विभाजन काल की परिस्थिति, साम्राज्यवादी शक्तियों के हित और राजनीतिक हसरतों की कहानी एक तरफ.. मगर उन लोगों से बात करना जिन पर यह आफत गुजरी, दिल दहलाने वाला है। झुर्रियों से अटे चेहरे, धुंधलाती आखें और उस घटनाक्रम को याद कर रुंध जाने वाले गले… बुजुर्गों का अचानक फफककर रो पड़ना दबाए गए इतिहास का बांध टूट जाने जैसा है।
यह हिंदू नरसंहार का वह भीषण मामला है जिसकी दुनिया में कभी चर्चा तक नहीं होती। पाञ्चजन्य ने इसी पीड़ा को समाज के सामने लाने की ठानी है। हमारे संवाददाता दिल्ली सहित देश के विभिन्न शहरों, गांवों में महीनों से भटक रहे हैं, गलियों की खाक छान रहे हैं, तब जाकर उन लोगों तक पहुुंच पा रहे हैं, जो विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत आए। बचपन में बंटवारे को अपनी आंखों से देखने वालों के बयान थर्राहट से भर देने वाले हैं। इनकी आपबीती किसी को भी रुला देती है।
आज ये सभी 75-100 वर्ष के हैं, लेकिन इतने दिन बाद भी उनके मन में अपनी मिट्टी छोड़ने की कसक है। मुस्लिम गुंडागर्दी के सामने बेबस रह जाने की फांस है। अपनी मां,बहन बेटियों के साथ बलात्कारों को देखने, उनके कुंओं में छलांगें लगाने या जिहादियों द्वारा झपट लिए जाने की पहाड़ जैसी पीड़ा है। इस पर ऐसे ही लोगों के दर्द और संघर्ष की कहानियों को बहुत संक्षेप में उड़ेला गया है। विभाजन से पीड़ित लोग की आपबीती कहानियां-
‘नहीं भूलते बंटवारे के दिन’
—ईश्वर दास महाजन, सकरगढ़, पाकिस्तान
India Pakistan Partition : बंटवारे के वक्त नागपुर में संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था। इस बीच पाकिस्तान से हिन्दुओं के पलायन की खबरें आनी शुरू हुर्इं। संघ अधिकारियों ने वर्ग को जल्दी समाप्त कर दिया ताकि सीमापार के स्वयंसेवक अपने परिवार की मदद कर सकें। मैंने देखा कि पंजाब से लेकर पाकिस्तान में रहने वाले स्वयंसेवकों ने जान की बाजी लगाकर हिंदुओं की मदद की। अनेक बलिदान भी हुए। लेकिन ना तो स्वयंसेवकों के कदम ठिठके और ना ही डरे।
लोग टेÑन, नाव, बैलगाड़ियों और पैदल चलकर अमृतसर पहुंच रहे थे। इन सबकी आपबीती थी। किसी का बेटा मारा गया था तो किसी की पत्नी का अपहरण कर लिया गया था तो किसी के पिता को आंखों के सामने गोली से उड़ा दिया था। स्वयंसेवक इन सभी परिवारों की हरसंभव मदद कर रहे थे।
जो कुछ हूं, संघ की बदौलत हूं
—छत्रपति , डेरा इस्माइलखान, पाकिस्तान
India Pakistan Partition : बंटवारे के दौर की रातों को पाकिस्तान से आने वाला कोई भी हिन्दू नहीं भूल सकता। मैं उस समय 8 वर्ष का था। मुझे याद है जब ज्यादा माहौल खराब होने लगा तो हमारे चाचा संघ के स्वयंसेवकों के साथ छत पर पहरा दिया करते थे ताकि हिन्दू मोहल्ले में आततायी हमला न करने पाएं। दिनोंदिन आतंक बढ़ता जा रहा था। लोग पलायन करने पर मजबूर थे।
जब हम सभी लोग मोहल्ले से निकल रहे थे तो सैनिकों ने बड़ी मदद की। उनके डर के कारण स्थानीय मुसलमान हमला नहीं कर पाए। लेकिन जो लोग हमसे पहले निकले थे, उन्हें मुसलमानों ने मार-काट दिया। हम सभी बचते हुए किसी तरह अलवर पहुंचे। और फिर दिल्ली। यहां संघ के स्वयंसेवक पाकिस्तान से आने वाले परिवारों की हर संभव मदद कर रहे थे। उनके कारण हमारी भी बहुत जल्दी रहने की व्यवस्था हो गई। चूंकि आर्थिक स्थिति खराब ही थी। तो चांदनी चौक में कंघी तक बेची।
‘अंतिम संस्कार नहीं हुआ’
—प्रभुदयाल चुटानी, डेरा गाजीखान, पाकिस्तान
India Pakistan Partition : विभाजन के समय दो साल का था। मेरे पिताजी जब तक जीवित रहे, वे विभाजन के दौरान होने वाले अत्याचारों को बताते रहे। बंटवारे के समय हमारे कोटछूटा कस्बे में भी लूटपाट-आगजनी हुई। उस वक्त कोटछूटा में एक बहुत ही प्रभावशाली व्यक्ति थे, जिनका नाम था-चौधरी पुन्नू राम। वे हिंदू और मुसलमानों के बीच भी प्रभाव रखते थे।
उनके प्रभाव के कारण हिंदुओं को पहले ज्यादा दिक्कत नहीं हुई, लेकिन जब आसपास के इलाकों से हिंदू पलायन कर गए तब कोटछूटा पर हमले अधिक होने लगे। उन्होंने एक दिन कई ट्रक मंगवाए और हिंदुओं से कहा कि इनमें अपना सामान रखो और यहां से निकलो। मेरे दादाजी मंगाराम भी एक ट्रक पर सवार होने लगे, तभी वहां कुछ मुसलमान आए और उन्होंने हमला कर दिया। वे बुरी तरह घायल हो गए। दादाजी के शरीर से इतना खून बहा कि रास्ते में ही उनका निधन हो गया।
‘महिलाएं रहती थीं निशाने पर’
—तिलकराज रावल,गुजरांवाला, पाकिस्तान
India Pakistan Partition : उस समय मेरी उम्र लगभग 17 साल थी। हालात खराब होते देख मेरे पिताजी ने परिवार की जितनी भी महिलाएं थीं, उन्हें घर से निकालना शुरू किया। क्योंकि महिलाएं ही मुसलमानों का सबसे आसान शिकार होती थीं। झांगवाला से मेरा परिवार मौसी के घर जम्मू आ गया। जब सारा परिवार और कुछ नाते-रिश्तेदार सकुशल जम्मू आ गए तब पिता मुझे लेकर 12 अगस्त, 1947 को जम्मू पहुंचे।
मुझे याद है कि अगले दिन खबर आई कि 13 अगस्त को पाकिस्तान से जो ट्रेन चली थी, उसे मुसलमानों ने पूरी तरह से काटकर भारत भेजा है। लेकिन हम पर भगवान का आशीर्वाद था, इसलिए हम सकुशल बचकर आ गए। निश्चित ही इस तरह के हालात के बारे में कभी किसी ने नहीं सोचा था। रास्ते में हमने अपनी आंखों से देखा कि पटरी की दोनों तरफ लाशें बिखरी पड़ी थीं। खून-खराबा हुआ था। पटरी से बदबू आ रही थी।

















