भारत को समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान जरूरी: मोहन भागवत
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भारत को समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान जरूरी: मोहन भागवत

'100 वर्ष की संघ यात्रा- नए क्षितिज' कार्यक्रम का आखिर दिन प्रश्नोत्तर का था, जिस कारण ढ़ाई घंटे तक चला और इस दौरान 218 प्रश्नों का जवाब, जिन्हें 21 समूहों में बांटा गया था, सरसंघचालक मोहन भागवत ने दिया।

Written byLalit FularaLalit Fulara
Aug 29, 2025, 04:00 pm IST
in संघ @100

नई दिल्ली: विज्ञान भवन में आयोजित संघ के तीन दिवसीय कार्यक्रम का गुरुवार को समापन हुआ। सरसंघचालक मोहन भागवत ने संघ को लेकर लोगों के मन में उठने वाले कई सवालों का जवाब दिया। ‘100 वर्ष की संघ यात्रा- नए क्षितिज’ कार्यक्रम का आखिर सत्र प्रश्नोत्तर का था, जिस कारण ढ़ाई घंटे तक चला और इस दौरान 218 प्रश्नों का जवाब, जिन्हें 21 समूहों में बांटा गया था, सरसंघचालक मोहन भागवत ने दिया। प्रश्नकर्ताओं ने सरसंघचालक मोहन भागवत से तकनीक और आधुनिकरण के युग में संस्कार, देश की शिक्षा प्रणाली में गुलामी की मानसिकता की झलक, भारतीय वैदिक गुरुकुल शिक्षा को मुख्यधारा से जोड़ने के संघ के प्रयास, 6 से 12 तक संस्कृत भाषा को अनिवार्य करने में संघ का मत समेत कई सवालों को पहले समूह में शामिल किया गया जिनका जवाब संघ प्रमुख ने विस्तार से दिया।

मदरसों और मिशनरी स्कूलों में भी पढ़ाई जानी चाहिए रामायण-महाभारत
उन्होंने कहा कि तकनीकी और आधुनिकता का शिक्षा से विरोध नहीं है। मनुष्य का ज्ञान जैसे-जैसे बढ़ता है, नई तकनीक आती है। नई तकनीकी का उपयोग करना मनुष्य के हाथ में है। अगर टेक्नोलॉजी से दुष्परिणाम होने वाले हैं, तो बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपने देश की शिक्षा बहुत पहले लुप्त हो गई थी। विदेशी शिक्षा पद्धति लाई गई ताकि हम सदा विदेशी शासन के गुलाम बने रहे। उन्हें इस देश का विकास नहीं, इस पर राज करना था। इसलिए उस दौरान सारी शिक्षा प्रणाली इसी को नजर में रखते हुए बनाई गई। अब हम स्वतंत्र हैं और नई शिक्षा नीति लाई गई है। जिसमें पंचकोशीय शिक्षा का तत्व मान्य किया गया है। जिसमें सभी कोशों कला, क्रीडा और योग को विकसित करना होगा। उन्होंने कहा कि भाषा के नाते अंग्रेजी सीखने में कोई दिक्कत नहीं है। हमारे यहां रामायण, महाभारत से लेकर साहित्य की कितनी उच्च परंपरा है, इसकी शिक्षा सबको मिलनी चाहिए, चाहे मिशनरी स्कूल हों या मदरसे।

भारत को समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान होना चाहिए
सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि मुख्यधारा को गुरुकुल शिक्षा से जोड़ना चाहिए। उन्होंने फिनलैंड के गुरुकुल मॉडल का उदाहरण दिया और कहा कि वहां की शिक्षा दुनिया में अग्रगण्य है। उन्होंने कहा, अपनी शिक्षा को गुरुकुल पद्धति से जोड़ना का प्रयास करना होगा। संस्कृत के सवाल पर उन्होंने कहा कि संस्कृत को अनिवार्य क्यों करें? भारत को जानना है, तो संस्कृत भाषा का ज्ञान अच्छा है। उसे जानना चाहिए। मूल स्त्रोत जानना है तो संस्कृत जरूर है। संस्कृत का काम चलाऊ ज्ञान कम से कम भारत को समझना चाहने वाले प्रत्येक को होना चाहिए। शिक्षा मनुष्य के अंदर के ज्ञान को प्रस्फुटित करने की कला है।

बीजेपी के साथ नहीं संघ का कोई मनभेद
अगले क्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत से सरकार के साथ अच्छे संबंधों, बीजेपी-संघ के मतभेद के मुद्दों और नेताओं के जेल में रहने के पदमुक्त कानून को लेकर सवाल किया गया था। उन्होंने कहा कि हमारा हर सरकार के साथ अच्छा कॉन्डिनेशन रहता है। सिर्फ BJP के साथ ही नहीं। सरसंघचालक मोहन भागवत ने साफ किया कि बीजेपी और संघ के बीच कोई मतभेद नहीं है। उन्होंने कहा, मतभेद के मुद्दे क्या हैं? मतभेद में मुद्दा कुछ नहीं है। हमारे मनभेद नहीं हैं। मोहन भागवत ने कहा कि सबकुछ संघ तय करता है ये पूर्णत: गलत बात है। ये हो ही नहीं सकता है।

उन्होंने कहा कि हम तय करते तो इतना समय लगता क्या? यह बात बिना नाम लिये सरसंघचालक ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को लेकर कही। उन्होंने कहा कि हम सलाह दे सकते हैं, डिसीजन उस फिल्म में उनका है। शाखा के फील्ड में हमारा है। इससे यह साफ हो गया है कि बीजेपी और संघ के बीच कोई मतभेद नहीं है और संघ बीजेपी के कार्यों में दखल भी नहीं देती है। संघ का काम है शाखा चलाना। 5 साल की सजा पर 30 दिन के अंदर पद छोड़ने वाले कानून को लेकर सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि नेतृत्व पारदर्शी और स्वच्छ होना चाहिए। संघ की भी यही सहमती है।

अच्छे कार्यों के लिए संघ की मदद मांगी जाती है तो हम देते हैं
सरसंघचालक मोहन भागवत से पूछा गया था कि कुछ राजनीतिक दल संघ के विरोधी हैं। इस पर उन्होंने जवाब दिया कि अच्छे कार्य के लिए जो संघ की मदद मांगता है, उसे दी जाती है। आपको सिर्फ एक पार्टी दिखती है, जिनको हम सहायता कर रहे हैं। हम किसी को पराया नहीं मानते हैं। उधर से रुकावट है। हमारी तरफ से कोई रुकावट नहीं है। हम उनकी इच्छा का सम्मान करके रुक जाते हैं। मोहन भागवत ने कहा कि संघ को लेकर लोगों का मन परिवर्तन हमारा रवैया रहता है। उनसे बढ़ती बेरोजगारी पर भी सवाल पूछा गया, जिसके जवाब में सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि डिग्री नौकरी के लिए चाहिए ये मानसिकता गलत है। उन्होंने कहा कि हमें यह सोच रखनी चाहिए कि हम नौकरी देने वाले बनेंगे।

घर में होनी चाहिए 3 संतान, DNA सबका एक
प्रश्नोत्तरी के भाग 2 में सरसंघचालक मोहन भागवत से संघ, डेमोग्राफी, डीएनए, बांग्लादेशी घुसपैठिये और अखंड भारत समेत कई सवाल पूछे गये थे। उन्होंने कहा कि देश की डेमोग्राफी बदलती है, तो उसके कुछ परिणाम निकलते हैं। उनमें से एक परिणाम देश का विभाजन भी है। सरसंघचालक ने कहा कि मुस्लिमों की संख्या बढ़ने से मतांतरण यानी कन्वर्जन की शंका मन में रहती है। कन्वर्जन भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं है। इस्लाम और कैथोलिक भी इसे ठीक नहीं मानते हैं। उन्होंने घर वापसी पर भी कहा कि जो लोग वापस आना चाहते हैं, स्वेच्छा से आएं, जोर जबरदस्ती नहीं।

मोहन भागवत ने कन्वर्जन के लिए पैगंबर मोहम्मद के चाचा का उदाहरण दिया, जिनको पैगंबर के अनुयायी कलमा पढ़ना चाहते थे, लेकिन पैगंबर मोहम्मद ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारा डीएनए एक है, यह सही है। बांग्लादेशी घुसपैठियों पर सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि परमिशन लेकर आना चाहिए। अगर नहीं मिलती है तो नहीं आना चाहिए। उन्होंने कहा, अपने देश में मुसलमान हैं, उनको भी जरूरत है, उनको रोजगार दीजिये। जो बाहर से आये हैं, उनको क्यों दे रहे हो। सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि जिनका जन्मदर तीन से कम होता है, वो धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं। तीन से ऊपर मेंटन होता है। तीन संतान होने से माता पिता और संतानों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। तीन संतान जिसकी होती है, वो इगो मैनेजमेंट सीख लेते है। इसलिए भारत के प्रत्येक नागरिक ने यह देखना चाहिए कि उनके घर में तीन संतान होनी चाहिए।

सबसे ऊपर हमारा राष्ट्र, हमारी संस्कृति

उनसे एक सवाल हिंदू और मुस्लिम संघर्ष पर भी पूछा गया था। उन्होंने कहा कि पूर्वज परंपरा को व्यक्त करने वाला एक ही शब्द है ‘हिंदू’, उसे हम कहेंगे। आप हिंदवी कहेंगे तो कहो, शब्दों के झगड़ों में संघ नहीं पड़ता है। सबसे ऊपर हमारा राष्ट्र, हमारी संस्कृति इन शब्दों के कारण ही हिंदू और मुस्लिम आया है। उन्होंने कहा- क्या बदला है? पूजा बदली है और क्या बदला है? सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि समाज का संगठन करना आवश्यक है। जब से इस्लाम भारत में आया तब से यहां है, और रहेगा। इस्लाम नहीं रहेगा, ऐसा सोचने वाला हिंदू सोच का नहीं है। पहले हमें यह मानना होगा कि हम सब एक हैं, और पूजा अलग है सिर्फ। जाति अलग है। सबसे ऊपर हमारा राष्ट्र है, हमारी संस्कृति है। इसके लिए उन्होंने मौलाना अबुल कलाम आजाद के इंटरव्यू का उदाहरण दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि रिलीजन बदलने से कौम नहीं बदलती। उन्होंने कहा, हमारी आइडेंटिटी एक ही है, हम हिंदू हैं। हम भारतीय हैं।

रास्तों का नाम बदलना मुस्लिम विरोध नहीं
सड़कों के नाम बदले जाने के सवाल पर सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि आक्रांताओं के नाम नहीं होने चाहिए। अब्दुल हमीद नाम होना चाहिए। एपीजे अब्दुल कलाम का नाम होना चाहिए। देश के नाते हम एक हैं। समाज के नाते एक हैं। रास्तों का नाम बदलना, इसमें मुस्लिम विरोध नहीं है। सरसंघचालक ने कहा कि ऐसा कोई सबूत है, संघ ने किसी मुस्लिम पर आक्रमण किया हो। संघ किसी का रिलीजन नहीं देखता सबकी सेवा करता है। हिंदू मुस्लिम संघर्ष एकतरफ दृष्टिकोण के नैरेटिव के कारण है। उन्होंने कहा कि संघ का स्वयंसेवक अत्याचार में विश्वास नहीं रखता।

Topics: Mohan BhagwatSanghSangh programSangh centenaryBJPRSS
Lalit Fulara
Lalit Fulara
उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के सुदूर स्थित छोटे से गाँव 'पटास' में पैदाइश. कला-साहित्य में विशेष रुचि. पहला नॉवेल 'घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी' प्रकाशित. विगत 12 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय. करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर से हुई और उसके बाद ज़ी न्यूज़, न्यूज़18, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला और इंडियाडॉटकॉम होते हुए वर्तमान में पांचजन्य डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर के तौर पर कार्यरत. पत्रकारिता में एम.ए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के नोएडा कैंपस से किया है. [Read more]
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