12-13 सितंबर को अमेरिका में UC Berkeley में साउथ एशिया कैपिटलिज्म पर एक दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन होने जा रहा है। इस कार्यशाला में साउथ एशिया कैपिटलिज्म अर्थात पूंजीवाद पर चर्चा की जाएगी, और इसमें सहयोगी है आईआईटी मुंबई, और यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट और साथ ही चौधरी सेंटर फॉर बांग्लादेश स्टडीज भी इस आयोजन के सह प्रायोजक हैं।
इस आयोजन को लेकर एक पोस्टर जारी किया गया और जिसे नाम दिया गया, पिरामिड ऑफ कैपिटलिस्ट इंडिया अर्थात पूंजीवादी भारत का पिरामिड। पूंजीवादी पिरामिड में सबसे ऊपर पूंजीवादी बनाए गए हैं, जिनके विषय में लिखा है कि “वी रूल यू, अर्थात हम आप पर शासन करते हैं!” और फिर उसके नीचे नेता हैं और जिनके आगे लिखा है कि “वी फूल यू अर्थात हम आपको बेवकूफ बनाते हैं!” उसके नीचे सेना और पुलिस है, जिनके आगे लिखा गया है “वी शूट एट यू” अर्थात हम आप पर गोली चलाते हैं और उसके नीचे आम मध्यवर्गीय और उच्च वर्ग है, जिसे पार्टी करते हुए दिखाया जा रहा है और इन सबका बोझ उठाते हुए गरीब लोगों को दिखाया है, और जिनके आगे लिखा है कि “वी वर्क फॉर आल” अर्थात हम सभी के लिए काम करते हैं और “वी फ़ीड आल” अर्थात हम सभी का पेट भरते हैं।
यह पिरामिड दरअसल, 1911 में बनाए गए एक कार्टून की नकल है, जो इन्डस्ट्रीयल वर्कर द्वारा प्रकाशित किया गया था। और उसमें उस समय के यूरोपीय और रूसी कार्टून बने थे। मगर जो साउथ एशिया को लेकर पोस्टर जारी किया गया है, उसमें सबसे आपत्तिजनक है, नेताओं का चित्रण। नेताओं के रूप में केवल भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत के गृह मंत्री अमित शाह एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दिखाए गए हैं।
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सोशल मीडिया पर इसका पोस्टर harshil नामक यूजर ने साझा किया।
https://Twitter.com/MehHarshil/status/1965623767172087862?
PM मोदी, योगी और सेना के खिलाफ भी उगला जहर
यह अत्यंत आपत्तिजनक पोस्टर है। यह भारत के उद्योगपतियों के विरुद्ध षड्यंत्रत है, सेना और आम मध्यवर्गीय व्यक्तियों के प्रति जहर तो घोला ही गया है, मगर जो सबसे आपत्तिजनक है, वह है नेताओं के नाम पर भारत के तीन बार के चुने गए प्रधानमंत्री, और भारत के गृह मंत्री अमित शाह तथा भगवा वस्त्रों में योगी आदित्यनाथ को “वी फूल यू” कहकर लिखना। साउथ एशिया में पूंजीवाद पर कार्यशाला है तो क्या पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, मालदीव आदि के नेता कहाँ है? कोई भी मजहबी नेता नहीं है और न ही पाकिस्तान आदि के नेता दिखाए गए हैं? आखिर ऐसा क्या कारण है कि भारत का एक सरकारी संस्थान इस प्रकार की देश विरोधी कार्यशाला का हिस्सा बन रहा है?
देश के नेतृत्व के प्रति फैला रहे घृणा
यह देश के नेतृत्व के प्रति तो घृणा भरने का कुकृत्य है ही, मगर साथ ही यह देश की रक्षा करने वाली सेना के प्रति भी विष भरे जाने का कुकृत्य है। भारत चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हुआ है और यह सेना ही है, जो लगातार भारत पर होने वाले आक्रमणों को निष्फल करती है और उस सेना के प्रति यह लिखना कि “हम आप पर गोली चलाते हैं!” क्या संदेश देता है?
harshil ने ही सोशल मीडिया पर लिखा कि न्यू पॉलिटिकल इकोनॉमी इनिशिएटिव, आईआईटी बॉम्बे के सेंट्रल फॉर लिबरल एजुकेशन के अंतर्गत काम करता है। यही इस आयोजन का सह प्रायोजक है। इस एनपीईआई का संचालन और नेतृत्व आईआईटी मुंबई के फ़ैकल्टी मेम्बर और ब्रिटिश नागरिक अनुष कपाड़िया करते हैं। अनुष को भारत सरकार से वेतन मिलता है। इस एनपीईआई को फोर्ड फाउंडेशन से ₹35 करोड़ का वित्त पोषण भी मिला है। अनुष कपाड़िया का एनपीईआई इस एजेंडे को फैलाता है कि भारतीय लोकतंत्र संकट में है।“
उन्होंने प्रश्न किया कि आखिर एक ब्रिटिश नागरिक नरेंद्र मोदी को इतना निशाना क्यों बना रहा है?”
प्रौद्योगिक संस्थानों में ह्यूमैनिटीज का विषय क्यों ?
परंतु यह सबसे बड़ा प्रश्न है कि आखिर प्रौद्योगिकी संस्थानों में ह्यूमेनिटीज़ के विषय क्यों शामिल किये गए और क्यों लगातार ये बढ़ते जा रहे हैं? सोशल मीडिया पर भी कई यूजर्स ने इस बात को कहा कि आखिर टेक्निकल शिक्षण संस्थानों में ह्यूमेनिटीज़ के विषय क्यों पढ़ाए जा रहे हैं? क्योंकि अधिकतर ऐसे विषयों पर अभी भी लेफ्ट का कब्जा है और वे एजेंडे को ही लेकर आगे बढ़ते हैं। आईआईटी मुंबई पिछले कई वर्षों से गलत कारणों से चर्चा में रहा है। रह-रह कर ऐसे विषयों पर विवाद होते रहते हैं, जिनपर नहीं होने चाहिए।
बड़ा सवाल
परंतु सबसे बड़ा प्रश्न तो इस बात खड़ा होता है कि कैसे कोई सरकारी संस्थान अपने ही देश की सरकार, सेना, उद्योगपतियों को इस प्रकार कोस सकता है? क्या शिक्षामंत्रालय इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है कि भारत के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान स्वयं को मिल रहे फंड का क्या और कहाँ प्रयोग कर रहे हैं? क्या भारत के करदाताओं का धन, उसके नेताओं, उसकी सेनाओं को कोसने के लिए प्रयोग किया जाएगा?
सोशल मीडिया पर लोग शिक्षामंत्री और प्रधानमंत्री को टैग कर प्रश्न कर रहे हैं कि आखिर यह अब क्या हो रहा है? क्या यह एक प्रकार से लोगों को भड़काने का षड्यन्त्र नहीं है? सेना के खिलाफ, आम मध्यवर्गीय लोगों के खिलाफ और सबसे बढ़कर मजबूत नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह भड़काने का षड्यन्त्र क्या यह नहीं है और वह भी एक सरकारी प्रतिष्ठित संस्थान द्वारा?














