भारतीय संस्कृति हमें यह सिखाती है कि केवल आराधना ही नहीं, बल्कि श्रम और सृजन भी पूजा हैं। इसीलिए कहा गया है-“श्रम ही देव है, सृजन ही पूजा है, और जहाँ सृजन है, वहाँ विश्वकर्मा हैं।” यही भाव भगवान विश्वकर्मा के स्वरूप में प्रकट होता है। वे न केवल सृष्टि के प्रथम अभियंता और शिल्पवेद के अनन्त रचयिता माने जाते हैं, बल्कि मानव सभ्यता के तकनीकी, सांस्कृतिक और कलात्मक स्तंभ भी हैं।
ऋग्वेद के 10वें मंडल में विश्वकर्मा को सृष्टि का निर्माणकर्ता बताया गया है। उन्हें तीनों लोकों का शिल्पी कहा गया है। इंद्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पांडवपुरी, सुदामापुरी और शिवमंडलपुरी का निर्माण उनके अद्भुत शिल्प का उदाहरण है। उन्होंने पुष्पक विमान, देवताओं के भवन, अस्त्र-शस्त्र, कर्ण का कुण्डल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, शिव का त्रिशूल और इंद्र का वज्र निर्मित किया। यह सब प्रमाण हैं कि उनके बिना सभ्यता का कोई स्वरूप पूर्ण नहीं हो सकता।
भगवान विश्वकर्मा के पाँच स्वरूप और अवतार बताए गए हैं—विराट विश्वकर्मा (सृष्टि रचयिता), धर्मवंशी विश्वकर्मा (महान शिल्पी), अंगिरवंशी विश्वकर्मा, सुधन्वा विश्वकर्मा और भृगुवंशी विश्वकर्मा। वे पंचमुखी भी माने जाते हैं। उनके पूर्व मुख से सनाग, दक्षिण मुख से सनातन, पश्चिम मुख से अहमान, उत्तर मुख से प्रत्न और ईशान मुख से सुपर्ण उत्पन्न हुए। इनमें से प्रत्येक के पच्चीस-पच्चीस संतानों से विशाल विश्वकर्मा समाज का विस्तार हुआ।
विश्वकर्मा का संबंध पाँच शिल्पों से है- आयस (लोहा), काष्ठ (लकड़ी), ताम्र (ताँबा), शिला (पत्थर) और हिरण्य (सोना)। यही शिल्प मानव सभ्यता के विकास की आधारशिलाएँ बने। उन्होंने केवल निर्माण ही नहीं किया, बल्कि अपने पाँच पुत्रों के माध्यम से शिल्प और विज्ञान की पाँच धाराएँ दीं। मनु (सनाग गोत्र) धातु विज्ञान के आचार्य थे, जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र और औजार बनाने की कला दी और आधुनिक मैकेनिकल इंजीनियरिंग तथा मेटलर्जी की नींव रखी। मय (सनातन गोत्र) वास्तु और स्थापत्य के आचार्य थे, जिन्होंने महलों और नगरों का निर्माण किया और आधुनिक आर्किटेक्चर तथा शहरी नियोजन का मार्ग प्रशस्त किया। त्वष्टा (अहमान गोत्र) यंत्र और अस्त्र निर्माता थे; इंद्र का वज्र, शिव का त्रिशूल और विष्णु का चक्र उनके शिल्प का उदाहरण हैं। यह परंपरा आज एयरोस्पेस, रोबोटिक्स और रक्षा विज्ञान में जीवित है। शिल्पी (प्रत्न गोत्र) मूर्तिकला के आचार्य थे, जिन्होंने देवमूर्तियों के अनुपात और मुद्रा विज्ञान को विकसित किया, और विश्वज्ञ (सुपर्ण गोत्र) आभूषण कला के आचार्य थे, जिन्होंने मुकुट और रत्नजड़ित आभूषणों की परंपरा दी।
विभिन्न ग्रंथों में विश्वकर्मा के महत्व का उल्लेख मिलता है। उन्हें वैदिक देवता और सृष्टि का प्रथम सूत्रधार माना गया है। वास्तुशास्त्र के उपदेशकों में वे प्रमुख माने जाते हैं। वराहमिहिर ने भी इन्हीं मतों को स्वीकार किया है। स्कंदपुराण में उन्हें देवायतनों का सृष्टा कहा गया है। राजवल्लभ वास्तुशास्त्र में उनका वर्णन जलपत्र, पुस्तक, ज्ञानसूत्र, हंस पर आरूढ़, सर्वदृष्टि और शुभकुट धारण करने वाले देवता के रूप में किया गया है। विश्वकर्मीय ग्रंथ को विश्व का सबसे प्राचीन तकनीकी ग्रंथ माना जाता है जिसमें वास्तु, रथ और रत्नों का उल्लेख मिलता है। अपराजितपृच्छा में उनसे संबंधित लगभग 7500 प्रश्नोत्तर संकलित हैं, जिनमें से वर्तमान में 239 सूत्र उपलब्ध हैं।
शिल्पवेद भी उनकी ही रचना मानी जाती है। इसमें पाँच भाग हैं—वास्तुशास्त्र, प्रतिमा और मूर्तिकला, यंत्रशास्त्र, धातुकर्म और चित्रकला व अलंकरण। इसमें स्थापत्य के त्रिविध स्वरूप (दैविक, मानुष और दैत्य), अनुपात और माप (अंगुल, हस्त, गज और धनुष) तथा पंचमहाभूतों के समन्वय का सिद्धांत दिया गया है। यही कारण है कि शिल्पवेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय इंजीनियरिंग, वास्तुकला और कला का मूल मार्गदर्शक है।
आज का युग तकनीक और नवाचार का युग है। आधुनिक रोबोटिक्स, एयरोस्पेस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 3डी प्रिंटिंग और शहरी विकास की अवधारणाएँ विश्वकर्मा की परंपरा से ही जुड़ी हैं। भारत ने जब चंद्रयान-3 को सफलतापूर्वक चाँद पर उतारा, तो वह विश्वकर्मा की परंपरा का आधुनिक स्वरूप था। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी जैसी मूर्तिकला शिल्पी पुत्र की परंपरा का जीवित उदाहरण है। ब्रह्मोस मिसाइल और तेजस विमान त्वष्टा की विरासत का आधुनिक रूप हैं। देश का जौहरी उद्योग जब दुनिया को हीरे और सोने के गहने उपलब्ध कराता है, तो वह विश्वज्ञ की कला को जीवित रखता है। आज का हर इंजीनियर, वैज्ञानिक, कलाकार और श्रमिक वास्तव में विश्वकर्मा का उत्तराधिकारी है।
भगवान विश्वकर्मा केवल तकनीक और शिल्प तक सीमित नहीं, बल्कि समरसता और समानता के भी प्रतीक हैं। उन्होंने देवों, दानवों और मनुष्यों तीनों के लिए निर्माण किया। वे जाति, वर्ग और पेशे की सीमाओं से परे हैं। मजदूर, इंजीनियर, कलाकार, जौहरी, लोहार और बढ़ई- सभी उनके आराधक हैं।
उनका संदेश यही है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसमें कोई भेदभाव नहीं होता। श्रम और सृजन ही समाज और संसार को आगे बढ़ाते हैं और सभी समाज, जातियाँ और पेशे मिलकर ही भारतीय सभ्यता का निर्माण करते हैं। आज जब पूरी दुनिया समावेशिता और समान अवसरों की बात कर रही है, तब विश्वकर्मा का यह दर्शन और भी प्रासंगिक हो जाता है।
उनके व्यक्तित्व और कार्य का सार इन प्रेरक पंक्तियों में समाहित है-
हाथों में औजार, दिल में अरमान,
विश्वकर्मा हैं सृजन के भगवान।
पत्थर को मूरत, रेत को महल बना दें,
श्रम से ही जगत का सौंदर्य रच दें।
मिट्टी से सोना गढ़ने की कला,
पाषाण में जीवन फूँकने की कला।
विश्वकर्मा का यही है संदेश,
श्रम ही पूजा, श्रम ही उपदेश।
भगवान विश्वकर्मा केवल पौराणिक चरित्र नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के तकनीकी, सांस्कृतिक और कलात्मक स्तंभ हैं। उनका सृजन किसी एक समाज तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए है। उनका संदेश आज भी यही है कि श्रम ही पूजा है, सृजन ही साधना है और समरसता ही सभ्यता का सौंदर्य है। यही कारण है कि कहा जाता है—“बिना भगवान विश्वकर्मा के संसार और भौतिकता की कल्पना व्यर्थ है।”














