100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज’। इस अवसर पर मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के साथ सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, क्षेत्र संघचालक श्री पवन जिंदल और प्रांत संघचालक डाॅ. अनिल अग्रवाल उपस्थित थे। व्याख्यानमाला में पहले दिन एवं दूसरे दिन सरसंघचालक ने व्याख्यान दिया तथा तीसरे दिन ‘जिज्ञासा समाधान सत्र’ का आयोजन किया गया। यहां व्याख्यानमाला के संपादित अंश दिए जा रहे हैं-
प्रश्न- संघ राष्ट्रनिर्माण, चरित्र निर्माण और धर्म रक्षा का कार्य करता है। संघ और सिख परंपरा की समानताओं को समाज में स्पष्ट रूप से क्यों नहीं चित्रित किया जा रहा है? हिंदू और सिखों के बीच बढ़ती दूरी कम करने के लिए क्या संघ सिख विद्वानों के साथ बैठक करेगा ?
उत्तर- जैसे सिख गुरुओं ने किया, वैसे ही संघ भी करता है। लेकिन इसे हम कहें उससे अच्छा होगा यदि आप जैसे लोग इसे देखें और समाज में कहें तो यह अधिक प्रभावी व जल्दी परिणाम देने वाला होगा।
यह सब हम कर रहे हैं और इसे बढ़ाएंगे भी। लेकिन अभी अगर हम सीधे बोलेंगे
तो स्थिति ऐसी है कि उसे ठीक ढंग से नहीं लिया जाएगा।
वातावरण निर्माण करना ज़रूरी है। इसलिए हम वातावरण बनाएंगे, आप लोग देखें और बोलें तो परिणाम जल्दी और अधिक होंगे।
प्रश्न- सामाजिक आंदोलनों और उपलब्धियों में संघ की क्या भागीदारी रही है?
उत्तर- संघ की मूल इच्छा यह रही है कि समाज के खाते में उपलब्धियां जाएं। संघ के स्वयंसेवक अनेक सामाजिक आंदोलनों में बिना किसी बाध्यता के जुड़े हैं। संघ ने कभी अपनी अलग ध्वजा नहीं उठाई, बल्कि अच्छे कार्यों में जहां अवसर मिला, वहां सहयोग दिया। संघ की उपलब्धि यही है कि उसने प्रामाणिकता और निस्वार्थ भाव से काम करने वाले कार्यकर्ता तैयार किए हैं। अन्य संगठनों की उपलब्धियों में भी स्वयंसेवकों का योगदान रहा है। संघ की उपलब्धि यही है कि करने वाला आदमी तैयार किया है और करेगा।
संघ शताब्दी की दीर्घ यात्रा में क्या कभी किसी गृहस्थ स्वयंसेवक को सरकार्यवाह या सरसंघचालक नहीं बनाया गया ?
प्रश्न- क्या भविष्य में कोई वरिष्ठ स्वयंसेवक महासचिव (सरकार्यवाह) की कुर्सी से व्याख्यान देगा? क्या 75 वर्ष की आयु के बाद नेताओं को पद छोड़ देना चाहिए और यह परंपरा क्या राजनेताओं पर भी लागू होनी चाहिए ?
उत्तर-संघ के सबसे कठिन समय में भी श्रीमान भैयाजी दाणी, जो एक अच्छे किसान और गृहस्थ थे, सरकार्यवाह बने थे। ऐसा नहीं है कि गृहस्थ काम नहीं कर सकते, परंतु यहां आने के बाद पूरा समय देना पड़ता है। गृहस्थ को गृहस्थी भी संभालनी होती है, पर यदि वह संभली हुई हो और किसी के हाथ में दी जा सके तो वह दायित्व भी निभा सकता है।
संघ की अपेक्षा है कि जो भी स्वयंसेवक काम करें, वह गृहस्थी भी अच्छे से संभाले। आज भी गृहस्थ स्वयंसेवक जिम्मेदार पदों पर रहे हैं। प्रचारक लगभग साढ़े तीन हजार हैं। कार्यकर्ता पांच–सात लाख। गृहस्थ स्वयंसेवक बहुसंख्यक हैं और वही बोझ हमारे कंधों पर डालते हैं। संघ का ढांचा ऐसा है कि अंदर आकर ही समझा जा सकता है। 75 वर्ष का अर्थ अब उम्र हो गई है। संघ में ऐसा कोई औपचारिक नियम नहीं है। संघ में कोई औपचारिक सेवानिवृत्ति नहीं है।
स्वयंसेवक जीवन भर स्वयंसेवक रहता है। यहां ‘रिटायर’ शब्द नहीं है। स्वयंसेवक जब तक चाहें और सक्षम हों, कार्य कर सकते हैं। सरसंघचालक भी केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। कार्य की आवश्यकता के अनुसार और भी लोग दायित्व संभाल सकते हैं। संघ में यह भावना रहती है कि जब तक काम करने की क्षमता है, तब तक काम करना चाहिए।
















