हिंदी दिवस: शिक्षण संस्थानों में हिंदी के प्रति नजरिया बदलने की जरूरत
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हिंदी दिवस: शिक्षण संस्थानों में हिंदी के प्रति नजरिया बदलने की जरूरत

हिंदी दिवस 2025 पर जानें हिंदी शिक्षा की वर्तमान स्थिति, पाठ्यक्रम की असमानता, तकनीकी एकीकरण की आवश्यकता और रोजगारपरकता की चुनौतियों के बारे में। हिंदी को आधुनिक और वैश्विक बनाने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए?

Written byडॉ कपिलदेव पंवारडॉ कपिलदेव पंवार — edited by कुलदीप सिंह
Sep 14, 2025, 08:57 am IST
in उत्तराखंड
Hindi Diwas

फोटो साभार: दैनिक जागरण

हिंदी दिवस हमें केवल भाषा का उत्सव मनाने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह हमें इस बात पर गंभीर चिंतन का भी अवसर प्रदान करता है कि आज हिंदी शिक्षा किस स्थिति में है और भविष्य के लिए उसका मार्ग किस दिशा में प्रशस्त किया जा रहा है। दुर्भाग्यवश यह कड़वा सच है कि विश्वविद्यालयों में हिंदी विषय को चुनने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या निरंतर घट रही है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि हिंदी को रोजगारपरक दृष्टि से देखने का नजरिया अभी तक विकसित नहीं हो पाया है। न केवल छात्र, बल्कि शिक्षकों का भी दृष्टिकोण हिंदी को एक साहित्यिक  विषय तक सीमित रखता है।

हिंदी शिक्षा की सबसे बड़ी समस्या पाठ्यक्रम की असमानता है। देश के विश्वविद्यालयों में हिंदी पाठ्यक्रम का एक मानक स्वरूप नहीं दिखाई देता है। कहीं पाठ्यक्रम बहुत पुराने ढांचे पर आधारित है, तो कहीं अति-सैद्धांतिक। परिणामस्वरूप छात्र-छात्राएं न तो रोजगारपरक हिंदी को पहचान पा रहे हैं और न ही आधुनिक संदर्भों में हिंदी की प्रासंगिकता का अनुभव कर पा रहे हैं। यह स्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि पाठ्यक्रम को एकरूप और आधुनिक बनाने की दिशा में ठोस पहल अभी शेष है।

हिंदी को नई तकनीकों से जोड़ने की जरूरत

शिक्षक वर्ग की भूमिका भी इस परिदृश्य में गंभीर है। आज आवश्यकता है कि शिक्षक पारंपरिक ढांचे से आगे बढ़कर हिंदी को नई तकनीकों और समकालीन जरूरतों के साथ जोड़कर प्रस्तुत करें। लेकिन सच्चाई यह है कि शिक्षक अब भी केवल पाठ्यपुस्तक और पुराने पाठ्यक्रमों तक ही सीमित हैं। वहीं परम्परागत ज्ञान प्रणाली में पारंगत शिक्षक और आधुनिक युवा शिक्षकों के बीच सामंजस्य का अभाव इस चुनौती को और गहरा कर रहा है। अनुभव और नवीनता के बीच की यह खाई विद्यार्थियों के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।

हिंदी के लिए बाधा

यह भी विडंबना है कि आज जब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP) मॉडल्स की दुनिया तेजी से विकसित हो रही है और हिंदी जैसी भाषाओं के लिए भी असंख्य अवसर उपलब्ध हैं, तब भी भाषा शिक्षक उसकी ओर आकर्षित नहीं हो रहे। नई तकनीक के प्रति उदासीनता हिंदी को वैश्विक मंच पर उसके योग्य स्थान दिलाने में बाधा उत्पन्न कर रही है। आज हिंदी के लिए रोजगार के कई आयाम मौजूद है और उस दृष्टि से औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने वालों की बजाय व्यवहारिक हिंदी के प्रयोगकर्ताओं की स्थिति बहुत मजबूत है।

प्रशासन, मीडिया, अनुवाद, डिजिटल कंटेंट, फिल्म, विज्ञापन, पर्यटन और आईटी क्षेत्र में हिंदी की अपार संभावनाएँ हैं, जिन क्षेत्रों में औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने वालों की कोई दृष्टि नहीं है। ऐसे में जब तक माध्यमिक और उच्च शिक्षण संस्थान इसे विद्यार्थियों तक सकारात्मक रूप से नहीं पहुँचाएगा, तब तक युवा पीढ़ी हिंदी विषय को केवल परीक्षा और अंक अर्जित करने तक सीमित रखेगी।

हिंदी दिवस मनाने का संकल्प तभी पूरा होगा जब हिंदी शिक्षा को रोजगारपरक, तकनीकी और आधुनिक बनाना हमारी प्राथमिकता होगी और इसके लिए विशेषतौर से आवश्यक है कि विश्वविद्यालय स्तर पर मानकीकृत और रोजगारपरक पाठ्यक्रम लागू किए जाएँ, शिक्षक तकनीक और रोजगारपरक दृष्टिकोण से प्रशिक्षण प्राप्त करें तथा युवाओं को हिंदी के भविष्य की संभावनाओं से परिचित कराया जाए, तभी हिंदी दिवस मनाना सार्थक होगा और हिंदी भाषा की शिक्षा का भविष्य उज्ज्वल बनेगा।

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