हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामानों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का आदेश दिया है। इसके साथ ही टैरिफ दर बढ़कर 50 प्रतिशत हो गई है। ट्रंप का कहना है कि यह फैसला भारत द्वारा रूस से लगातार तेल खरीदने की वजह से लिया गया है। इस निर्णय के बाद भारत उन देशों में शामिल हो गया है, जिन पर अमेरिका ने सर्वाधिक टैरिफ लगाए हैं। अनुमान है कि इसका असर अमेरिका को होने वाले भारत के 40 अरब डॉलर से अधिक के निर्यात पर पड़ेगा, जिनमें ऑटो उत्पाद, कपड़ा-परिधान, आभूषण, रसायन, इलेेक्ट्रॉनिक्स, इस्पात और समुद्री खाद्य उत्पाद आदि शामिल हैं।

राष्ट्रीय सह संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच
हालांकि फार्मास्यूटिकल्स, तैयार इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद जैसे स्मार्टफोन, लैपटॉप, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा उत्पाद (तेल, गैस व एलएनजी) और तांबा जैसी कुछ वस्तुओं को इस टैरिफ वृद्धि से छूट दी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिकी टैरिफ का असर पड़ता भी है, तो भारत का अमेरिका को निर्यात अधिकतम 5 से 7 अरब डॉलर तक ही घटेगा। दूसरी ओर, 2022 से 2024 के बीच भारत ने रूस से तेल आयात कर लगभग 13 अरब डॉलर की बचत की थी। यानी नरूस से सस्ता तेल खरीदने का लाभ इतना बड़ा है कि भारत के लिए अमेरिकी टैरिफ का असर अपेक्षाकृत मामूली रहेगा।
‘दादागिरी’ के खिलाफ लामबंदी
इस बीच, ट्रंप ने यह संकेत भी दिया है कि रूस से तेल खरीदने वाले अन्य देशों, जिनमें चीन भी शामिल है, पर ‘द्वितीयक प्रतिबंध’ लगाए जा सकते हैं। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अमेरिका का यह टैरिफ निर्णय विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों का सीधा उल्लंघन है। कुछ दिन पहले अमेरिकी न्यायालय ने आदेश दिया था कि राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा लगाया गया टैरिफ न्याय संगत नहीं है। इस आदेश में उन दो सेट आयात करों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें ट्रंप ने ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ घोषित करके सही ठहराने की कोशिश की थी। पहला टैरिफ पैकेज अप्रैल में घोषित हुआ था और दूसरा फरवरी में, जिसमें कनाडा, चीन और मैक्सिको से आयातित सामान पर शुल्क लगाया गया था।
उधर, दुनिया के कई देश अब अमेरिका की इस मनमानेपूर्ण रवैये के विरुद्ध लामबंद होने लगे हैं। हाल ही में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में भारत, चीन और रूस सहित अन्य सदस्य देशों ने अमेरिकी टैरिफ नीति का सीधे नाम लिए बिना एकतरफा बलपूर्वक उपायों का विरोध किया। इन देशों का कहना था कि ऐसे जबरदस्ती के उपाय, जिनमें आर्थिक प्रकृति के उपाय भी शामिल हैं, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के अन्य मानदंडों, डब्ल्यूटीओ के नियमों और सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। ऐसे कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को भी नुकसान पहुंचाते हैं।

भारत के लोगों को स्वदेशी पर गर्व होना चाहिए और विद्यालयों में प्रोजेक्ट्स के माध्यम से ‘मेड इन इंडिया’ की पहचान करानी चाहिए। व्यापारियों को अपनी दुकानों पर ‘गर्व से कहो यह स्वदेशी है’ का बोर्ड लगाना चाहिए। स्वदेशी अपनाने से भारत की आर्थिक शक्ति बहुत अधिक बढ़ेगी।—नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री
कड़वाहट का कारण

भारत-अमेरिका रिश्तों में इस समय तीन बड़ी समस्याएं हैं- व्यापार और टैरिफ, रूस से कच्चे तेल की खरीद और पाकिस्तान मामले में वॉशिंगटन का हस्तक्षेप। हमने अभी तक ऐसा कोई अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं देखा, जिसने इतने सार्वजनिक रूप से विदेश नीति चलाई हो। यह बदलाव केवल भारत तक सीमित नहीं है। भारत के लिए व्यापार वास्तविक और सबसे बड़ा मुद्दा है। भारत की अपनी ‘रेड लाइन्स’ हैं। सरकार किसानों व छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगी। यह दिलचस्प है कि खुद को प्रो-बिजनेस बताने वाला अमेरिकी प्रशासन दूसरों पर मुनाफा कमाने का आरोप लगा रहा है। अगर आपको भारत से तेल या रिफाइंड उत्पाद खरीदने में दिक्कत है तो मत खरीदिए। कोई आपको मजबूर नहीं कर रहा।
— एस. जयशंकर, विदेश मंत्री, भारत
निर्यात विस्तार की नई राह
अमेरिकी टैरिफ से निर्यात पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को देखते हुए भारत ने 40 देशों पर केंद्रित एक विशेष आउटरीच कार्यक्रम शुरू करने की योजना बनाई है। इसमें यूके, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, कनाडा, मैक्सिको, रूस, तुर्की, यूएई और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े बाजार शामिल होंगे। इन देशों का वस्त्र और परिधान आयात बाजार 590 अरब डॉलर से अधिक है, जबकि भारत की हिस्सेदारी अभी लगभग 5-6 प्रतिशत ही है। इसे बढ़ाने के लिए सरकार और एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (ईपीसी) लक्षित रणनीति बनाएगी, प्रमुख उत्पादों की पहचान करेगी और सूरत, पानीपत, तिरुपुर व भदोही जैसे उत्पादन केंद्रों को नए अवसरों से जोड़ेगी। वर्तमान में भारत का टेक्सटाइल और परिधान क्षेत्र लगभग 179 अरब डॉलर का है, जिसमें 37 अरब डॉलर निर्यात से आते हैं। वैश्विक स्तर पर 4.1 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ भारत छठा सबसे बड़ा निर्यातक है। विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यात का यह विविधीकरण न केवल अमेरिकी टैरिफ के असर को घटाएगा, बल्कि भारत को वैश्विक टेक्सटाइल क्षेत्र में एक मजबूत और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित करेगा।

टकराव तीन मुद्दों पर
हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत-अमेरिका संबंधों में मौजूद तीन प्रमुख तनावपूर्ण मुद्दों का उल्लेख किया। इनमें पहला मुद्दा व्यापार और शुल्क से जुड़ा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि भारत वस्तुओं पर अधिक टैरिफ लगाता है, जबकि अमेरिका अपेक्षाकृत कम शुल्क लेता है। उनका तर्क है कि भारत को अपने टैरिफ कम करने चाहिए, अन्यथा अमेरिका भारत के उत्पादों पर और अधिक शुल्क लगाएगा। अमेरिका लगातार भारत पर अपने बाजार खोलने और अमेरिकी वस्तुओं पर शुल्क घटाने का दबाव बना रहा है। वहीं, भारत स्टील, एल्युमीनियम और अन्य वस्तुओं पर अमेरिका द्वारा शुल्क वृद्धि को अनुचित और संरक्षणवादी मानता है।
अमेरिका पहले भारत को सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (जीएसपी) के तहत विशेष व्यापारिक लाभ देता था, जिसे 2019 में वापस ले लिया गया। भारत इसकी बहाली की मांग कर रहा है। भारत का मानना है कि शुल्क केवल घरेलू उत्पादकों की सुरक्षा का साधन नहीं हैं, बल्कि विकास की नीतिगत स्वतंत्रता बनाए रखने का हिस्सा भी हैं। अमेरिकी रुख दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में तनाव उत्पन्न करता है। इसके अलावा, अमेरिका बौद्धिक संपदा, डिजिटल व्यापार और डेटा के मुक्त प्रवाह से जुड़े मुद्दों पर भारत से रियायतें चाहता है। डब्ल्यूटीओ के ट्रिप्स समझौते से आगे बढ़ते हुए अमेरिका इस बात के लिए दबाव डाल रहा है कि भारत डेटा पर प्रतिबंध न लगाए और ‘डेटा एक्सक्लूजिविटी’ व ‘एवरग्रीनिंग’ जैसे प्रावधान स्वीकार करे, ताकि अमेरिकी कंपनियों के पेटेंट को बढ़ाया जा सके। लेकिन भारत का तर्क है कि डेटा पर अधिकार राष्ट्रीय संप्रभुता और व्यापारी हितों से जुड़ा मुद्दा है, जबकि पेटेंट संबंधी मामलों में जनस्वास्थ्य की सुरक्षा सर्वोपरि है, जिस पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
ट्रंप को पुतिन की दो टूक

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एससीओ शिखर सम्मेलन और चीन में सैन्य परेड में भाग लेने के बाद मीडिया से बातचीत की। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ और प्रतिबंधों को लेकर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि ट्रंप व्यापारिक नीतियों और टैरिफ के जरिए भारत और चीन पर दबाव डालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह रणनीति नाकाम होगी। यह दौर ‘बहुध्रुवीय दुनिया’ का है और कोई भी देश भारत-चीन से इस तरह बात नहीं कर सकता। ट्रंप भारत और चीन पर टैरिफ और प्रतिबंधों के जरिए दबाव बनाने की कोशिश न करें। इस नई बहुपक्षीय दुनिया में किसी की धौंस नहीं चलनी चाहिए। इसके बारे में कोई बात नहीं कर रहा है, न ब्रिक्स में, न ही एससीओ में। इस बहुपक्षीय दुनिया में सभी के पास बराबरी के अधिकार होने चाहिए।
पुतिन ने ट्रंप प्रशासन पर एशिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों को कमजोर करने के लिए आर्थिक दबाव का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। भारत और चीन को ‘साझेदार’ बताते हुए पुतिन ने कहा कि अमेरिकी टैरिफ सिस्टम ‘इन देशों के नेतृत्व को कमजोर करने’ का एक प्रयास है। भारत की 1.5 अरब की आबादी है, चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इन देशों की अपनी राजनीति और अपना इतिहास है। यदि इनके नेता अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हैं तो उनका राजनीतिक करियर ही खतरे में पड़ जाएगा। वाशिंगटन को यह समझना होगा कि उपनिवेशवाद का समय बीत चुका है और अब देशों से साझेदारों की तरह बातचीत करनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा, “बहुपक्षीय दुनिया में सभी के अधिकार बराबर हैं। किसी एक देश का दबदबा नहीं चल सकता।”
साथ ही, उन्होंने कहा कि संवाद के जरिए समाधान निकाला जा सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि बेहतर अंतरराष्ट्रीय संबंध सामने आएंगे। ट्रंप की ओर इशारा करते हुए पुतिन ने कहा कि भारत या चीन जैसी आर्थिक दिग्गज शक्तियां मौजूद हैं। हमारा देश भी क्रय शक्ति के आधार पर शीर्ष की चार अर्थव्यवस्थाओं में है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वैश्विक राजनीति या ग्लोबल सिक्योरिटी पर किसी एक का दबदबा हो। हमारा मानना है कि किसी एक का दबदबा नहीं होना चाहिए, सभी समान होने चाहिए। पुतिन की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत रूस से सस्ता तेल खरीदने के चलते अमेरिकी टैरिफ़ और संभावित प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, जबकि चीन पहले से ही वाशिंगटन के साथ व्यापार युद्ध में उलझा हुआ है।
दूसरा महत्वपूर्ण विवाद रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर है। इसलिए रूस पर भी अमेरिका ने दबाव बनाना शुरू कर दिया है। उसका आरोप है कि भारत रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध में मास्को की मदद कर रहा है। भारत का स्पष्ट रुख है कि वह रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना जारी रखेगा, क्योंकि यह उसकी ऊर्जा सुरक्षा और मूल्य स्थिरता के लिए आवश्यक है। दूसरी ओर, वाशिंगटन का कहना है कि यह कदम उसके प्रतिबंध ढांचे को कमजोर करता है। भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने पर जोर दे रहा है। भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदकर घरेलू स्तर पर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को स्थिर रखने में सफलता पाई है। इस खरीद से भारत को लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का वार्षिक लाभ हुआ है, जिससे मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखने में भी मदद मिली है। यहां यह समझना आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार से किस देश से क्या खरीदना है, यह एक संप्रभु निर्णय है और इस पर किसी बाहरी देश का दबाव स्वीकार्य नहीं हो सकता।
तीसरा मुद्दा भारत-पाकिस्तान से जुड़ा है। अमेरिका ऐतिहासिक रूप से इस संबंध में हस्तक्षेप की कोशिश करता रहा है, जिसे भारत द्विपक्षीय मामलों, विशेषकर कश्मीर और सीमा पार आतंकवाद, में अनुचित दखल मानता है। हाल ही में अमेरिकी अधिकारियों द्वारा भारत में लोकतंत्र, मानवाधिकार और पांथिक स्वतंत्रता पर दिए गए बयान भी भारत को अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान से जुड़ा हस्तक्षेप प्रतीत होते हैं। भारत का रुख स्पष्ट है कि पाकिस्तान के साथ उसके संबंधों में किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है। वाशिंगटन का पाकिस्तान के प्रति झुकाव या संबंधों को ‘संतुलित’ करने का प्रयास, भारत में अविश्वास की भावना पैदा करता है।
क्या है समाधान?
भारत के लिए निर्यात बाजारों में विविधीकरण एक महत्वपूर्ण समाधान है। वर्तमान में अमेरिकी बाजार भारतीय वस्त्र, आईटी सेवाओं, फार्मास्यूटिकल्स और रत्न-आभूषणों का प्रमुख गंतव्य है, लेकिन इस पर अत्यधिक निर्भरता कम करनी होगी। वैकल्पिक विकल्पों के रूप में यूरोपीय संघ, आसियान, लातीनी अमेरिका और अफ्रीका के साथ व्यापारिक साझेदारियों का विस्तार किया जा सकता है। इस दिशा में भारत-यूएई सीईपीए तथा यूके, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया के साथ चल रही वार्ताओं से नए अवसरों का लाभ उठाया जा सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है घरेलू मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहन। यह भी एक महत्वपूर्ण समाधान हो सकता है।
विकास दर अनुमान से अधिक
अमेरिकी टैरिफ के बीच पहली तिमाही में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही, जो 6.7 प्रतिशत के अनुमान से अधिक है। पिछले वर्ष की समान अवधि में यह दर 6.5 प्रतिशत थी। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के अनुसार, जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान सबसे अधिक 55 प्रतिशत रहा। सेवा क्षेत्र ने 9.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है। कृषि क्षेत्र ने 3.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 1.5 प्रतिशत थी। साथ ही, जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 15-18 प्रतिशत रहा। लगभग 7.6–7.7 प्रतिशत की वृद्धि से निर्माण और विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती मिली है।
रिकॉर्ड ऊंचाई पर निर्माण क्षेत्र : निर्माण क्षेत्र 17 साल के शिखर पर पहुंच गया है। एस एंड पी ग्लोबल के ताजा आंकड़ों के अनुसार, एचएसबीसी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स जुलाई 2025 के 59.1 से बढ़कर अगस्त में 59.3 पर पहुंच गया, जो अब तक का उच्च स्तर है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस उछाल का मुख्य कारण घरेलू उत्पादों की बढ़ती मांग और निर्माताओं द्वारा किए गए सफल विज्ञापन अभियान रहे हैं। यह उपलब्धि ‘मेक इन इंडिया’ पहल की सफलता का संकेत है, जो आने वाले समय में भारत के विनिर्माण क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को और मजबूत करेगी।
भारत, चीन और रूस का एक साथ आना अमेरिका के लिए अच्छा नहीं है। यह पश्चिम के दिल पर ताना गया खंजर है। अगर हम यही चाहते हैं, तो मैं ट्रंप की इस करारी हार के लिए निंदा करने को तैयार हूं। लेकिन मुझे लगता है कि हम आज के दिन को ऐतिहासिक रूप से एक बहुत बड़ी घटना के रूप में देखेंगे। पुतिन-मोदी-शी जिनपिंग की तस्वीर हर अमेरिकी की रूह कंपा रही है।– वैन जोन्स, अमेरिकी पत्रकार
पीएलआई (उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन) योजनाओं और आत्मनिर्भर भारत पहल के माध्यम से घरेलू उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ाया जा रहा है। विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा एपीआई, ऑटो कलपुर्जे और नवीकरणीय ऊर्जा उपकरण जैसे क्षेत्रों में मूल्य शृंखला को मजबूत करना आवश्यक है। साथ ही, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और तेल जैसी अहम वस्तुओं के आयात पर निर्भरता घटाकर आत्मनिर्भरता को बढ़ाना होगा।
तीसरा, व्यापार कूटनीति के माध्यम से बाजारों का विस्तार भी एक उपाय है। टैरिफ राहत और क्षेत्रीय छूट को लेकर भारत विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) और द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से सक्रिय वार्ता कर रहा है। साथ ही, ब्रिक्स, बिम्सटेक जैसे मंचों पर दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मज़बूत करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

हमारे किसानों, मछुआरों और एम.एस.एम.ई. के हितों के साथ कोई समझौता संभव नहीं। इसके अतिरिक्त ऐसा कोई भी कदम स्वीकार्य नहीं है जो हमारी धार्मिक भावनाओं को आहत करे। भारतीयों की आस्था से जुड़े मुद्दों पर हम कभी पीछे नहीं हटेंगे।
—पीयूष गोयल, केंद्रीय वाणिज्य मंत्री
चौथा, भारत अपनी सेवा निर्यात क्षमता को और मजबूत बना सकता है। इस पर ध्यान केंद्रित कर विदेशी मुद्रा अर्जित किया जा सकता है। चूंकि टैरिफ का असर मुख्यतः वस्तुओं पर पड़ता है, जबकि सेवाएं भारत की तुलनात्मक बढ़त का क्षेत्र हैं-जैसे आईटी, परामर्श, फिनटेक, शिक्षा और स्वास्थ्य। इस बढ़त को बनाए रखने के लिए डिजिटल व्यापार समझौतों, सीमा-पार डेटा प्रवाह की सुरक्षा और आईटी सेवा निर्यात की सहजता पर जोर देना होगा।
पांचवां, भारत को घरेलू उपभोग को प्रोत्साहित कर निर्यात पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना होगा। वैश्विक टैरिफ से यह स्पष्ट है कि केवल निर्यात पर आधारित रणनीति कमजोर पड़ सकती है।

भारत पर खास असर नहीं
अमेरिकी ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग ने भारत की विकास दर मजबूत रहने की बात कही है और बीबीबी- रेटिंग बरकरार रखी है। साथ ही, भारतीय अर्थव्यवस्था को दूसरे देशों से बेहतर बताते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अमेरिकी टैरिफ का भारत की जीडीपी पर मामूली सीधा प्रभाव होगा, क्योंकि अमेरिका को भारत का निर्यात कुल जीडीपी का मात्र 2 प्रतिशत ही है। अलबत्ता, भारत सरकार द्वारा जीएसटी सुधार विकास दर के कुछ जोखिमों की भरपाई करेंगे। इससे पहले, ट्रंप के टैरिफ हमले के बीच एस एंड पी ग्लोबल रेटिंग एजेंसी ने भारत के विकास पर भरोसा जताते हुए इसकी क्रेडिट रेटिंग को बीबीबी- से बढ़ाकर बीबीबी कर दिया था। एजेंसी ने यह बदलाव 18 वर्ष बाद किया है। इस बीच, 3 सितंबर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जीएसटी सुधार 2.0 की मंजूरी की घोषणा की। जीएसटी की नई दरें 22 सितंबर से लागू होंगी। इसमें दो स्लैब होंगे- 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत। लग्जरी वस्तुओं के लिए विशेष स्लैब होगा, जिस पर 40 प्रतिशत जीएसटी लगेगा। जानकारों का कहना है कि सरकार के इस कदम से विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक हो सकती है।
भारत के लिए आगे की राह
अमेरिका द्वारा ट्रंप प्रशासन के दौरान पुनः लगाए गए टैरिफ भारत के लिए व्यापार और बाहरी क्षेत्र में नई चुनौतियां लेकर आए हैं। यह स्थिति भारत को केवल रक्षा की मुद्रा में खड़ा नहीं करती, बल्कि अपनी व्यापार नीति को पुनः संरचित करने का अवसर भी देती है। भारत इस प्रसंग को घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अधिक सक्रिय हिस्सेदारी निभाने और अपने आर्थिक सहयोगियों में विविधता लाने के लिए उपयोग कर सकता है। इस प्रकार, टैरिफ का दबाव भारत के लिए दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति को मजबूत करने का प्रेरक कारक भी बन सकता है।
ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए टैरिफ भारत के लिए एक अल्पकालिक झटका तो हैं ही, साथ ही यह एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी हैं। इन्हें केवल एक बाहरी एक बाहरी झटके के रूप में देखने के बजाय, भारत को इस अवसर का लाभ उठाकर अपने व्यापार क्षेत्र का पुनर्गठन करना चाहिए, आत्मनिर्भरता को मजबूत करना चाहिए और वस्तुओं एवं सेवाओं के क्षेत्र में खुद को एक विश्वसनीय वैश्विक भागीदार के रूप में स्थापित करना चाहिए। व्यापार कूटनीति, घरेलू सुधारों और विविधीकरण का संतुलित संयोजन न केवल भारत को टैरिफ के प्रभाव से उबार सकता है, बल्कि बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में उसकी स्थिति को और अधिक मजबूत भी बना सकता है।
















