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पितृपक्ष : तर्पण और अर्पण का पर्व

पितृपक्ष पूर्वजों के स्मरण के साथ-साथ व्यक्तित्व निर्माण, कुटुंब एकता और प्रकृति से सामंजस्य दर्शाने का अवसर है। श्राद्ध, तर्पण और पांच ग्रास की परंपरा जीवों के संरक्षण व सदाचार का संदेश देती है। यह पर्व आंतरिक ऊर्जा, अनुशासन और सांस्कृतिक जड़ों को गहराई देकर समाज को स्वस्थ व संतुलित बनाता है

Written byरमेश शर्मारमेश शर्मा — edited by Rajpal Singh Rawat
Sep 6, 2025, 11:45 pm IST
inभारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति

पूरे संसार में अपने पूर्वजों का स्मरण करने और श्रृद्धांजलि अर्पित करने की परंपरा है। लेकिन भारत में अपने पूर्वजों के स्मरण की यह पितृपक्ष की अवधि व्यक्तित्व निर्माण, कुटुम्ब महत्ता और प्रकृति से समन्वय की अद्भुत अवधि है। भारतीय और पश्चिमी चिंतन में मूलभूत अंतर है। पश्चिमी चिंतन मुख्यतः बाह्य जगत अर्थात् भौतिक सृष्टि तक सीमित है, जबकि भारतीय चिंतन लौकिक से लेकर अलौकिक सृष्टि तक व्यापक है। यहां विकास का आधार केवल बाहरी साधन नहीं, बल्कि आंतरिक ऊर्जा का संवर्धन भी माना गया है। यह विशेषता भारतीय सनातन परंपरा के सभी सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक समागमों में परिलक्षित होती है और पितृपक्ष इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।

पितृपक्ष हर वर्ष अश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक मनाया जाता है। इस वर्ष यह 8 से 21 सितंबर तक रहेगा। इन दिनों की दिनचर्या आत्मिक ऊर्जा को जाग्रत करने व आरोग्यशक्ति अर्जित करने की प्रक्रिया है, जबकि इसके कर्मकांड कुटुंब व प्रकृति से सामंजस्य साधकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं। पितृपक्ष को समझने के तीन मुख्य आधार हैं-व्यक्ति के अवचेतन की शक्ति, आंतरिक ऊर्जा, कुटुंबिक शक्ति और सामंजस्य। आंतरिक ऊर्जा और अवचेतन की शक्ति जाग्रत करने के लिए एकाग्रता आवश्यक है। इसके लिए में ब्रह्म मुहूर्त में उठना, सूर्योदय से पूर्व स्नान और सूर्य को अर्घ्य देना निर्धारित किया गया है।

नदी या सरोवर तक जाते व लौटते हुए पूर्वजों का स्मरण एकाग्र चित्त का निर्माण करता है तथा आत्मशक्ति को जाग्रत करता है, जिससे पराक्रम व पुरुषार्थ को गुणात्मकता मिलती है। स्नान-पूजन के बाद हवन तथा पांच ग्रास निकालने की परंपरा है। ये पांच ग्रास मछली, चींटी, कौवा, गाय और कुत्ते के लिए होते हैं, यानी जलचर, थलचर और नभचर, सभी प्राणियों के संरक्षण और सहअस्तित्व का संदेश इसमें निहित है। पितृपक्ष या पितरों की महत्ता का उल्लेख सभी पुराणों में मिलता है। श्रीमद्भागवत को विशेष रूप से पूर्वजों की मुक्ति हेतु रचित माना गया है, जबकि इसका विस्तृत वर्णन गरुण पुराण में मिलता है।

पितृपक्ष में दिवंगत कुटुंबजनों के स्मरण की प्रक्रिया को श्राद्ध कहा जाता है। ‘श्रद्धा’ पर केंद्रित चेतना ही श्राद्ध का आधार है। इसमें सबसे पहले पूर्वजों के प्रतीक स्वरूप जौ के आटे का एक छोटा पिंड बनाया जाता है। पिंड स्थापित कर पितृ गायत्री मंत्र के साथ 108 बार जल अर्पित किया जाता है। पूजन-अर्पण के बाद यह पिंड पीपल के नीचे रखा जाता है तथा अर्पित जल को बहते स्रोत में प्रवाहित किया जाता है। इसके उपरांत कम से कम एक अभ्यागत (आमंत्रित अतिथि) को भोजन कराने की परंपरा है। मान्यता है कि भले ही परिवारजन इस लोक से विदा हो गए हों, उनकी ऊर्जा परिवार में विद्यमान रहती है। अनेक उदाहरण हैं, जहां लोग महत्वपूर्ण कार्य आरंभ करते समय अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं।

पुराणों में पांच ग्रास केे पितृसंबंधी संदर्भ बताए गए हैं, किंतु समाज और व्यक्तित्व-निर्माण की दृष्टि से भी इनका गहरा महत्व है। इस परंपरा के माध्यम से इन प्राणियों के साथ मानवीय संबंध और संरक्षण का भाव स्थापित किया गया है।

गाय- भोजन बनने के बाद सबसे पहले गाय का ग्रास निकाला जाता है, क्योंकि इसका स्थान भारतीय जीवन और संस्कृति में सर्वोपरि है। वेदों और पुराणों में इसकी विस्तृत महत्ता वर्णित है। सतयुग से द्वापर तक लगभग अधिकांश महायुद्ध के केंद्र में गाय रही है। गाय व्यक्तिगत स्वास्थ्य, समाज और अर्थव्यवस्था के लिए अनुपम है। उसका दूध हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसे रोगों में लाभकारी माना जाता है। गोबर कृषि में उपयोगी है और गोमूत्र से औषधियां बनती हैं। गाय की श्वास से हानिकारक जीवाणु नष्ट होते हैं। यही कारण है कि भारतीय त्योहारों में विशेष रूप से गाय की पूजा की जाती है। गाय अपनी सहजता और सेवा-भाव के कारण सरलता, सहनशीलता और सज्जनता का प्रतीक है।

कुत्ता- कुत्ता स्वामी-भक्ति और निष्ठा का प्रतीक है। वह अपने प्राण देकर भी मालिक की रक्षा करता है और उसकी सूंघने की अद्भुत शक्ति उसे सदा सतर्क बनाए रखती है। संत दत्तात्रेय ने इसे आदर्श प्राणी माना और धर्मराज युधिष्ठिर की स्वर्गारोहण यात्रा में भी इसका विशेष महत्व स्पष्ट होता है। पितृपक्ष में कुत्ते के लिए ग्रास निकालकर निष्ठा और समर्पण का संदेश समाज तक पहुंचाया जाता है।
मछली- मछली जल के शुद्धिकरण और संतुलन की दूत है। नदियों और तालाबों के जल को प्रदूषण से बचाने में वह प्राकृतिक भूमिका निभाती है। कीट-पतंगों और अशुद्धियों को भोजन बनाकर जल को स्वच्छ रखती है। इसी कारण पितृपक्ष में मछलियों के लिए ग्रास डाला जाता है। भारतीय परंपरा में भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार की कथा भी मछली की महत्ता को रेखांकित करती है। मछली के लिए ग्रास निकालने का उद्देश्य यह है कि समाज जल और पर्यावरण संरक्षण का महत्व न भूले और जीवों के साथ सामंजस्य बनाए रखे।

चींटी- पितृपक्ष में चौथा ग्रास चींटी के लिए निकाला जाता है। भारतीय वाङ्मय में चींटी के महत्व पर अनेक कथाएं मिलती हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार, चींटी धरती के पुनर्चक्रण तंत्र को सक्रिय करती है, जिससे पोषक तत्व पुनर्जीवित होकर जीवन-शृंखला को निरंतर बनाए रखते हैं। उसका संरक्षण पर्यावरण संतुलन के लिए अनिवार्य है। चींटी की सूंघने की क्षमता अद्भुत होती है। उनमें अनुशासन और संगठन का अप्रतिम उदाहरण मिलता है- कतारबद्ध चलना, कार्य का विभाजन (भोजन खोजने वाली, लाने वाली और कतार अनुशासित करने वाली अलग-अलग टीमें) सामाजिक एकात्मता का परिचायक है।

चींटियां अपने बिल के आसपास अन्य कीटों को आश्रय व भोजन प्रदान करती हैं। आकार में लघुतम होते हुए भी उनका मनोबल इतना प्रबल है कि हाथी जैसे विशालकाय जीव को भी भयभीत कर देती हैं। चींटी समाज को यह संदेश देती है कि लघु रूप में भी सामूहिक अनुशासन, संगठन और अदम्य मनोबल से महान कार्य संभव हैं।

कौआ- पांचवां ग्रास कौए के लिए निकाला जाता है। कौआ अत्यंत आत्म-अनुशासित जीवन जीने वाला पक्षी है। यह भोजन की अशुद्धता तुरंत पहचानकर हानिकारक आहार ग्रहण नहीं करता। यही कारण है कि वह भूख से मर सकता है, पर बीमारी से विरले ही मरता है। कौआ जोड़े में समान आकार का होता है, जिससे नर-मादा की पहचान कठिन हो जाती है। दंपती समानता व सहभाग का यह अद्भुत प्रतीक है। काैए की दृष्टि बहुत तीव्र होती है और बुद्धि भी चपल होती है। समूह में रहकर यह अपने साथियों की रक्षा करता है और साथी के दुःख-सुख में सहभागिता दिखाता है। पौराणिक मान्यता है कि समुद्र मंथन में कौए ने अमृत का स्वाद चखा था। वहीं, सामाजिक दृष्टि से इसका संदेश है कि प्रत्येक व्यक्ति कुशाग्र बुद्धि, दूरदर्शी, अनुशासित और संगठनशील बने, पति-पत्नी के संबंध में समता रहे तथा समाज परस्पर सहयोग और चिंता का भाव बनाए रखे।

भारतीय वाङ्मय में समाज जीवन को सुंदर आचरण की प्रेरणा देने वाली अनेक कथाएं हैं। किंतु समाज केवल कथाओं से ही नहीं, बल्कि व्यवहारिक रूप से भी प्रेरणा से जुड़ा रहे, इसी उद्देश्य से पितृपक्ष के कर्मकांड निर्धारित किए गए। पुराणों में वर्णित पूर्वज महिमा के अनुरूप पितृदेवों के तर्पण की परंपरा समाज जीवन को स्वस्थ और सुंदर बनाने का साधन है। भौतिक प्रगति निस्संदेह आवश्यक है, परंतु केवल भौतिकवाद पर आधारित प्रगति स्थायी नहीं हो सकती। इसके लिए अपनी मौलिक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ चलना उतना ही आवश्यक है, जितना किसी वृक्ष के दीर्घजीवी होने के लिए उसकी जड़ों का गहरा होना। भारत की सनातन परंपरा, तीज-त्योहार और लौकिक विधान हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ों को गहराई प्रदान करते हैं। इन्हीं में पितृपक्ष की अवधि विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

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