संघ के सच्चे सेवक: काशीनाथ गोरे जी की वह गाथा, जो हर भारतीय को जाननी चाहिए
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संघ के सच्चे सेवक: काशीनाथ गोरे जी की वह गाथा, जो हर भारतीय को जाननी चाहिए

खिर संघ ने ऐसी प्रमाणिकता कैसे अर्जित की। इसके पीछे स्वर्गीय काशीनाथ गोरे जी जैसे लक्ष्यावधि कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने अपने जीवन का क्षण-क्षण इस तरह जिया कि वह उदाहरण बनकर आज दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया है।

Written byअरविंद कुमार मिश्राअरविंद कुमार मिश्रा — edited by Mahak Singh
Sep 1, 2025, 08:02 pm IST
in भारत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है। संघ शताब्दी वर्ष को उत्सव के रूप में नहीं मना रहा है, बल्कि इस अवसर पर उसने समाज और राष्ट्र के हित में सज्जन शक्ति निर्माण के लिए अधिक ऊर्जा के साथ कार्य करना प्रारंभ कर दिया है। किसी भी संगठन के लिए सौ साल की यात्रा छोटी नहीं होती। आज संघ समाज में इस तरह घुल-मिल गया है जैसे पानी और चीनी से बनी चाशनी में चीनी का कोई अलग अस्तित्व नहीं होता, वह पानी में स्वयं ही घुल जाती है। आज आप किसी भी व्यक्ति से पूछेंगे तो वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संघ के किसी न किसी सेवा प्रकल्प से जुड़ा होगा या उससे प्रेरित अवश्य होगा। यहां तक ​​कि राजनीतिक और वैचारिक विरोधी भी संघ की प्रामाणिकता की प्रशंसा करते हैं। आखिर संघ ने ऐसी प्रमाणिकता कैसे अर्जित की। इसके पीछे स्वर्गीय काशीनाथ गोरे जी जैसे लक्ष्यावधि कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने अपने जीवन का क्षण-क्षण इस तरह जिया कि वह उदाहरण बनकर आज दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया है। 30 अगस्त 2025 को बिलासपुर के छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान में विभाग संघचालक समेत विभिन्न दायित्वों में रहे स्वर्गीय काशीनाथ गोरे जी के जीवन कृतित्व पर केंद्रित स्मारिका का विमोचन संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में स्वयं पूजनीय सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी की गरिमामयी उपस्थिति रही। स्मारिका में काशीनाथ जी के व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित करने वाले कई सुंदर आलेख हैं। स्वर्गीय काशीनाथ जी जीवन के प्रत्येक पक्ष में होकहितकारी के रूप में आचरण करते हैं।

पिता श्री यशवंत नरहर गोरे उपाख्य अन्ना जी व माता श्रीमती कमलाबाई गोरे से मिले संस्कार व संघ के संस्कारों से ओतप्रोत पत्नी श्रीमती कीर्ति गोरे का सहयोग ने उन्हें साधारण से असाधारण व्यक्तित्व बना दिया. भारतीय खाद्य निगम में बड़े ओहदे पर रहते हुए भी कभी उन्होंने कर्तव्यनिष्ठा से समझौता नहीं किया। आपातकाल के दौरान जेल में बंद स्वयंसेवकों के परिवार की देखभाल से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन में बिलासपुर में जन-जागरण में उनकी विशेष भूमिका रही. डॉ हेडगेवार जन्मशती 1989 एवं प.पू गुरुजी की जन्मशती 2006 समारोह के अंतर्गत अनेक सेवा प्रकल्प उनकी प्रेरणा से खड़े हुए। वह जिला कार्यवाह, विभाग कार्यवाह, प्रांत सेवा प्रमुख, प्रांत व्यवस्था प्रमुख और फिर विभाग संघचालक जैसे किसी भी दायित्व में रहे हों, हमेशा समाज हित में श्रेष्ठतम देने का प्रत्यत्न करते थे। स्मारिका में प्रकाशित एक लेख में डॉ किरण वासुदेव देवरस बताते हैं कि वह पर्यावरण के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे. प्लास्टिक के दुष्परिणाम से चिंतित होकर उन्होंने कई बार कपड़े के थैलों का प्रयोग बढ़ाने के लिए बैग वितरण कार्यक्रम करवाया। वह घर में और स्वयंसेवकों से जल संरक्षण के लिए विशेष आग्रह करते थे. उनके मित्र दीपक मधुकर बल्लाल बताते हैं कि एक बार युवावस्था में उनकी पूरी मित्र मंडली दक्षिण भारत भ्रमण पर गई। इस दौरान मदुरै की जगह वह मद्रास स्टेशन तक चले गए. इस पर काशीनाथ गोरे जी ने सभी मित्रों को अर्थदंड देने के लिए सहमत किया। एफसीआई में उनके साथ कार्य कर चुके नरेंद्र भानु ने अपने आलेख में बताया कि ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह कार्यालय विलंब से आए हों या उन्हें जो कार्य सौंपा गया हो उसमें जरा भी लापरवाही हुई हो।

ऐसा अनुशासन उनके जीवन में शामिल था। स्व काशीनाथ गोरे भारतीय कुष्ठ निवारक संघ के कार्यों से कुछ इस तरह जुड़े रहे कि संस्था के सचिव श्री सुधीर देव ने उन्हें भारतीय कुष्ठ निवारक संघ का अद्वितीय अभिभावक कहा है। संघ द्वारा 2004 से 2008 तक वृहद स्तर पर नेत्र ज्योति यज्ञ आयोजित किया गया था. इसके सफल आयोजन में काशीनाथ जी की अहम भूमिका थी। मातृशक्ति को वह हमेशा प्रोत्साहित करते थे. चांपा कुष्ठ आश्रम की बालिकाओं के लिए श्रद्धेय पद्मश्री बापट जी ने छात्रावास खोलने का निर्णय लिया था। श्रीकाशीनाथ जी ने इस प्रकल्प की जिम्मेदारी राष्ट्र सेविका समिति को देने का सुझाव दिया, जिसे स्वीकार्य किया गया। राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय सह सरकार्यवाहिका सुश्री सुलभा देशपांडे बताती हैं कि तेजस्विनी छात्रावास के लिए जमीन प्राप्त करने से लेकर भवन निर्माण में काशीनाथ जी का महत्वपूर्ण योगदान था। काशीनाथ गोरे हमारे वह पूर्वज हैं जिनका जीवन चरित्र हमेशा हमें मार्ग प्रशस्त करता रहेगा। पूजनीय सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने स्मारिका के विमोचन अवसर पर अपने पाथेय में समाज से आह्वान करते हुए कहा कि देवलोकगमन कर चुके सद्पुरुष देह रूप में भले ही हमारे बीच न रहते हों लेकिन उनकी कीर्ति हमेशा रहती है। सद्पुरुष बनने के लिए अंधकार में दीपक की तरह प्रकाश फैलाने वाला रत्नदीप बनना होगा।

Topics: Rashtriya Swayamsevak SanghDr. Mohan BhagwatRam Janmabhoomi MovementSangh Centenary YearKashinath GoreRSS
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