शिक्षक दिवस पर विशेष: भारत के पुनर्निर्माण में शिक्षक की भूमिका सबसे अहम, डिजिटल युग में भी हैं "राष्ट्र निर्माता"
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शिक्षक दिवस पर विशेष: भारत के पुनर्निर्माण में शिक्षक की भूमिका सबसे अहम, डिजिटल युग में भी हैं “राष्ट्र निर्माता”

“सा विद्या या विमुक्तये” अर्थात वह शिक्षा ही सार्थक है जो मानव को अज्ञान और बंधनों से मुक्त करे

Written byवासुदेव देवनानीवासुदेव देवनानी
Sep 5, 2025, 09:20 am IST
inशिक्षा
शिक्षक दिवस पर विशेष सामग्री

राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है

भारत एक प्राचीन सभ्यता और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं वाला देश है। यहाँ शिक्षा का महत्व वेदों, उपनिषदों और गुरुकुलों से ही सर्वोच्च माना गया है। “सा विद्या या विमुक्तये” अर्थात वह शिक्षा ही सार्थक है जो मानव को अज्ञान और बंधनों से मुक्त करे। भारत के ऋषि-मुनियों, गुरुकुलों, अर्वाचीन शिक्षा पद्धति, शिक्षकों जिनसे भारत विश्व गुरु माना जाता था आदि पर अनेक देश के शोधार्थी शोध कार्य कर चुके है और आज भी कर रहें है।

अमृतकाल में भारत की चुनौतियाँ

भारत की आजादी के 75 वर्षों के बाद जब हमारा महान देश अपने “अमृतकाल” में प्रवेश कर चुका हैं, तब भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है एक नया, समृद्ध, आत्मनिर्भर और मूल्यनिष्ठ भारत का निर्माण करना। हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आजादी के सौ वर्ष पूरे होने पर यानी वर्ष 2047 तक देश के समक्ष विकसित भारत का लक्ष्य रखा है।

आज हमारा देश विश्व की चौथी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है और भारत शीध्र ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बनने की ओर अग्रसर है। अमेरिका द्वारा भारत पर पच्चास प्रतिशत टैरिफ लागू करने के बावजूद हम अपने स्वदेशी मन्त्र के माध्यम से हर बाधा को पार कर भारत को एक आत्म निर्भर राष्ट्र के रूप में बुलंदियों तक पहुँचायेंगे और देश के पुनर्निर्माण तथा फिर से विश्व गुरु बनने का साकार करेंगे। ऐसा विश्वास हर भारतवासी के हृदय में है।

भारत के पुनर्निर्माण में शिक्षक की भूमिका

लेकिन यह भी सत्य है कि भारत का पुनर्निर्माण केवल आर्थिक प्रगति से नहीं होगा, बल्कि इसके लिए संस्कारवान, आत्मनिर्भर, नवाचारी और राष्ट्रभक्त नागरिकों की आवश्यकता है और ऐसे नागरिकों को गढ़ने का कार्य केवल शिक्षक ही कर सकते हैं। भारत आज विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति वाला देश भी है। यह युवा शक्ति तभी राष्ट्र निर्माण और पुनर्निर्माण का आधार बन सकती है, जब उसे सही दिशा, उचित मार्गदर्शन और मूल्य आधारित शिक्षा मिले। यह कार्य किसी सरकार, तकनीक या व्यवस्था से अधिक शिक्षक ही कर सकता है।

महापुरुषों के विचार और शिक्षक का महत्व

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि “अगर मुझे सौ ऊर्जावान और चरित्रवान शिक्षक मिल जाएं, तो मैं कुछ ही वर्षों में भारत का कायाकल्प कर दूँगा।” इस कथन से स्पष्ट है कि भारत के पुनर्निर्माण में शिक्षक की भूमिका सर्वोपरि है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भी कहा था कि “सपना वह नहीं जो हम सोते हुए देखते हैं, सपना वह है जो हमें सोने न दे और उस सपने को साकार करने वाला सबसे बड़ा साधन शिक्षक है।” अतः यह स्पष्ट है कि भारत के पुनर्निर्माण का वास्तविक शिल्पकार वही हैं, जो आने वाली पीढ़ी के मन और मस्तिष्क को गढ़ने का कार्य करेगा। शिक्षक केवल अध्यापक नहीं, बल्कि एक राष्ट्र निर्माता हैं।

नैतिक मूल्यों और राष्ट्रप्रेम का संचार

भारत का पुनर्निर्माण केवल इमारतों, सड़कों या उद्योगों से नहीं होगा। असली पुनर्निर्माण तभी होगा जब समाज नैतिक रूप से सशक्त होगा। शिक्षक बच्चों को ईमानदारी, अनुशासन, करुणा, सहिष्णुता और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाते हैं। राष्ट्रपिता गांधीजी ने भी कहा था कि “चरित्र निर्माण के बिना शिक्षा शरीर बिना आत्मा के समान है।” अतः शिक्षक को सबसे पहले विद्यार्थियों में सच्चाई और नैतिकता का बीज बोना होगा।

आत्मनिर्भर भारत और शिक्षक की जिम्मेदारी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आत्मनिर्भर भारत का आह्वान तभी सफल होगा जब शिक्षा रोजगारपरक और कौशलयुक्त बनेगी। शिक्षक को बच्चों को केवल किताबें नहीं, बल्कि व्यावसायिक कौशल, उद्यमिता और नवाचार भी सिखाने होंगे। यह युवा शक्ति को “नौकरी खोजने वाला” नहीं, बल्कि “रोजगार देने वाला” बनाएगा।

विज्ञान, तकनीक और नवाचार की आवश्यकता

भारत के पुनर्निर्माण के लिए विज्ञान और तकनीक का उपयोग अनिवार्य है। शिक्षक को बच्चों में जिज्ञासा, तर्कशीलता और अनुसंधान की प्रवृत्ति जगानी होगी। नई खोजें और नवाचार ही भारत को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बना सकते हैं।

भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय एकता

वैश्वीकरण के दौर में भारतीय युवा कहीं न कहीं अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। शिक्षक का कर्तव्य है कि वे उन्हें भारतीय भाषाओं, साहित्य, कला और परंपराओं से जोड़ें। भारत की ताकत इसकी विविधता है लेकिन यही विविधता कई बार विभाजन का कारण भी बनती है। शिक्षक को बच्चों को समानता, भाईचारा और राष्ट्रीय एकता का पाठ पढ़ाना होगा।

पर्यावरण और सतत विकास

21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती है जलवायु परिवर्तन। शिक्षक बच्चों में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जगाएँ, उन्हें पेड़-पौधे लगाने, जल-संरक्षण और स्वच्छता का महत्व समझाएँ। यह भाव ही आने वाले भारत को सतत विकास की दिशा में आगे ले जाएगा।

नई शिक्षा नीति और डिजिटल युग

नई शिक्षा नीति (एन ई पी-2020) ने तकनीक को शिक्षा का आधार बनाया है। शिक्षक को स्वयं तकनीक में दक्ष होना होगा ताकि वह विद्यार्थियों को डिजिटल दुनिया के अवसरों और खतरों दोनों से अवगत करा सके। शिक्षक को विद्यार्थियों में ईमानदारी, अनुशासन, सहिष्णुता और सेवा-भाव पैदा करना होगा।

शिक्षक ही भारत के पुनर्निर्माण के शिल्पकार

आज़ादी के बाद भारत ने कई क्षेत्रों में प्रगति की है, लेकिन सामाजिक असमानता, बेरोजगारी, नैतिक पतन, पर्यावरण संकट और तकनीकी पिछड़ापन जैसी चुनौतियाँ आज भी हमारे सामने है। अपने “अमृतकाल” में प्रवेश कर चुका भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र की पंक्ति में पहुँच रहा है। भारत के पुनर्निर्माण में शिक्षक की भूमिका निर्विवाद है, लेकिन इनके सामने भी कुछ चुनौतियाँ भी हैं जैसे ग्रामीण और शहरी शिक्षा में असमानता, शिक्षक प्रशिक्षण की कमी, परीक्षा केंद्रित पढ़ाई का दबाव, समाज में शिक्षक की घटती गरिमा, संसाधनों की कमी और डिजिटल ज्ञान का अंतराल आदि। इन चुनौतियों से पार पाने के साथ ही नई पीढ़ी में नवाचार, नैतिकता, कौशल विकास और राष्ट्रभक्ति की भावना को जगाना आवश्यक है। तभी शिक्षक भी अपनी भूमिका को पूरी तरह से निभा सकेंगे।

Topics: Editorial5 सितंबरeducationnationशिक्षक दिवसsocietyOpinionपाञ्चजन्य विशेष
वासुदेव देवनानी
वासुदेव देवनानी
लेखक वासुदेव देवनानी राजस्थान विधानसभा के माननीय अध्यक्ष हैं। [Read more]
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