अमेरिका की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी हार्वर्ड इन दिनों ट्रम्प प्रशासन के निशाने पर है। एक ताजा खबर के मुताबिक, ट्रम्प प्रशासन ने हार्वर्ड को दी जाने वाली करीब 2.2 बिलियन डॉलर की रिसर्च फंडिंग को गैरकानूनी तरीके से खत्म कर दिया। यह फैसला बोस्टन की एक फेडरल जज ने अवैध ठहराया है। लेकिन यह विवाद सिर्फ पैसे का नहीं, बल्कि आजादी, विचारधारा और यूनिवर्सिटी की स्वायत्तता का है। आइए, इस मामले को आसान भाषा में समझते हैं।
क्या है पूरा मामला?
4 सितंबर 2025 को द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, फेडरल जज एलिसन बरोज ने फैसला सुनाया कि ट्रम्प प्रशासन ने हार्वर्ड की 2.2 बिलियन डॉलर की रिसर्च ग्रांट को गलत तरीके से रद्द किया। यह पैसा हार्वर्ड को वैज्ञानिक और मेडिकल रिसर्च के लिए मिलता था, जो कैंसर उपचार, वेटरन्स की मदद और नेशनल सिक्योरिटी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करता था। जज का कहना है कि यह कटौती संविधान के पहले संशोधन (फर्स्ट अमेंडमेंट) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है। हार्वर्ड ने इसे अपनी स्वायत्तता पर हमला बताया और कोर्ट में इसकी लड़ाई लड़ी।
क्यों शुरू हुआ यह विवाद?
ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि हार्वर्ड और कुछ अन्य आइवी लीग यूनिवर्सिटीज में यहूदी-विरोधी (एंटी-सेमिटिज्म) और “रैडिकल लेफ्ट” विचारधाराएं पनप रही हैं। खास तौर पर, 2023 में इजरायल-गाजा युद्ध के बाद हुए प्रो-फलस्तीनी प्रदर्शनों को लेकर प्रशासन ने हार्वर्ड पर निशाना साधा। ट्रम्प प्रशासन ने अप्रैल 2025 में हार्वर्ड को एक पत्र भेजकर कई मांगें की थीं, जैसे:
- यूनिवर्सिटी की गवर्नेंस में बदलाव
- हायरिंग और एडमिशन में “वैचारिक संतुलन” लाना
- कुछ एकेडमिक प्रोग्राम्स को खत्म करना
हार्वर्ड ने इन मांगों को ठुकरा दिया, क्योंकि इसके प्रेसिडेंट एलन गार्बर का मानना था कि ये मांगें यूनिवर्सिटी की आजादी और बौद्धिक स्वतंत्रता पर हमला हैं। इसके जवाब में, ट्रम्प प्रशासन ने फंडिंग रोक दी और अंतरराष्ट्रीय छात्रों को दाखिला देने की हार्वर्ड की क्षमता पर भी पाबंदी लगाने की कोशिश की।
कानूनी लड़ाई और जीत
हार्वर्ड ने ट्रम्प प्रशासन के खिलाफ दो मुकदमे दायर किए। पहला, 2.6 बिलियन डॉलर की फंडिंग कटौती को चुनौती देने के लिए, और दूसरा, अंतरराष्ट्रीय छात्रों के दाखिले पर रोक के खिलाफ। जज बरोज, जो डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा नियुक्त हैं, ने दोनों मामलों में हार्वर्ड के पक्ष में फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि प्रशासन का फंडिंग रोकना गैरकानूनी और प्रतिशोधी था। यह हार्वर्ड के लिए बड़ी जीत है, लेकिन ट्रम्प प्रशासन ने कहा कि वह इस फैसले के खिलाफ अपील करेगा।
क्या है असली मकसद?
ट्रम्प प्रशासन का दावा है कि वह यूनिवर्सिटीज में यहूदी-विरोधी माहौल को रोकना चाहता है। लेकिन हार्वर्ड का कहना है कि उसने पहले ही यहूदी और इजरायली छात्रों की सुरक्षा के लिए कई कदम उठाए हैं। यूनिवर्सिटी का मानना है कि प्रशासन का असली मकसद एकेडमिक आजादी को नियंत्रित करना और अपनी विचारधारा थोपना है। यह विवाद सिर्फ हार्वर्ड तक सीमित नहीं है—कोलंबिया, ब्राउन और यूपीईएन जैसी दूसरी यूनिवर्सिटीज भी ट्रम्प प्रशासन के दबाव में हैं। कोलंबिया ने 220 मिलियन डॉलर देकर समझौता कर लिया, लेकिन हार्वर्ड ने कोर्ट में लड़ने का रास्ता चुना।

















