भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में दिया गया वक्तव्य न केवल भारत की आतंकवाद विरोधी नीति का स्पष्ट परिचायक था, बल्कि यह वैश्विक मंच पर भारत की रणनीतिक सोच, कूटनीतिक दृष्टिकोण और सुरक्षा प्राथमिकताओं को भी उजागर करता है। रविवार को इस शीर्ष सम्मेलन में, जहां चीन और रूस सहित एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्ष मौजूद थे, मोदी का यह वक्तव्य नए भारत के दृढ़ संकल्पों को सामने रखने वाला रहा। न सिर्फ आतंकवाद पर उनकी सख्त टिप्पणी पाकिस्तान को सीधी चुनौती थी, बल्कि उन्होंने अल कायदा और उसके सहयोगी संगठनों का उल्लेख करते हुए पहलगाम हमले की पृष्ठभूमि और उसका भारत द्वारा कड़ा जवाब देने की जानकारी दी। मोदी ने वक्तव्य में चीन व अन्य देशों के प्रति इसमें समर्थन के लिए आभार जताया।

प्रधानमंत्री मोदी ने एससीओ मंच से आतंकवाद के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए यह स्पष्ट किया कि भारत अब केवल निंदा नहीं, निर्णायक कदमों की अपेक्षा करता है। उन्होंने खुलकर कहा कि गत 4 दशकों में भारत ने आतंकवाद के कारण हजारों नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों को खोया है। मोदी ने यह संदेश दिया कि आतंकवाद अब केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक संकट है, जिसे सभी देशों को मिलकर समाप्त करना होगा।
Always a delight to meet President Putin! pic.twitter.com/XtDSyWEmtw
— Narendra Modi (@narendramodi) September 1, 2025
मोदी ने कहा कि आतंकवाद को मानवता का शत्रु है। उनका ऐसा कहना एक प्रकार से उन देशों को भी सीधा संकेत है जो आतंकवाद को रणनीतिक साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं और उसका बचाव करते हैं। भारत की नीति अब ‘जीरो टॉलरेंस’ की है, जिसमें आतंकवाद के समर्थकों को भी जवाबदेह ठहराया जाएगा।
मोदी द्वारा अल कायदा जैसे संगठन का नाम लेना एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत है। आमतौर पर राष्ट्राध्यक्ष ऐसे मंचों पर संगठन विशेष का नाम लेने से बचते हैं, लेकिन मोदी ने स्पष्ट रूप से वैश्विक आतंकवाद के स्रोतों की ओर इशारा किया। उनका ऐसा करना साफ दिखाता है कि भारत केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक आतंकवादी नेटवर्क को चुनौती देना चाहता है। अल कायदा का नाम लेना सीधे सीधे पाकिस्तान जैसे देशों को चेतावनी है जो इन संगठनों को पनाह देते हैं या उनके कुकृत्यों को अनदेखा ही नहीं करते बल्कि उनको परोक्ष रूप से मदद भी पहुंचाते हैं। भारत की सुरक्षा नीति इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग की अपेक्षा करती है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय मंचों की अहम भूमिका हो सकती है।

मोदी ने 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले का उल्लेख करते हुए चीन और अन्य देशों को इस हमले के विरुद्ध भारत की कार्रवाई के समर्थन के लिए धन्यवाद दिया। कह सकते हैं कि उनका यह वक्तव्य दो स्तरों पर असर डालने वाला रहा, एक तो यह भावनात्मक अपील था और दूसरा रणनीतिक साझेदारी का संकेत भी था।
पहलगाम हमला भारत के लिए एक दर्दनाक घटना थी, जिसमें निर्दोष नागरिकों का धर्म पूछकर उनकी हत्या की गई थी। इसके विरुद्ध भारत की सर्जिकल स्ट्राइक को चीन जैसे देश का समर्थन दर्शाता है कि भारत अब एससीओ में अकेला नहीं, बल्कि सहयोगी देशों के साथ खड़ा है। यही वजह है कि अपने आधिकारिक वक्तव्य में मोदी ने चीन और अन्य एससीओ सदस्य देशों को भारत की आतंकवाद विरोधी कार्रवाई के समर्थन के लिए धन्यवाद दिया।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद पर चर्चाओं के अनेक दौर होने के बीच आतंकवाद के मुद्दे पर सहयोग की संभावना तलाशना उचित हीकहा जाएगा। यह वक्तव्य एससीओ की भावना को मजबूत करता है, जिसमें सदस्य देश साझा सुरक्षा हितों पर एकजुट होते हैं। इसलिए मोदी ने यह भी संकेत दिया कि भारत द्विपक्षीय मतभेदों को बहुपक्षीय सहयोग में बाधा नहीं बनने देगा।
एससीओ जैसे मंच पर भारत की यह सक्रियता दिखाती है कि अब यह देश केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं है, अब यह वैश्विक स्थिरता में योगदान देने वाला राष्ट्र है। भारत ने एससीओ में आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषयों पर नेतृत्व किया है। मोदी ने यह स्पष्ट भी किया कि भारत केवल अपने हितों की बात नहीं करता, बल्कि पूरे क्षेत्र की शांति और विकास के लिए प्रतिबद्ध है।
प्रधानमंत्री मोदी का एससीओ में दिया गया वक्तव्य बहुआयामी था। इसमें सुरक्षा, कूटनीति, भावनात्मक अपील और वैश्विक नेतृत्व की झलक थी। आतंकवाद के विरुद्ध सख्त रुख, अल कायदा का उल्लेख, पहलगाम हमले की संवेदनशीलता, चीन व अन्य देशों के प्रति आभार और भारत की भूमिका को रेखांकित करते हुए उनका यह वक्तव्य भारत की विदेश नीति की दिशा को स्पष्ट करने वाला रहा।

















