उच्चकोटि की थी। राजा भोज कृत “समारांगण सूत्रधार” में विश्वकर्मा जी के खगोल, मृदा व शिल्पशास्त्र से संबंधित गहन ज्ञान का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इसी तरह “विश्वकर्मा प्रकाश” में देव शिल्पी की अनुपम वास्तु विद्या को गणतीय सूत्रों के आधार पर प्रमाणित किया गया है।

ब्रह्म पुराण में वर्णित भगवान विश्वकर्मा की वंशावली

हिन्दू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि के रचयिता प्रजापति ब्रह्मा का वंशज माना गया है। ब्रह्म पुराण में भगवान विश्वकर्मा के जन्म व वंशावली का रोचक विवरण मिलता है। ब्रह्मा के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तुदेव थे। जिन्हें शिल्पशास्त्र का आदि पुरुष माना जाता है। इन्हीं वास्तुदेव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा का जन्म हुआ। अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए विश्वकर्मा वास्तुकला के महान आचार्य बने। इनके पांच पुत्र हुए- मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ। इन पांचों पुत्रों को वास्तु शिल्प की अलग-अलग विधाओं में विशेषज्ञ माना जाता है। ब्रह्म पुराण में इनके पांच स्वरूपों विराटवंशी, धर्मवंशी, अंगिरावंशी, सुधन्वावंशी और भृगुवंशी विश्वकर्मा का उल्लेख मिलता है। इनके आधार पर शिल्प शास्त्र के प्रणेता विश्वकर्मा ऋषि को सभी प्रकार के वास्तु शिल्पों का भंडार माना जाता है जिन्होंने पदार्थों के आधार पर शिल्प विज्ञान को पांच प्रमुख धाराओं लौह, काष्ठ, ताम्र, प्रस्तर व हिरण्य (स्वर्ण) शिल्प में विभाजित कर मानव समुदाय को इनके ज्ञान से लाभान्वित किया। ऋग्वेद में भी विश्वकर्मा सूक्त के नाम से 11 ऋचाओं में इनका गुणगान मिलता है।

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