एक कहावत है कि राजनीति अजीब बेडफेलो और गठजोड़ बनाती है। वर्तमान अशांत भू-राजनीति और भी नाटकीय गठबंधन कर रही है। 27 अगस्त से भारत के खिलाफ ट्रम्प के अतिरिक्त टैरिफ लगने के बाद भारतीय कूटनीति खुद को नए समूहों के लिए तैयार कर रही है। इसका उद्देश्य भारत के तत्काल और दीर्घकालिक राष्ट्रीय उद्देश्यों को पूरा करना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एससीओ शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन की यात्रा पर रवाना हो रहे हैं, ऐसे में यह संभावना व्यक्त की जा रही है की इस दौरान रूस-भारत-चीन (आरआईसी) गठबंधन पर चर्चा हो।
आरआईसी 1990 से खबरों में
प्रस्तावित आरआईसी गठबंधन 1990 के दशक से खबरों में रहा है। राष्ट्रपति पुतिन कुछ समय से अमेरिकी आधिपत्य के प्रतिकार के रूप में सक्रिय रूप से इसकी वकालत कर रहे हैं। भारत और रूस के बीच 1971 की भारत-सोवियत मैत्री संधि और बाद में 1993 की भारत और रूसी संघ के बीच मैत्री संधि के माध्यम से एक विशेष संबंध हैं। भारत ने रूस के खिलाफ पश्चिम द्वारा तथाकथित प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल खरीदना जारी रखा है। ट्रंप 2.0 प्रशासन के तहत अमेरिका ने भारत पर आरोप लगाया है कि वह बड़ी मात्रा में तेल खरीदकर रूसी अर्थव्यवस्था का समर्थन कर रहा है। इस प्रकार, भारत को लंबे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए जिम्मेवार बताने के नैरेटिव भी फैलाया जा रहा है।
दो एशियाई दिग्गजों भारत और चीन ने आपसी शांति बनाए रखने के लिए कई समझौतों और संधियों की एक लंबी श्रृंखला साझा की है। परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र (Working Mechanism for Consultation and Coordination) पर वर्ष 2012 में दोनों देशों द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे।
चीन ने ट्रम्प टैरिफ का विरोध किया
अमेरिका के बाद चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। जून 2020 में पूर्वी लद्दाख में हिंसक झड़प के बाद पिछले पांच वर्षों में भारत और चीन के संबंध अशांत दौर से गुजरे हैं। पिछले साल अक्टूबर में ही दोनों देशों के बीच सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। अब चीन ने भी भारत के खिलाफ लगाए गए ट्रम्प टैरिफ का विरोध किया है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद बड़ा बदलाव
लेकिन सबसे अप्रत्याशित बदलाव ऑपरेशन सिंदूर के बाद आया। भारत ने 7-10 मई से 22 अप्रैल के जघन्य पहलगाम आतंकी हमले का बदला लेने के लिए पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। भारत की सोची-समझी दंडात्मक कार्रवाई ने पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया। पाकिस्तान ने 10 मई को भारत के साथ युद्ध विराम की मांग की, जब उसके अधिकांश सैन्य हवाई क्षेत्र भारतीय हवाई हमलों से अनुपयोगी हो गए थे। राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम की मध्यस्थता की थी। भारत ने इस तरह के किसी भी दावे का दृढ़ता से खंडन किया और इस तरह राष्ट्रपति ट्रम्प अचानक भारत विरोधी हो गए। राष्ट्रपति ट्रम्प भारत और अमेरिका को रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर लाने के लिए पिछले 20 वर्षों के निरंतर प्रयासों को भी भूल गए।
अचानक पाकिस्तान अमेरिकी प्रशासन का पसंदीदा बन गया। राष्ट्रपति ट्रम्प ने 18 जून को व्हाइट हाउस में दोपहर के भोजन के लिए पाक सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को आमंत्रित करके अकल्पनीय काम किया। इसके बाद भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ता को रद्द कर दिया गया और राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत के खिलाफ 25% + 25% टैरिफ लगाया, जो दुनिया में सबसे अधिक है। भारत के रूप में सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार के खिलाफ इस तरह के कड़े शुल्क पूरी तरह अवांछनीय हैं। इसलिए भारत इसके खिलाफ मजबूती से खड़ा रहा है, जिसे अमेरिकी उपराष्ट्रपति वांस ने यूक्रेन पर अपने हमलों को रोकने के लिए रूस पर दबाव डालने के लिए “आक्रामक आर्थिक उत्तोलन (aggressive economic leverage)” कहा है।
चीनी विदेश मंत्री की भारत यात्रा
रूस-भारत-चीन (आरआईसी) गठबंधन की पृष्ठभूमि के रूप में, सबसे पहले हमने 18-19 अगस्त को चीनी विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा देखी। यात्रा के दौरान आधिकारिक तौर पर सीमा विवाद पर चर्चा हुई लेकिन यात्रा के महत्व का अनुमान पीएम मोदी के साथ उनकी बातचीत से लगाया जा सकता है। 31 अगस्त से 1 सितंबर तक एससीओ (SCO) तियानजिन शिखर सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बातचीत के लिए मंच तैयार करते हुए, यह बैठक भारत-चीन संबंधों को जल्द ही सामान्य स्थिति में लाने का एक और अवसर हो सकती है। राष्ट्रपति पुतिन समझते हैं कि भारत और रूस के बीच घनिष्ठ आर्थिक संबंध राष्ट्रपति ट्रम्प को नापसंद हैं। इसलिए उन्होंने निर्यात घाटे की भरपाई के लिए भारत को रूसी बाजारों की पेशकश की है। लेकिन राष्ट्रपति पुतिन अच्छी तरह जानते हैं कि अमेरिका, विशेष रूप से राष्ट्रपति ट्रम्प मजबूत स्थिति से बात सुनते हैं।
क्या कहते हैं आंकड़े
तीन प्रमुख शक्तियों के आंकड़े चौंका देने वाले हैं। भारत, चीन और रूस की कुल जनसंख्या 2.96 बिलियन है, जो इसे कुल विश्व जनसंख्या का लगभग 37% बनाती है। ये तीनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं और रूस तथा चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं। ये तीनों ब्रिक्स के संस्थापक सदस्य भी हैं और अमेरिका इस समूह को अपनी डॉलर आधारित अर्थव्यवस्था के लिए खतरे के रूप में देखता है। ब्राजील को भी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा कठोर टैरिफ लगाया गया है और इस प्रकार ब्रिक्स के पास अमेरिका के साथ अधिक केंद्रित तरीके से निपटने की अतिरिक्त जिम्मेदारी है।
भारत को बरतनी होगी सावधानी
चीन के साथ हमारे पिछले अनुभव को ध्यान में रखते हुए, भारत को अधिक सावधानी से चलना पड़ सकता है। भारत को अपने तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों हितों को देखना होगा। तत्काल भविष्य में भारत नए बाजारों की तलाश के अलावा व्यापार घाटे को कम करने के लिए चीन को अधिक निर्यात पर जोर दे सकता है। भारत को चीन के साथ सीमा वार्ता जारी रखनी चाहिए। जहां तक ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान का समर्थन करने में चीन की सक्रिय भूमिका का सवाल है, भारत को उसे चीन के साथ उठाना होगा। हालांकि भारत ने चीन और पाकिस्तान के बीच सैन्य संबंधों पर कभी आपत्ति नहीं जताई, लेकिन संघर्ष की स्थिति के दौरान चीन द्वारा सक्रिय तकनीकी सहायता प्रदान करना चिंता का विषय है। भारत ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी New Normal नीति से अवगत करा दिया है और यह चीन पर निर्भर करता है कि वह पाकिस्तान को इसके निहितार्थ समझाए।
ताइवान और दलाई लामा का विषय
निकट भविष्य में, भारत और चीन के बीच दो विषयों पर मतभेद की संभावना है। एक ताइवान को एकीकृत करने का चीन का घोषित उद्देश्य है। राष्ट्रपति जिनपिंग अपने नेतृत्व में इस मील के पत्थर को जल्द से जल्द हासिल करना चाहेंगे। दूसरा टकराव चीन द्वारा अगले दलाई लामा के अभिषेक को लेकर हो सकता है और यहां भारत की कूटनीति का परीक्षण होगा, यह देखते हुए कि निर्वासित तिब्बती सरकार धर्मशाला, भारत से कार्य करती है। इन विषयों पर भारत आने वाले समय में चीन के रूख पर नजर रखेगा।
दीर्घकालिक हितों का ध्यान रखना होगा
भारत यह भी जानता है कि इस संभावित गठबंधन में चीन अग्रणी स्थिति में है। रूस यूक्रेन के साथ लंबे समय से युद्ध में फंसा हुआ है और अब वह आर्थिक और सैन्य सहायता के लिए चीन पर निर्भर है। चीन ने अगली महाशक्ति बनने की तैयारी कर ली है और इस प्रकार अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भारत को जोड़ कर खुश होगा। कल तक भारत को चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने वाली शक्ति के रूप में देखा जा रहा था। भारत ग्लोबल साउथ का स्वाभाविक नेता बनने की आकांक्षा रखता है और सभी विवादित भूमि और समुद्री विवादों में चीन के साथ उसके हितों का टकराव होगा। इसलिए भारत को अपने दीर्घकालिक हितों का ध्यान रखना होगा।
अमेरिका को कड़ा संदेश
वैश्विक भू-राजनीति में अनिश्चितताओं को देखते हुए, आरआईसी गठबंधन राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ और एक अप्रत्याशित अमेरिका के विरुद्ध एक अल्पकालिक व्यावहारिक समाधान प्रतीत होता है। कम से कम अमेरिका को एक कड़ा संदेश तो जाएगा। साथ ही, भारत को व्यापार वार्ता को फिर से शुरू करने और पर्दे के पीछे की कूटनीति के लिए अमेरिका में भारतीय डायस्पोरा और अन्य समर्थन आधार के साथ संपर्क का उपयोग करना चाहिए। रूस-यूक्रेन युद्ध का जल्द समाधान भारतीय रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण होने जा रहा है। अमेरिका को यह भी पता होना चाहिए कि उसे इंडो-पैसिफिक और साउथ चाइना सी में चीन को मात देने के लिए भारत की जरूरत है। इसलिए भारत को दुनिया में वैश्विक शांति, सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के प्रयास जारी रखना चाहिए।

















