UN में Palestine पर Two State समाधान को India का समर्थन Israel की कीमत पर नहीं
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UN में Palestine पर Two State समाधान को India का समर्थन Israel की कीमत पर नहीं

फिलिस्तीन मुद्दे पर भारत का संयुक्त राष्ट्र में समर्थन यह संकेत देता है कि वह नैतिकता और व्यावहारिक हित दोनों को समान रूप से महत्व देता रहेगा। अतः भारत-इस्राएल संबंधों में फिलिस्तीन को लेकर कोई बाधा आने की संभावना नहीं है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami — edited by Alok Goswami
Sep 13, 2025, 03:36 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन संबंधी प्रस्ताव पर मत विभाजन

संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन संबंधी प्रस्ताव पर मत विभाजन

संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने फिलिस्तीन संबंधी प्रस्ताव का समर्थन किया है। यह दरअसल इस बात का संकेत है कि भारत फिलिस्तीन मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय न्याय और मानवाधिकार के पक्ष में है। यह समर्थन भारत की विदेश नीति में संतुलन को दर्शाता है। एक तरफ व्यावसायिक और सामरिक हित, दूसरी तरफ नैतिक और ऐतिहासिक प्रतिबद्धता। फिलिस्तीन मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन करने का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि वह इस्राएल से समझौता झलकाता है। भारत के इस्राएल से पहले से अधिक निकटता है और यह अनेक क्षेत्रों में दोनों के सहयोग से साफ दिखती भी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रधानमंत्री नेत्यनाहू परस्पर घनिष्ठ मित्र हैं और बने रहने वाले हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से भारत और फिलिस्तीन के बीच भी मधुर संबंध रहे हैं। भारत का यह रुख विशेष रूप से अपने स्वतंत्रता संग्राम के अनुभव से आया है। भारत के तत्कालीन नेताओं ने साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के खिलाफ एकजुटता दिखाई थी, इसलिए भारत ने फिलिस्तीन की राष्ट्रीय आकांक्षाओं का समर्थन किया। उसके बाद से भारत ने हमेशा ही फिलिस्तीन के लिए लगातार समर्थन की नीति अपनाई।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रधानमंत्री नेत्यनाहू परस्पर घनिष्ठ मित्र हैं

भारत ने फिलिस्तीनी मुद्दे पर हमेशा यह रेखांकित किया है कि फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र और संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता दी जाए। भारत ने कई बार संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद में फिलिस्तीनी अधिकारों की वकालत की है। 1974 में भारत ने फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) को पूर्ण प्रतिनिधित्व दिया था। 1988 में फिलिस्तीन ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की, जिसे भारत ने तुरंत मान्यता दी। तब से भारत-फिलिस्तीन संबंध सशक्त होते चले गए।

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी परंपरागत फिलिस्तीन नीति को संतुलित बनाए रखते हुए इस्राएल के साथ भी रणनीतिक और आर्थिक संबंध पहले से मजबूत किए हैं। भारत और इस्राएल के बीच रक्षा, कृषि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहित कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस्राएल तकनीकी क्षेत्र में एक उन्नत देश है, विशेषकर सैन्य तकनीक, जल प्रबंधन और कृषि अनुसंधान में वहां हुए प्रयोग महत्वपूर्ण कहे जा सकते हैं।

8 सितम्बर को नई दिल्ली में इस्राएली वित्त मंत्री बेज़ेलेल स्मोट्रिच और भारत की कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने द्विपक्षीय निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए

फिलहाल भारत की नीति संतुलन बनाए हुए है। एक ओर भारत फिलिस्तीन के राष्ट्रीय अधिकारों का समर्थन करता है, तो वहीं दूसरी ओर यह इस्राएल के साथ रणनीतिक साझेदारी को भी महत्व देता है। भारत ने साफ कहा है कि वह ‘दो-राज्य समाधान’ का समर्थक है, जिसमें फिलिस्तीन और इस्राएल दोनों को स्वतंत्र, संप्रभु और सुरक्षित राज्य के रूप में पहचान दी जाए। यह नीति अंतरराष्ट्रीय समुदाय की व्यापक सहमति पर आधारित है।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के इस समर्थन पर इस्राएल का अभी कोई आधिकारिक बयान तो नहीं आया है, लेकिन दोनों देशों की समझ यही रही है कि यह एक परस्पर सहमति पर आधारित रिश्ता है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि फिलिस्तीनी समर्थन उसके इस्राएल संबंधों में किसी प्रकार की बाधा नहीं डालेगा। दोनों देशों की सरकारें पारस्परिक सम्मान और सहयोग की नीति पर काम कर रही हैं। भारत ने यह रेखांकित किया है कि उसकी नीति क्षेत्रीय शांति और स्थिरता पर आधारित है, न कि केवल द्विपक्षीय हितों पर।

अभी 8 सितम्बर को नई दिल्ली में भारत और इस्राएल ने आपसी व्यापार बढ़ाने के लिए एक द्विपक्षीय निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता इस्राएली वित्त मंत्री बेज़ेलेल स्मोट्रिच के नई दिल्ली आगमन के मौके पर हुआ। मोदी के नेतृत्व में इस्राएल के साथ भारत के संबंध और प्रगाढ़ हुए हैं। स्मोट्रिच और भारत की कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा नई दिल्ली में हस्ताक्षरित इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश प्रवाह को बढ़ावा देना है। सीतारमण ने ‘साइबर सुरक्षा, रक्षा, नवाचार और उच्च प्रौद्योगिकी’ में दोनों देशों के बीच अधिक सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।

सितम्बर 2024 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति मोहम्मद अब्बास की भेंट हुई थी

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की विदेश नीति यूं भी संतुलन की मिसाल मानी जाती है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ इस्राएल के संबंधों में उतार—चढ़ाव आता रहा है, जबकि भारत ने अपने ऐतिहासिक दृष्टिकोण को कायम रखा है। ब्रिक्स और अफ्रीकी देशों के मंच पर भारत फिलिस्तीनी मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय न्याय और शांतिपूर्ण समाधान के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। चीन की तरह भारत भी परंपरागत रूप से फिलिस्तीन के पक्ष में रहा है, लेकिन हां, यह जरूर है कि वैश्विक भू-राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुरूप इस्राएल के साथ सहयोग बढ़ा है।

कूटनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की फिलिस्तीनी नीति में संतुलन एक महत्वपूर्ण रणनीति बन गई है। ऐतिहासिक प्रतिबद्धता के चलते भारत फिलिस्तीन का समर्थन करता है, लेकिन व्यावहारिक हितों के तहत इस्राएल के साथ भी सहयोग करता है। यह दो-राज्य समाधान पर आधारित नीति न केवल क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में सहायक है, बल्कि वैश्विक न्याय और मानवाधिकार के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलिस्तीनी मुद्दे पर भारत का संयुक्त राष्ट्र में समर्थन यह संकेत देता है कि वह नैतिकता और व्यावहारिक हित दोनों को समान रूप से महत्व देता रहेगा। अतः भारत-इस्राएल संबंधों में फिलिस्तीन को लेकर कोई बाधा आने की संभावना नहीं है, बल्कि यह संतुलित नीति आगे भी जारी रहने की उम्मीद है।

Topics: संयुक्त राष्ट्रभारतModiUNफिलिस्तीनPalestinenetyanahuइस्राएलisrael india frienship
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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