‘100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज’। इस अवसर पर मंच पर सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के साथ सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, क्षेत्र संघचालक श्री पवन जिंदल और प्रांत संघचालक डाॅ. अनिल अग्रवाल उपस्थित थे। व्याख्यानमाला में पहले दिन एवं दूसरे दिन सरसंघचालक ने व्याख्यान दिया तथा तीसरे दिन ‘जिज्ञासा समाधान सत्र’ का आयोजन किया गया। यहां व्याख्यानमाला के संपादित अंश दिए जा रहे हैं-
प्रश्न-
तकनीक और आधुनिकीकरण के युग में संस्कार और परंपराओं के संरक्षण की चुनौती को संघ किस प्रकार देखता है?
क्या हमारी शिक्षा और प्रशासनिक प्रणाली में अब भी गुलामी मानसिकता झलकती है और क्या इनमें सुधार की गुंजाइश है?
इस प्रणाली में सुधार के लिए क्या-क्या प्रयास किए जा सकते हैं?
मिशनरी और पब्लिक स्कूलों में शिक्षा के नाम पर हमारी संस्कृति और परंपराए धूमिल की जा रही हैं। ऐसे में विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं?
क्या रंगमंच को स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर पर केवल अतिरिक्त गतिविधि के रूप में रखने की बजाय अनिवार्य विषय बनाया जा सकता है ताकि छात्र बचपन से कला और संस्कृति से जुड़ सकें?
भारतीय वैदिक गुरुकुल शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने और 64 वैदिक कलाओं को विद्यार्थियों तक पहुंचाने के लिए कौन-कौन से प्रयास हो रहे हैं?
जो लोग इस दिशा में निष्ठापूर्वक कार्य कर रहे हैं, उनकी सहायता किस प्रकार की जा सकती है ताकि वे और व्यापक स्तर पर अपना योगदान दे पाएं?
कक्षा 6 से 12 तक संस्कृत भाषा को अनिवार्य करने के विषय में संघ का क्या मत है?

उत्तर-
तकनीक और आधुनिकता का शिक्षा से कोई विरोध नहीं है। जैसे-जैसे मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है, नई-नई तकनीकें सामने आती हैं। इन्हें कोई रोक नहीं सकता। किसी भी नई तकनीक का उद्देश्य यही होता है कि वह मनुष्य के लिए उपयोगी सिद्ध हो। उसका सही उपयोग या दुरुपयोग करना केवल मनुष्य के हाथ में है। इसलिए जब भी कोई तकनीक सामने आए, तो उसका प्रयोग मानवहित में हो और उससे होने वाले संभावित दुष्परिणामों से बचाव किया जाए। तकनीक पर अधिकार मनुष्य का होना चाहिए, न कि मनुष्य तकनीक का गुलाम बन जाए।
पुराने समय में कहा जाता था कि शुरू में पहलवान लाठी को घुमाता है, लेकिन बाद में लाठी पहलवान को ही घुमाने लगती है। आज मोबाइल इसका उदाहरण है—पहले हम मोबाइल का इस्तेमाल करते थे, अब मोबाइल हमें इस्तेमाल करने लगा है। यह स्थिति न बने, इसके लिए शिक्षा अनिवार्य है।
यदि अशिक्षित व्यक्ति तकनीक या ज्ञान के सम्पर्क में आए, तो उसका दुरुपयोग भी हो सकता है। इसलिए केवल साक्षरता (लिट्रेसी) ही शिक्षा नहीं है और न ही शिक्षा केवल स्कूलिंग या सूचनाओं को अर्जित करने का नाम है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है—मनुष्य को संस्कारित और संवेदनशील बनाना, ताकि वह वास्तविक अर्थों में ‘मनुष्य’ बन सके। जब सच्ची शिक्षा मिलती है, तभी मनुष्य कठिन से कठिन परिस्थिति में भी ज्ञान और तकनीक का उपयोग मानवता के भले के लिए कर पाता है।
ऐसी शिक्षा आज अपेक्षित है। हमारे देश की प्राचीन शिक्षा प्रणाली बहुत पहले लुप्त कर दी गई। विदेशी आक्रमणों और शासन की सुविधा के लिए एक नई शिक्षा व्यवस्था थोपी गई थी। उस समय हम पर शासन करने वाले विदेशी हमें अपने अधीन रखना चाहते थे। उनका उद्देश्य केवल इस देश पर राज करना था, न कि इसके विकास के लिए काम करना। इसी कारण उन्होंने जो शिक्षा और प्रशासनिक प्रणाली बनाई, वह इस तरह से बनाई गई कि हम हमेशा उनके अधीन रहें और स्वतंत्र सोच विकसित न कर सकें।
लेकिन आज हम स्वतंत्र हैं। अब हमारा उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि प्रजापालन करना है। स्वतंत्र भारत की शिक्षा का ध्येय होना चाहिए—जनता की मानसिकता का निर्माण, आत्मविश्वास का विकास और राष्ट्रगौरव की भावना जागृत करना। बच्चों को भूतकाल की सच्ची जानकारी मिले ताकि उनमें यह आत्मबोध हो कि हम सक्षम हैं हमने इतिहास में महान कार्य किए हैं और आगे भी कर सकते हैं। यह परिवर्तन आवश्यक था और पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में जागरूकता भी बढ़ी है। नई शिक्षा नीति में इन बातों को शामिल करने का प्रयास हो रहा है। कुछ कार्य संपन्न हुए हैं और कुछ होने की प्रक्रिया में हैं। लेकिन केवल शिक्षा प्रणाली ही नहीं, प्रशासनिक प्रणाली में भी इस प्रकार का परिवर्तन लाना आज की आवश्यकता है।

जब मैं नागपुर में प्रचारक था, तब एक सज्जन मुझसे मिलने आए। वे इनकम टैक्स कॉलेज, केरल से आए थे और आईएएस/आईपीएस कैडर में चयनित हुए थे। वे अटल बिहारी वाजपेयी जी से मिलना चाहते थे। उन्होंने पूछा कि क्या मैं उनसे मुलाकात करा सकता हूं। मैंने कहा कि यहां से केवल संदेश भेजा जा सकता है, प्रत्यक्ष भेंट के लिए दिल्ली जाना होगा। बातचीत के दौरान उन्होंने अपना अनुभव साझा किया। वे बोले कि केरल में हम लोग पारंपरिक तौर पर ‘मुंडु’ और कुर्ता वगैरह पहनकर दफ्तर जाते हैं। कभी-कभी पुलिस वर्दी में जाना पड़ता है। आवश्यकता पड़ने पर ही औपचारिक वर्दी पहननी पड़ती है। लेकिन जब मैं नागपुर आया, तो यहां की गर्मी में भी मुझसे कहा गया कि ड्रेस कोड का पालन करना होगा। पहले तो मैंने खादी भंडार से कुर्ता-पायजामा और जैकेट खरीदा, मगर बाद में बताया गया कि यह पर्याप्त नहीं है, बल्कि यहां पूरा सूट, कोट-पैंट और टाई पहनना अनिवार्य है। उन्होंने हंसते हुए कहा, ‘‘इतनी गर्मी में यह ड्रेस कैसे पहनी जा सकती है? अंदर से तो आदमी उबल जाएगा!’’ यही सोचकर वे हैरान थे कि यह परंपरा कब बदलेगी।
इसी प्रसंग से उन्होंने एक और विषय उठाया। उन्होंने बताया कि प्रशासनिक सेवाओं के प्रशिक्षण में ‘ड्रिंकिंग एटिकेट्स’ तक सिखाए जाते हैं। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य देशों में, जहां ठंड अधिक होती है, वहां शायद इसकी आवश्यकता हो और विदेश सेवा के अधिकारियों को इसकी ट्रेनिंग मिलना भी स्वाभाविक है। लेकिन हर प्रशासक को यह सिखाने की क्या जरूरत है?
उनकी बात का आशय यही था कि स्वतंत्रता के बाद हमारी प्रशासनिक प्रणाली और शिक्षण-पद्धति में मूलभूत परिवर्तन होना चाहिए। केवल विदेशी परंपराओं की नकल करने के बजाय हमें अपनी संस्कृति, अपने मूल्य और अपनी जीवन-पद्धति के अनुरूप शिक्षा और प्रशिक्षण देना चाहिए। यही वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ है।

यह केवल रिलीजियस विषय नहीं है, बल्कि सामाजिक विषय है। हमारे रिलीजन अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन समाज के नाते हम सब एक हैं। इसी समझ के कारण यह विषय पावन है। जैसे-माता-पिता का सम्मान करना, बड़ों के सामने विनम्र रहना, अहंकार से दूर रहना—ऐसी बातें हर रिलीजन में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। कहीं यदि इनका पालन अलग ढंग से होता है, तो उसके अपने कारण हो सकते हैं। मैं किसी अन्य परंपरा को खराब नहीं कहता, लेकिन अपनी परंपरा भी श्रेष्ठ है। इसी प्रकार की शिक्षा मिलनी चाहिए, क्योंकि यह सार्वभौमिक मानव मूल्य हैं। अच्छे आचार और गुड मैनर्स लगभग सार्वभौमिक होते हैं। बस कुछ छोटी-सी बातें, जैसे—भोजन हाथ से करना या चम्मच-कांटे से खाना—इनमें अंतर होता है। लेकिन वह अंतर भी बहुत मामूली है।
अब भाषा का प्रश्न लें। हमें अंग्रेज नहीं बनना है, लेकिन अंग्रेजी एक भाषा है। भाषा सीखने में क्या दिक्कत है? मेरे घर में तीन पीढ़ियों से संघ के संस्कार हैं और उनमें कोई कमी नहीं रही। जब मैं आठवीं कक्षा में था, तब पिताजी ने मुझे ऑलिवर ट्विस्ट और प्रिजनर ऑफ जेंडा जैसी अंग्रेजी पुस्तकें पढ़ने को दीं। मैं अनेक अंग्रेजी उपन्यास पढ़ चुका हूं। इससे मेरे हिंदू-प्रेम में रत्ती भर भी अंतर नहीं आया और न ही आ सकता है। भाषा के रूप में किसी साहित्य को पढ़ना केवल कथावस्तु और बोध प्राप्त करने का साधन होता है। इसमें कोई दुष्परिणाम नहीं है। समस्या तब होती है, जब हम केवल विदेशी साहित्य ही पढ़ते हैं और अपनी परंपरा के साहित्यकारों को छोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए, अगर हम चार्ल्स डिकेन्स तो पढ़ें, लेकिन प्रेमचंद की कहानियां छोड़ दें, तो यह उचित नहीं होगा।
हमारे यहां साहित्य की कितनी महान परंपराएं हैं! रामायण, महाभारत से लेकर उपनिषदों तक की कथाएं आज भी समाज को दिशा देती आ रही हैं। हर भाषा में उत्कृष्ट साहित्य और समृद्ध परंपरा उपलब्ध है। यह सब सीखना चाहिए। इनकी शिक्षा समाज के हर वर्ग तक पहुंचनी आवश्यक है। मिशनरी स्कूल हो, मदरसा हो, कुछ भी हो, रिलीजियस एजुकेशन एक अलग बात है। लेकिन सोशल मेरिट के नाते हमारा सबका सिलेबस एक है।
भारत की परंपराएं प्राचीन काल से ही महान और सबको जोड़ने वाली रही हैं। इसका एक उदाहरण मुझे याद है—अकोला में विजयदशमी उत्सव के अवसर पर, जब मैं नगर प्रचारक था, तब श्रीमान आरिफ बेग अध्यक्ष के रूप में आए थे। उन्होंने कहा था कि इस देश की परंपराएं अनमोल और सबके लिए हितकारी हैं। उदाहरणस्वरूप उन्होंने रामायण का एक प्रसंग सुनाया। जब सीता जी के गहने सुग्रीव आदि के पास पहुंचे तो यह पहचानना था कि क्या वे वास्तव में सीता जी के हैं। उस समय लक्ष्मण को भी बुलाया गया और उनसे पूछा गया कि क्या वे गहनों को पहचान सकते हैं। लक्ष्मण ने उत्तर दिया, ‘‘मुझे केवल उनके चरणों के गहने दिखाइए, क्योंकि मैंने कभी सीता जी के मुख की ओर दृष्टि नहीं डाली। मैं सदैव उनके चरणों की ओर ही देखता था।’’
इस छोटे-से प्रसंग से हमारी संस्कृति की कितनी उच्च मर्यादा और जीवन-मूल्य झलकते हैं! यही संस्कार सभी में होने चाहिए। यह शिक्षा हमें न केवल परिवार और घर में, बल्कि समाज और शिक्षा-संस्थानों में भी मिलनी चाहिए। यह उदाहरण हमारे लिए अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक है और हमें और बेहतर मनुष्य बनाता है। अब प्रयास यह होना चाहिए कि जहां तक हमारी शक्ति है, हम इन संस्कारों को अपने घरों और विद्यालयों से शुरू करें। नई शिक्षा नीति में ‘पंचकोशी शिक्षा’ का तत्व स्वीकार किया गया है, जिसमें शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा—सभी कोशों का सर्वांगीण विकास हो। इसमें शिक्षा के साथ कला, क्रीड़ा और योग का भी समावेश है।
निश्चित रूप से, अतीत में जो विपरीत शिक्षा प्रणाली थोपी गई थी, वहां से अचानक पूर्ण परिवर्तन संभव नहीं है। लेकिन अब बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। यह क्रम रुके नहीं और धीरे-धीरे पूर्णता की ओर बढ़े—यही आवश्यक है। इस कार्य में समय लगेगा। इसलिए कला और संगीत जैसी चीजों को केवल करिकुलर गतिविधि मानकर अनिवार्य विषय नहीं बनाया जा सकता। प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक कलाकार छिपा होता है। संगीत, नृत्य और कला जैसी विधाएं मनुष्य को पूर्ण बनाती हैं।
हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि जिस मनुष्य में संगीत, नाटक या नृत्य का कोई भी भाव नहीं है, वह अधूरा है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति किसी कला में प्रशिक्षित ही होना चाहिए, लेकिन इतना तो होना चाहिए कि वह अच्छा संगीत सुनकर उसकी सुंदरता समझ सके। जिस व्यक्ति के जीवन में कला या संगीत का कोई स्थान नहीं है, उसे हमारी परंपरा में ‘बिना पूंछ-सींग वाला पशु’ कहा गया है। इसलिए कला और संगीत का गुण स्वाभाविक रूप से जीवन में होना चाहिए। लेकिन मेरा मानना है कि इसे अनिवार्य बनाने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा। मेरा अनुभव है कि जब किसी चीज को ज़बरदस्ती थोपा जाता है, तो उसमें प्रतिकूल प्रतिक्रिया होती है।
एक उदाहरण लें–एक व्यक्ति के पास कुत्ता था। डॉक्टर ने उसे दवाई पिलाने का तरीका बताया कि मजबूती से पकड़कर उसका मुंह खोलो और जब तक दवाई निगल न ले, छोड़ो मत। शुरू में तो ठीक रहा, लेकिन धीरे-धीरे कुत्ता समझ गया और दवाई के समय भागने लगा, यहां तक कि काटने को हो गया। एक दिन गलती से दवाई जमीन पर गिर गई, तो वही कुत्ता जाकर चाटने लगा। यानी अगर स्वाभाविक रूप से दिया जाए, तो वह स्वीकार कर लेता है, लेकिन जबरन देने से विरोध पैदा होता है। इसी तरह, संगीत और कला भी मनुष्यता का स्वाभाविक झुकाव हैं, इन्हें जगाना पड़ता है, थोपना नहीं। यह रुचि घरों में भी विकसित हो सकती है और विद्यालय में भी।
मेरा अनुभव यह है कि संगीत की रुचि हमें घर और विद्यालय दोनों से मिली। मेरे चाचा गाने में निपुण थे, रेडियो पर भी गाते थे। उनके अभ्यास के लिए घर में रिकॉर्ड्स आते थे, जिन्हें हमें सुनना ही पड़ता था।
धीरे-धीरे यह हमारी रुचि बन गई। विद्यालय में हमारे शिक्षक कविता सिखाते और पूरी कक्षा से उसे मिलकर गवाते थे। हमारी मातृभाषा की कविताओं में छंद और लय होती है। इस अभ्यास से कानों में स्वर की पहचान विकसित होती है और संगीत के प्रति स्वाभाविक आकर्षण पैदा होता है। आज हम परिवार व जीवन को उन परंपराओं से दूर ले आए हैं, जो हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही हैं। विद्यालयों में भी ऐसी शिक्षा होनी चाहिए। अक्सर देखा जाता है कि पाठ्यक्रम में ऐसी कविताएं नहीं होतीं, जिन्हें बच्चे गाकर सुंदरता का अनुभव कर सकें। यह ध्यान देना होगा कि शिक्षा केवल अनिवार्य नियमों से नहीं सुधरती।
वैदिक काल की चौसठ कलाओं में से जो आज भी प्रासंगिक हैं, उन्हें बच्चों तक पहुंचाना चाहिए। असल में हमें शिक्षा की मुख्यधारा को गुरुकुल परंपरा से जोड़ने की आवश्यकता है। गुरुकुल शिक्षा प्रणाली हमारी अपनी जड़ों में है और इसी जैसी शिक्षा-पद्धति आज फिनलैंड में चल रही है। बस आश्रम में रहने की अनिवार्यता उसमें नहीं है। फिनलैंड शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया का अग्रणी देश माना जाता है। वहां इस शिक्षा-पद्धति को चलाने के लिए विशेष यूनिवर्सिटी बनाई गई हैं जो केवल शिक्षकों की तैयारी करती हैं। वहां जनसंख्या कम है, इसलिए बाहर से भी लोग आकर पढ़ते हैं। वहां आठवीं कक्षा तक शिक्षा मातृभाषा में दी जाती है, चाहे बच्चा किसी भी देश या भाषा का क्यों न हो। प्रत्येक 10 छात्रों पर एक शिक्षक-शिक्षिका होती है। प्रारंभिक चार कक्षाओं में तो बच्चों के साथ रहना, घूमना और जीवन के अनुभव लेना ही शिक्षा का भाग माना जाता है। किताबें और क्लासवर्क बाद में आते हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि गुरुकुल पद्धति के सबसे करीब जो मॉडल है, वही फिनलैंड की शिक्षा प्रणाली है। हमें भी अपनी शिक्षा को गुरुकुल परंपरा से जोड़कर आगे बढ़ाना होगा। संस्कृत भाषा के बारे में भी यही बात लागू होती है। इसे आवश्यक रूप से जीवन का हिस्सा बनाया जाए, लेकिन अनिवार्यता से थोपना उचित नहीं है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि आनंदपूर्वक सीखने का वातावरण तैयार करना होना चाहिए। सिखाने का मूल तत्व यह है कि शिक्षक स्वयं में उत्कृष्ट हो और छात्र के स्तर पर उतरकर उसे समझाए। यही वह कला है जिससे शिक्षा में रस उत्पन्न होता है। वास्तविक शिक्षा बाहर से थोपी नहीं जाती, बल्कि मनुष्य के भीतर पहले से मौजूद ज्ञान और क्षमता को प्रस्फुटित करने की कला है। यह सब संस्कृत परंपरा से ही आती है। इसलिए हमें इसका अधिकाधिक उपयोग करना चाहिए और इसे प्रोत्साहित करना चाहिए।
घर-परिवार में स्तोत्र-पाठ जैसी परंपराओं को स्थान देना चाहिए, क्योंकि उनमें गहरे संस्कार और सूक्ष्म आनंद निहित हैं। उनकी बारीकियां और अर्थ जीवन को न केवल ज्ञानवान, बल्कि मनोरंजक और प्रेरक भी बनाते हैं। संस्कृत में एक सूक्ति है- तक्रं शक्रस्य दुर्लभम्, जिसका अर्थ है छाछ (मट्ठा) इंद्र के लिए भी दुर्लभ है। उसके पहले तीन प्रश्न हैं-भोजनान्ते च किं पेयम्? जयन्तः कस्य वै सुतः? कथं विष्णुपदं प्रोक्तम्? तक्रं शक्रस्य दुर्लभम्।
अर्थात् भोजन के बाद क्या पीना चाहिए? – मट्ठा।
जयंत किसका पुत्र है? – जयंत इंद्र का पुत्र है।
विष्णुपदम् कैसे कहा गया है? – दुर्लभम्।
यदि संस्कृत को रोचक ढंग से पढ़ाया जाए, तो बच्चों में स्वतः रुचि उत्पन्न होगी। शिक्षा केवल अनिवार्यता से नहीं, बल्कि आनंद और रुचि से आगे बढ़ती है।
संस्कृत का गहन अध्ययन सभी के लिए आवश्यक न सही, लेकिन उसका एक कामचलाऊ ज्ञान तो प्रत्येक व्यक्ति के पास होना ही चाहिए—कम से कम वह जो भारत और उसकी संस्कृति को समझना चाहता है।

















