नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार, 26 अगस्त से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ कार्यक्रम के तृतीय और अंतिम दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ‘जिज्ञासा समाधान’ के तहत कार्यक्रम में सम्मलित हुए अतिथियों के प्रश्नों का उत्तर दिए। इस कार्यक्रम के लिए लगभग 218 जिज्ञासाएँ प्राप्त हुई हैं। 218 प्रश्नों को विषयवार 21 समूहों में बाँटा गया है।
तकनीक और आधुनिकीकरण के युग में संस्कार और परंपराओं के संरक्षण से जुड़े प्रश्न पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि तकनीकी और आधुनिकता का शिक्षा से कोई विरोध नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को संस्कारित कर संपूर्ण मनुष्य बनाना है।
उन्होंने कहा कि तकनीक मनुष्य की भलाई के लिए आती है। उसका उपयोग करना और उसके दुष्परिणामों से बचना मनुष्य की जिम्मेदारी है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि तकनीक का मालिक मनुष्य होना चाहिए, तकनीक मनुष्य पर हावी न हो।
शिक्षा का वास्तविक अर्थ
उन्होंने कहा, “शिक्षा का अर्थ केवल साक्षरता या जानकारी नहीं, बल्कि ऐसा संस्कार है जो व्यक्ति को विवेकशील बनाता है। वही शिक्षा है जो विष का भी उपयोग औषधि में करने की बुद्धि दे।”
भारतीय शिक्षा व्यवस्था और नई शिक्षा नीति
सरसंघचालक जी ने कहा कि विदेशी आक्रांताओं ने भारत की परंपरागत शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर दिया और देश पर शासन करने के उद्देश्य से ऐसी शिक्षा प्रणाली लागू की, जिसने गुलामी की मानसिकता को पोषित किया। स्वतंत्र भारत में शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि समाज का पालन-पोषण करना और भावी पीढ़ी में आत्मगौरव का निर्माण करना भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति-2020 इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पंचकोशीय शिक्षा का प्रावधान है और यह बच्चों को उनके गौरवशाली अतीत से जोड़ने का प्रयास करती है।
संस्कृत भाषा का महत्व
संस्कृत भाषा से जुड़े प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक जी ने कहा कि भारत को सही अर्थों में समझने के लिए संस्कृत का अध्ययन आवश्यक है। इसे अनिवार्य बनाने की जरूरत नहीं है, लेकिन इसके प्रति आग्रह और रुचि पैदा करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है, किंतु शिक्षा का मूल उद्देश्य भारतीय संस्कृति और परंपरा से जुड़े सार्वभौमिक मूल्यों का प्रसार होना चाहिए।
शिक्षा और सार्वभौमिक मूल्य
सरसंघचालक जी ने जोर देकर कहा कि शिक्षा धार्मिक शिक्षा नहीं है, बल्कि वह सार्वभौमिक मूल्य प्रदान करती है, जो समाज को जोड़ते हैं और व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाते हैं। उन्होंने कहा, “बड़ों का आदर करना, अहंकार से दूर रहना और अच्छे संस्कार अपनाना— ये ऐसे मूल्य हैं जो हर समाज में समान रूप से लागू होते हैं। इन्हीं मूल्यों से शिक्षा की वास्तविक दिशा तय होती है।”
संघ और सरकार के संबंध
सरसंघचालक जी ने स्पष्ट किया कि संघ सरकार के निर्णय नहीं करता। उन्होंने कहा कि संघ और सरकार दोनों की भूमिकाएं अलग हैं और निर्णय प्रक्रिया सरकार की जिम्मेदारी है।
संघ और संगठनों के रिश्ते
संघ एवं भाजपा के संबंधों और संघ के विभिन्न संगठनों से रिश्तों पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ और उससे जुड़े संगठनों के बीच विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद कभी नहीं होते। संघ किसी संगठन पर अधीनता नहीं थोपता और न ही उनके कामकाज में हस्तक्षेप करता है। सभी संगठन स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हैं तथा अपने-अपने स्तर पर निर्णय लेते हैं।
मतभेद और मनभेद में अंतर
सरसंघचालक जी ने कहा- “हमारे यहां मतभेद हो सकते हैं, पर मनभेद नहीं। क्या संघ सबकुछ तय करता है? यह बिल्कुल गलत है। ऐसा हो ही नहीं सकता। मैं कई वर्षों से संघ चला रहा हूं और वे सरकार चला रहे हैं। हम केवल सलाह दे सकते हैं, निर्णय नहीं। अगर हम ही तय करते तो इतना समय क्यों लगता.?”
भाजपा और संघ के रिश्तों पर विचार
संघ और भाजपा के रिश्तों को लेकर उठने वाले सवालों पर सरसंघचालक जी ने कहा- “हम हर सरकार के साथ अच्छा तालमेल रखते हैं, चाहे वह राज्य की हो या केंद्र की। कभी-कभी प्रणालीगत कारणों से कठिनाइयां आती हैं। यह वही प्रणाली है जो अंग्रेजों ने शासन के लिए बनाई थी, जिसमें अंतर्विरोध रहते हैं। ऐसे में सभी मुद्दों पर एकमत होना संभव नहीं है, लेकिन लक्ष्य एक ही है— देश का कल्याण।”
उन्होंने कहा कि भाजपा और संघ दोनों की भूमिकाएं अलग हैं। “मैं शाखाएं चलाने में विशेषज्ञ हूं और भाजपा सरकार चलाने में। हम एक-दूसरे को सुझाव दे सकते हैं, लेकिन निर्णय सरकार का ही होता है।”
संगठनों और दलों के बीच भिन्नता
सरसंघचालक जी ने कहा कि संगठनों और दलों के बीच कभी-कभी विचारों में भिन्नता दिखाई देती है, किंतु यह संघर्ष नहीं है। उन्होंने कहा, “ऐसे मामलों में यह प्रतीत होता है कि कोई झगड़ा है, जबकि असल में यह प्रक्रिया का हिस्सा है। मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु मनभेद नहीं। हम एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं कि सब ईमानदारी से और निःस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं।”
संघ के प्रति धारणा में बदलाव
संघ और अन्य संगठनों के संबंधों पर उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि समय के साथ कई नेताओं ने संघ के प्रति अपनी धारणा बदली है। “मौलाना आजाद से लेकर प्रणब मुखर्जी तक ने संघ के बारे में अपनी राय बदली। अच्छे कार्यों के लिए सहयोग मांगने वालों की हम मदद करते हैं और यदि कोई हमारे सहयोग को स्वीकार नहीं करता तो उनकी इच्छा का सम्मान करते हैं।”
संघ का लक्ष्य
उन्होंने दोहराया कि संघ का लक्ष्य संगठन विस्तार नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक मूल्यों का प्रसार और राष्ट्रहित में कार्य करना है।

















