‘100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज’। इस अवसर पर मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के साथ सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, क्षेत्र संघचालक श्री पवन जिंदल और प्रांत संघचालक डाॅ. अनिल अग्रवाल उपस्थित थे। व्याख्यानमाला में पहले दिन एवं दूसरे दिन सरसंघचालक ने व्याख्यान दिया तथा तीसरे दिन ‘जिज्ञासा समाधान सत्र’ का आयोजन किया गया। यहां व्याख्यानमाला के संपादित अंश दिए जा रहे हैं-
प्रश्न-
अनेक मुसलमानों के लिए हिंदू शब्द की भौगोलिक पहचान को मानना आज आसान नहीं है, जबकि उन्हें भारतीय मुसलमान कहने में कोई आपत्ति नहीं है। मुस्लिम मजहबी स्थलों की खुदाई हो रही है। संघ के स्वयंसेवक मुसलमानों पर अत्याचार करते हैं। यदि यह दूरी और अविश्वास बना रहा, तो भारत मजबूत और विश्वगुरु कैसे बनेगा?
क्या शहरों का नाम बदलना संघ उचित मानता है?
एक भारत, श्रेष्ठ भारत हमारा संकल्प है। लेकिन क्या जातिवाद इस राह में रुकावट नहीं है?
क्या संघ यह महसूस करता है कि हिंदू समाज की एकता में वर्ण व्यवस्था बाधक है?
उत्तर-
हिंदू शब्द में एक तत्व समाहित है। इसलिए हम आग्रहपूर्वक हिंदू कहेंगे, लेकिन कोई हिंदवी कहता है, कोई भारतीय कहता है, कोई आर्य कहता है, कोई इंडिक कहता है, तो कहे इसमें कोई आपत्ति नहीं है। हम तो इन सबको समानार्थी मानते हैं। लेकिन हमारी पूर्वज परंपरा को बताने वाला एक ही शब्द है हिंदू। इसलिए हम आग्रहपूर्वक हिंदू ही कहेंगे। रिलीजन बदलने से पंथ नहीं बदलता। पहले यह मानना होगा कि हम सब लोग एक हैं, हमारी भाषाएं अलग हैं, जाति-पाति अलग हैं, पूजा अलग है। लेकिन सबसे ऊपर यह हमारा राष्ट्र है, सबसे ऊपर हमारा देश है, हमारा समाज है, हमारी संस्कृति है और वह अलग-अलग नहीं है।
शहरों और रास्तों के नाम बदलना वहां के लोगों की भावनाओं के हिसाब से होना चाहिए। आक्रांताओं के नाम पर नहीं, पर शहीद हवलदार अब्दुल हमीद, डॉ. अब्दुल कलाम, अशफाक उल्ला खान आदि के नाम पर ऐसा किया जा सकता है। जितनी प्रेरणा रामप्रसाद बिस्मिल के चरित्र से मिलती है, वही प्रेरणा अशफाक उल्ला खान से भी मिलती है। स्वयंसेवकों पर अत्याचार करने का आरोप गलत है। इसके क्या सबूत हैं? हां, कभी कुछ हो जाता है, तो वह अलग बात है। लेकिन जब भी ऐसी कोई बात हुई, मैंने उनका विरोध किया है। इसलिए हिंदू समाज या स्वयंसेवकों पर अत्याचार करने का आरोप लगाना गलत है।
यह भी देखना चाहिए कि कुछ वर्ष पहले जब चरखी दादरी में विमान हादसा हुआ था, उसमें पीड़ित होने वाले सभी विदेशी मुसलमान थे। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों ने बिना मजहब देखे उनकी मदद की। ऐसे ही जब भी कोई आपदा आती है,तो हमारे स्वयंसेवक बिना भेदभाव सबकी मदद करते हैं। इसलिए नैरेटिव के कारण जो धारणा बनी है, उसे बाजू में रखकर दो कदम आगे चलकर देखने का साहस करें, तो आपको वास्तविकता दिख जाएगी। मुस्लिम और ईसाई पहले की संस्कृति से जुड़ेंगे, बशर्ते उनको यह पट्टी पढ़ाने वाला काम बंद हो या वे नकार दें वे पूजा से अलग हैं। इसलिए समाज व संस्कृति से अलग हैं। हम मुसलमान हैं, हम ईसाई हैं, लेकिन यूरोपीय नहीं हैं। हम अरब, तुर्क नहीं, भारत के हैं। हमारे पूर्वज भारतीय हैं। जब यह उनके नेतृत्व की भाषा होगी, तब सब ठीक होगा। हिंदू समाज आतुरता से इसकी राह देख रहा है।
जातिवाद तो रुकावट है। किसी भी बात का वाद होता है तो वह रुकावट ही बनता है। ये जो जाति और वर्ण नाम की चीज है, वह कभी व्यवस्था थी, आज वह व्यवस्था है नहीं। अव्यवस्था बन गई है और जाति और वर्ण व्यवस्था के नाम पर जाति और वर्णों के अभिमान अपना खेल खेल रहे ह्रें। वास्तव में एक काल—सुसंगत नई व्यवस्था, नया रूप लेकर आनी चाहिए जो शोषण मुक्त और समता युक्त रहे। जो कालबाह्य है, वह जाने वाला है। उसकी बहुत चिंता करने की आवश्यकता नहीं। वह ठीक से जाए। जाते-जाते उपद्रव न करे, यह देखना है। सबमें अपनापन हो, हृदय का हृदय से स्पर्श हो। इस प्रकार का सहज स्वाभाविक व्यवहार आवश्यक है। ऐसा होने पर सब ठीक होगा।
















