अफगानिस्तान में तालिबान का नया फरमान जारी हुआ है। इसमें कहा गया है कि अब अफगानिस्तान में लोग रोमांटिक या अन्य विषयों पर नज़्म न लिखकर तालिबान और शासन की तारीफ लिखें।
kaabulnow के अनुसार तालिबान के इंसाफ मंत्रालय ने शनिवार अर्थात 30 अगस्त को “कविता प्रतियोगिताओं के लिए नियम पर कानून” की घोषणा की, जिसका अनुमोदन वहां के सुप्रीम नेता ने किया है। इस कानून में 13 धाराएं हैं, और उनमें सिलसिलेवार यह बताया गया है कि कविता को लेकर जो आयोजन होते हैं, उन्हें कैसे कराया जाना चाहिए और किस कंटेंट की अनुमति है।
यह कानून नज़्म, या कविता को लेकर होने वाले सभी आयोजनों पर लागू होगा। यह कानून लेखकों, कवियों, आयोजकों और तालिबान शासन के अंतर्गत आने वाले सांस्कृतिक संस्थानों के लिए कड़े नियम लेकर आया है।
तालिबान ने अफगानिस्तान में नागरिकों के जीवन के हर पहलू को नियंत्रित कर रखा है, जैसे कि कपड़े पहनना, लड़कियों का बाहर न निकलना, लड़कियों के लिए स्कूल बंद करना आदि, मगर अब वह दिमाग को भी कैद करना चाहते हैं।
इस कानून के अंतर्गत लड़कियों और लड़कों के बीच दोस्ती के बारे मे बात करने वाली अर्थात दोस्ती को बढ़ाने वाली कविताएं पूरी तरह से प्रतिबंधित हैं और कविता करने वाले लोग नेता के फतवे, निर्देश, हुकूम या फैसले की आलोचना नहीं कर सकते हैं।
इस कानून के अनुसार रचनाकारों की रचनाएं ऐसी होनी चाहिए कि जो इस्लामिक नैतिकता को बढ़ावा दें, उनमें शरिया आधारित सिद्धांत हों, खुद की शुद्धि को बढ़ावा दिया गया हो, सुन्नी यकीनों का पालन करने वाली रचना हो और साथ ही इस्लामिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाली रचनाएं होनी चाहिए।
जो भी कविता हो, या रचना हो उसमें इस संसार का प्यार, अनुचित इच्छाएं या फिर अनुचित भावनाएं नहीं होनी चाहिए। इसमें उन संदर्भों को प्रतिबंधित कर दिया गया है, जो तालिबान के अनुसार गैर-इस्लामिक हैं। जैसे कि फेमिनिज़्म, कम्यूनिज़्म, लोकतंत्र अर्थात जम्हूरियत, राष्ट्रवाद और नास्तिकता जैसे विषय शामिल हैं। इसका उल्लंघन करने वालों को शरिया के अनुसार ही दंड दिया जाएगा।
क्यों शांत हैं कथित प्रगतिशील लेखक
वर्ष 2021 में जब तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता हासिल की थी, तो भारत के कथित प्रगतिशील लेखकों के समूह ने प्रसन्नता व्यक्त की थी। यह जानते हुए भी कि तालिबानियों की सोच महिलाओं के प्रति कैसी है या क्या है, कई फेमिनिस्ट लेखिकाएं भी उन्हें आजादी के सिपाही के रूप में लिखने लगी थीं। इन कथित फेमिनिस्ट लेखिकाओं को तालिबानियों के सत्ता हथियाने का कदम बहुत ही क्रांतिकारी लग रहा था। कई ने तो तालिबानियों की प्रशंसा करते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी।
कथित प्रगतिशील अर्थात कट्टर कम्युनिस्ट लेखकों का भी एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा था, जो इस घटना को अमेरिकी वर्चस्व के नष्ट होने के रूप में देख रहा था और तालिबानियों को ऐसे नायकों के रूप में प्रस्तुत कर रहा था, जिन्होंने अपनी भूमि को पश्चिमी ताकतों से मुक्त कराया है।
अफगानी महिलाओं की कैद से कोई मतलब नहीं
यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो लेखक वर्ग तालिबनियों को ऐसे नायकों के रूप में देख रहा था, जिन्होंने अपनी भूमि को कथित पश्चिमी ताकतों से मुक्त कराया, वह पूरा लेखक वर्ग आज तक अफगानिस्तान में महिलाओं के साथ हुए अत्याचारों पर कुछ भी नहीं बोला। महिलाएं अभी तक अपने मन की बातें लिखकर ही व्यक्त कर लेती थीं, मगर अब तालिबानियों ने जो फरमान जारी किया है, उससे उनकी रही सही आजादी भी जाने की कगार पर है।
अफगानी महिलाएं अभी भी लिखने को अपना सबसे बड़ा हथियार मानती हैं। वर्ष 2024 में अफगानिस्तान में महिलाओं को कविता पढ़ने से भी प्रतिबंधित कर दिया है।
अफगानी महिलाएं ऑनलाइन कविता प्रतियोगिताओं के माध्यम से अपनी बात कह पा रही थीं, वे यह बता पा रही थीं कि वे क्या महसूस करती हैं, उनके साथ शासन द्वारा कैसा व्यवहार किया जा रहा है, उनकी आजादी छीनकर उन्हें कैसे कैद कर लिया गया है, यह सब वे ऑनलाइन तमाम प्रतियोगिताओं में व्यक्त कर देती थीं, मगर वर्ष 2024 में पहले तो महिलाओं को कविता पढ़ने से रोक कर और अब कविता, नज़्म आदि लिखने को लेकर तमाम नियम बनाकर तालिबानी शासन ने महिलाओं की ज़िंदगी को पूरी तरह से परदे में धकेलने का कार्य किया है।
परंतु दुर्भाग्य है कि लेखक और फेमिनिस्ट लेखिकाएं, जो तालिबान में अपना नायक खोज रही थीं, वे अफगानिस्तान की उन तमाम महिलाओं को परदे में धकेले जाने पर एकदम मौन हैं।

















