नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तृतीय और अंतिम दिवस पर ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने समानता में विश्वास, हिंदू राष्ट्र के उद्बोधन, संघ में बदलाव को लेकर किए गए प्रश्नों का उत्तर दिया।
प्रश्न – भारत बुद्ध का देश है, इसलिए यहाँ शांति अपेक्षित है। तो फिर संघ युद्ध हेतु शस्त्र की बात क्यों करता है?
- संघ समानता में विश्वास क्यों नहीं करता?
- “हिंदू राष्ट्र” क्यों कहा जाता है, “सनातन राष्ट्र” क्यों नहीं?
- क्या संघ अपने विचारों में समय के साथ बदलाव करता है? यदि हाँ, तो संघ के स्थिर विचार कौन से हैं और किन मुद्दों पर लचीलापन दिखाया जा सकता है?
उत्तर – सबसे पहले, भारत बुद्ध का देश है, यहाँ शांति अपेक्षित है और वास्तव में अपेक्षाकृत शांति है, और रहनी भी चाहिए। लेकिन बाकी सभी देश बुद्ध के देश नहीं हैं। जब वे युद्ध की भाषा बोलते हैं तो हमारे लिए भी शस्त्र आवश्यक हो जाते हैं। जैसे मैंने कल कहा था, हम व्यायाम किसी को पीटने के लिए नहीं करते, वैसे ही हम शस्त्रबल को बढ़ाते हैं तो किसी पर आक्रमण करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी रक्षा के लिए।
भारत का संयम और शस्त्रबल
यदि हम शस्त्र केवल आक्रमण के लिए रखते, तो अब तक यह स्पष्ट दिखाई देता। हमारे पास क्षमता होते हुए भी हमने बार-बार संयम रखा है, क्योंकि हम खून-खराबा नहीं चाहते, हम शांति चाहते हैं। हमारा देश बुद्ध का देश है। लेकिन जब अन्य देश युद्ध करेंगे, तो हमें कम से कम अपनी रक्षा के लिए तत्पर रहना ही पड़ेगा।
संघ की प्रार्थना और शक्ति का भाव
संघ की प्रार्थना में भी यही भाव है — “अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम” अर्थात हे प्रभु! हमें ऐसी शक्ति दे, जिसे विश्व में कभी कोई चुनौती न दे सके। हमने यह कभी नहीं माँगा कि हम दूसरों को जीतने वाली शक्ति प्राप्त करें। इसलिए इतना आवश्यक तो है और उसका होना चाहिए।
समानता और विविधता पर संघ का दृष्टिकोण
जहाँ तक समानता का प्रश्न है, संघ समानता में विश्वास करता है। संघ मानता है कि समाज में विशिष्टता और विविधता है, और उन सबकी मान्यता स्वीकार्य है। परंतु इसके बावजूद हम सबकी एक समानता भी है। उसी के आधार पर हिंदुत्व है और उसी के आधार पर संघ है।
“हिंदू राष्ट्र” और “सनातन राष्ट्र” की अवधारणा
अब “हिंदू राष्ट्र” या “सनातन राष्ट्र” की बात पर— यदि हम “सनातन राष्ट्र” कहें तो लोग भ्रमित हो सकते हैं। जबकि “हिंदू राष्ट्र” कहने से बात तुरंत स्पष्ट हो जाती है, यह हमारा अनुभव है। इसलिए हम “हिंदू राष्ट्र” शब्द का प्रयोग करते हैं।
संघ के स्थिर और परिवर्तनशील विचार
संघ समय के साथ अपने विचारों में बदलाव करता है। लेकिन कुछ विचार स्थिर हैं-
- व्यक्ति निर्माण — व्यक्ति के निर्माण से समाज के आचरण में परिवर्तन संभव है, और यह संघ ने करके दिखाया है।
- समाज का संगठन — समाज को संगठित करो, बाकी परिवर्तन अपने आप होते हैं। गाड़ी हमेशा घोड़े के पीछे चलती है, घोड़े के आगे नहीं। पहले समाज बदलता है, तब व्यवस्थाएँ सुधरती हैं, क्योंकि व्यवस्था चलाने वाले लोग समाज से ही आते हैं और समाज के वातावरण का उन पर प्रभाव होता है।
- हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है।
इन तीन बातों को छोड़कर, बाकी सभी विषयों पर संघ समय और परिस्थिति के अनुसार बदलाव कर सकता है।

















