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अमेरिका और पाकिस्तान के बीच बढ़तीं नजदीकियां : शरारत बनाम शक्ति संधान

अमेरिका और पाकिस्तान की नजदीकियां एक बार फिर दुनिया में असुरक्षा की आहट बढ़ा रही हैं। इतिहास गवाह है कि इनकी दोस्ती ने हमेशा आतंकवाद और युद्ध की आग ही भड़काई है

Written byमृदुल त्यागीमृदुल त्यागी — edited by Rajpal Singh Rawat
Sep 8, 2025, 05:16 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख मुनीर और डोनाल्ड ट्रंप

पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख मुनीर और डोनाल्ड ट्रंप

अमेरिका के विदेश मंत्री रहे हेनरी किसिंजर के मुंह से एक बार सच निकल ही गया था। उन्होंने कहा था, “अमेरिका से दुश्मनी खतरनाक हो सकती है, लेकिन अमेरिका से दोस्ती और ज्यादा खतरनाक है।” यही अमेरिकी विदेश नीति का कड़वा सच है। अमेरिका की विदेश नीति ने दुनिया को युद्ध दिए हैं, आतंकवाद दिया है। आज अमेरिका और पाकिस्तान की दोस्ती गाढ़ी होती जा रही है, तो भारत ही नहीं पूरी दुनिया एक आशंका में डूब गई है। पाकिस्तान में कहने को निर्वाचित सरकार है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन अमेरिका में पाकिस्तानी जनरल के लिए रेड कारपेट बिछा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना के शौर्य व सामर्थ्य से बेचैन अमेरिका की विदेश नीति एक बड़ा यू-टर्न ले चुकी है। पिछले 25 साल में आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर लाखों टन बारूद बरसा चुके अमेरिका ने एक बार फिर पाकिस्तान को गोदी में बैठाने की तैयारी कर ली है।

तबाही का इतिहास

मृदुल त्यागी
वरिष्ठ पत्रकार

आशंका यूं ही नहीं है। इतिहास में झांककर देखेंगे, तो पाकिस्तान और अमेरिका की दोस्ती ने दुनिया को तबाही के अलावा कुछ नहीं दिया है। 1979 में जब तत्कालीन सोवियत संघ की सेना अफगानिस्तान में घुसी तो शीत युद्ध के उस दौर में यह अमेरिका के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। उसने सोवियत संघ के सामने खुद न उतरकर पाकिस्तान को अपना हथियार बनाया। पर्दे के आगे पाकिस्तान था, पीछे अमेरिका। जैसे आज फिर अमेरिका पाकिस्तान को भारत के खिलाफ हथियार बना रहा है। उस समय पाकिस्तान जनरल जिया उल हक की तानाशाही थी। लोकतंत्र के कथित ‘पुजारी’ व समर्थक अमेरिका ने पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार भुट्टो को फांसी देने वाली सैन्य तानाशाही को गले लगा लिया।

पाकिस्तान पर अमेरिकी डॉलर बरसाने लगा। अरबों डॉलर की सहायता दी गई। आधुनिक हथियार दिए गए। यह पैसा और हथियार सोवियत फौज के खिलाफ लड़ने वाले कथित मुजाहिदीन तैयार करने के लिए दिए गए थे। पाकिस्तान के कोने-कोने में, खासतौर पर अफगानिस्तान सीमा व पाकिस्तान अधिक्रांत कश्मीर में हजारों मदरसे इस सहायता राशि से तैयार हो गए। इनमें अमेरिका ने अफगानिस्तान में लड़ने वालों को तैयार किया और पाकिस्तान ने भारत से लड़ने वालों को। अमेरिका सोवियत संघ से प्रॉक्सी वार (छद्म युद्ध) लड़ रहा था और पाकिस्तान ने इसी दौर में भारत से ‘प्रॉक्सी वॉर’ शुरू कर दी।

1989 में सोवियत सेना की वापसी के साथ अमेरिका की रुचि तो ‘प्रॉक्सी वॉर’ में खत्म हो गई, लेकिन इसका नतीजा भारत ने झेला। भारत में सत्ता में स्वाभिमान शून्य सरकारें थीं। 1989 में कश्मीर में इस्लामी आतंकवाद का विस्फोट हुआ। हजारों कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार हुआ, जिसका अप्रत्यक्ष जिम्मेदार अमेरिका ही है। लेकिन ऐसा नहीं है कि आग सिर्फ भारत में लगी। आंच की लपटें अमेरिका तक पहुंचीं।

इन मदरसों से निकली तालिबान नाम की फौज ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया। पूरी दुनिया, खासतौर पर अमेरिका के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों का केंद्र अफगानिस्तान का वह इस्लामिक अराजक तत्व बना, जिसने जिहाद को अपना फर्ज मान लिया। दुनिया के इतिहास के सबसे दुर्दांत आतंकवादी संगठन अल कायदा का जन्म अफगानिस्तान में ही हुआ। यहीं से बैठकर ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका पर सबसे घातक आतंकवादी हमला किया। 11 सितंबर 2001 को अलकायदा के 19 आतंकवादियों ने चार यात्री विमानों का अपहरण किया।

इसमें अमेरिका की नाक माना जाने वाले ट्विन टॉवर्स तबाह हो गए। हमला अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पेंटागन पर भी हुआ। इस हमले ने पहली बार अमेरिका को एहसास कराया कि आग लगेगी, तो वह भी चपेट में आ सकता है। यहां से अमेरिका का आतंकवाद के खिलाफ कथित युद्ध शुरू हुआ। यही वह घटना थी, जिससे अमेरिका का पाकिस्तान प्रेम एक झटके में खत्म हो गया। 2024 तक अमेरिका में जो भी राष्ट्रपति हुए, उन्होंने अपनी विदेश नीति में इस तत्व को रखा कि कम से कम प्रत्यक्ष रूप से आतंकवाद व उसके प्रायोजकों से दूरी रखी जाए।

पलायन और हथियारों की सौगात

अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपनी कठपुतली सरकार बिठाई। अफगान नेशनल आर्मी खड़ी की। लेकिन 31 अगस्त 2021 को तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन के आदेश पर अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान को उसके हाल पर छोड़ दिया। अमेरिकी सेना रातों-रात अफगानिस्तान से भागी और पीछे 7 अरब डॉलर के अत्याधुनिक हथियार छोड़ गई। इनमें ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर, बख्तरबंद गाड़ियां और तमाम छोटे घातक अत्याधुनिक हथियार शामिल थे। कोई ताज्जुब नहीं कि पहलगाम आतंकवादी हमलों में जिन अत्याधुनिक हथियारों का इस्तेमाल हुआ था, उनके अमेरिकी होने की ही आशंका है। जाहिर है, ये हथियार अफगानिस्तान से पाकिस्तान के जरिए ही आतंकवादियों के हाथों में पहुंचे हैं।

पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए जिस तरह से पाकिस्तान के अंदर घुसकर सबक सिखाया है, वह तो दुनिया के लिए एक मिसाल है ही। इसके साथ ही कई अनदेखे पहलू इसमें छिपे हैं। भारतीय हमले में पाकिस्तान के जखीरे में मौजूद कई अमेरिकी सैन्य साजो-सामान जैसे एफ-16 नेस्तनाबूद हो गए। भारत ने जिस तरीके से प्रचंड हमला और उससे भी लाजवाब, जिस तरीके से ढाई हजार से अधिक मिसाइल और ड्रोन को आसमान में ही तबाह कर दिया, उसने दुनिया को अचंभित कर दिया है।

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

इस युद्ध के दौरान पाकिस्तान के आग्रह पर संघर्ष विराम हुआ। आधिकारिक सैन्य चैनल से हुआ। लेकिन ट्रंप ने इसका श्रेय लूटने की कोशिश की। जबकि भारत ने हर स्तर पर, यहां तक कि संसद में स्पष्ट किया कि संघर्ष विराम में किसी तीसरे देश की कोई भूमिका नहीं है। इस तरह अमेरिका के दंभ को दो स्तर पर चोट पहुंची। उसकी सैन्य हथियारों व टेक्नोलॉजी की अंतरराष्ट्रीय साख धूल में मिल गई है।

इसके साथ ही अमेरिका का यह भ्रम भी टूट गया है कि वह भारत जैसे परमाणु शक्ति संपन्न देश की बांह मरोड़ सकता है। यह भ्रम अमेरिका की व्यापार संधि में भी टूट गया। भारत सरकार अपने किसानों और पशुपालकों के साथ छोटे व मध्यम उद्योगों को बचाने के लिए दीवार की तरह अड़ गई। भारत ने ट्रंप के साथ कोई व्यापार संधि नहीं की। टैरिफ लगाने जैसे एकतरफा कदमों के बावजूद नहीं की। साथ ही, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह संकेत दे चुके हैं कि चाहे जो कीमत चुकानी पड़े, वह देश के किसानों, कामगारों, छोटे व मझोले उद्योगों, मत्स्य पालकों व पशुपालकों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यह नहीं समझ पा रहे हैं, या समझना नहीं चाहते कि यह नया भारत है। दुनिया का सबसे विशाल बाजार। सबसे ज्यादा मानव संसाधन वाला देश, जो अपनी रक्षा करना भी जानता है और दुश्मन को घर में घुसकर सबक सिखाना भी जानता है। वह नहीं समझ रहे हैं कि भारत की विदेश नीति में एक रणनीतिक स्वायत्तता है। भारत की विदेश नीति का एक अहम तत्व यह है कि यह किसी एक पक्ष की ओर झुकी हुई नहीं है। इस नीति में एक बहुपक्षीय संतुलन है। हाल तक अमेरिका के साथ भारत का व्यापार लगातार बढ़ रहा था। लेकिन भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी भी बनाकर रखी। ट्रंप की नजर में भारत का रूस से तेल खरीदना महापाप है। लेकिन यही तेल जब चीन खरीदता है, तो उसे नजरअंदाज करना ट्रंप की मजबूरी है।

शक्ति संतुलन में भारत

अब यह समझिए कि दुनिया आखिर क्या करवट ले रही है। अमेरिका ने जिस तरीके से एकतरफा टैरिफ लगाया है और भारत को चिढ़ाने वाले अंदाज में दो बार पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर का वाशिंगटन में रेड कारपेट स्वागत किया है, उससे संबंध एक नाजुक मोड़ पर आ गए हैं। ट्रंप पाकिस्तान को अमीर बना देने के ख्वाब दिखा रहे हैं। हथियार देने का भरोसा दे रहे हैं। भारत के साथ पाकिस्तान के युद्ध की धमकीनुमा चेतावनियां जारी कर रहे हैं। ऐसे में भारत के सामने भी कई विकल्प हैं। ट्रंप अपनी धुन में भारत की तमाम सुरक्षा चिंताओं की अनदेखी कर रहे हैं। भारत की सबसे बड़ी चिंता यही है कि पाकिस्तान और अमेरिका गठजोड़ एक बार फिर आतंकवाद का खतरा पैदा कर सकता है। ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान के कुछ दहशगर्द संगठनों को छूट देनी भी शुरू कर दी है।

अमेरिका यह भी नहीं समझ रहा है कि भारत और अमेरिका की सैन्य साझेदारी भी उसकी इस पलटी के बाद बेमानी हो जाती है।
ऐसे में भारत और चीन के संबंधों में अचानक गर्माहट आने लगी है, जो नए शक्ति संतुलन की ओर इशारा कर रही है। भारत को जिस तरह का विश्वासघात का एहसास अमेरिका को लेकर हो रहा है, चीन का भी पाकिस्तान के अमेरिका प्रेम को लेकर यही हाल है। हाल ही में पहले भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने चीन की यात्रा की।

इसके बाद चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भारत का दौरा किया। दोनों देशों ने कई अहम मसलों पर सहमति बनने लगी है। जैसे लिपुलेख, शिपकी लॉ और नाथू लॉ के सीमा व्यापार मार्ग को दोबारा खोला जाएगा। 2025 में कैलास-मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू करने की भी सहमति बन गई है। भारत और चीन के बीच पांच साल सीधे नागरिक विमान सेवाएं उड़ सकेंगी। इसके साथ वीजा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और रेयर अर्थ मैटिरियल को लेकर भी सहमति बनती जा आ रही है।

उधर, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 2025 के अंत में भारत आ रहे हैं। यह भारत और रूस के बीच 23वां शिखर सम्मेलन होगा। रूस पहले ही पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान एसयू-57 ई के मेक इन इंडिया संस्करण का प्रस्ताव दे चुका है। इसके साथ ही एस-400 मिसाइल प्रतिरोधक सिस्टम की आपूर्ति समयानुसार चल रही है। ब्रह्मोस के उन्नत वर्जन और कई अन्य संवेदनशील सैन्य तकनीकों में दोनों देशों के बीच सहयोग हो सकता है।

भारत ब्रिक्स के बाकी दो सदस्य देशों, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ अपने कूटनीतिक व व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की तैयारी कर रहा है। यूरोपीय संघ के साथ व्यापारिक समझौते की बातचीत अंतिम दौर में है। दुनिया में नया शक्ति संतुलन उभरता नजर आ रहा है। संतोष की बात यह है कि इसके केंद्र में इस बार भारत है। क्योंकि दुनिया के शक्ति समीकरण इस समय इस बात से प्रभावित हो रहे हैं कि भारत किस पाले में बैठता है।

Topics: पाकिस्तानअमेरिकाअमेरिका और पाकिस्तानपाञ्चजन्य विशेषऑपरेशन सिंदूरमृदुल त्यागीUS-Pakistan Relations
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