नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तृतीय और अंतिम दिवस पर ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने विदेशों में संघ कार्य को लेकर प्रश्न का उत्तर दिया।
प्रश्न – 100 वर्षों के बाद संघ अपनी अंतरराष्ट्रीय भूमिका के बारे में क्या सोच रहा है? विदेशों में संघ का कार्य कैसे हो सकता है?
उत्तर – विदेशों में “हिंदू स्वयंसेवक संघ” नाम से संगठन कार्य कर रहे हैं। वे अपने-अपने देश में पंजीकृत चैरिटी ऑर्गनाइजेशन हैं। उनकी कार्यपद्धति मूल रूप से वही है जो भारत में संघ की है। वहाँ भी शाखाएँ लगती हैं, शाखा चलाने का तंत्र है, और उसी के माध्यम से व्यक्ति निर्माण होता है। वे स्वयंसेवक हिंदू समाज के अनेक कार्यों में सक्रिय रहते हैं तथा वहाँ के स्थानीय समाज से भी संपर्क रखते हैं।
भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल भारत के भीतर ही कार्य करेगा। विदेशों में जो कार्य हो रहा है, वह हिंदू स्वयंसेवक संघ के नाम से और वहाँ के कानून के अनुसार चलता है।
अंतरराष्ट्रीय भूमिका की दृष्टि
अब रही अंतरराष्ट्रीय भूमिका की बात— तो मैंने पहले भी कहा है कि विश्व के सभी देश अपने-अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर, अपनी विशिष्टता और अपनी सीमाएँ बनाए रखते हुए, सहयोगी भूमिका में आएं। केवल स्वार्थ साधन तक सीमित न रहें। इसके लिए निरंतर आपसी संपर्क आवश्यक है। यह कार्य सरकार का नहीं है, बल्कि व्यक्ति-से-व्यक्ति संपर्क का है।
इसी दृष्टि से हम आउटरीच बढ़ा रहे हैं। विशेष रूप से पड़ोसी देशों को पहले जोड़ने का प्रयास हो रहा है। यह मैंने कल भी स्पष्ट किया था।

















