राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने गुरुवार (28 अगस्त) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर देवी नाम की एक महिला की आपबीती साझा की है। इसमें उन्होंने बताया कि सहमति की आड़ में तस्करी का शिकार हुई देवी को उसकी ही एक रिश्तेदार ने दिल्ली के एक वेश्यालय में बेच दिया था। चार साल बाद वह किसी तरह वहां से निकलने में कामयाब हुईं और आज अपनी तरह इस स्थिति में फंसी लड़कियों की मदद के लिए एक एनजीओ चलाती हैं।
प्रियंक कानूनगो ने लिखा, “देवी ने बच्चों के साथ यौन संबंध बनाने के लिए सहमति (कंशेंट) की उम्र कम करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक हस्तक्षेप याचिका दायर की है। देवी को 13 वर्ष की आयु में एक रिश्तेदार बेहतर भविष्य का वादा करके उसकी सहमति की आड़ में तस्करी कर दिल्ली ले आया और यहां उसे जीबी रोड के एक वेश्यालय में बेच दिया। चार साल बाद देवी को बचा लिया गया। देवी इस नर्क से निकलने के बाद खुद को खुशकिस्मत मानती हैं इसलिए वह अपनी तरह इस स्थिति में फंसी लड़कियों की मदद के लिए एक एनजीओ चलाती हैं।”
देवी ने वेश्यालयों, ऑर्केस्ट्रा, डांस ग्रुप और प्लेसमेंट एजेंसियों से 1000 से अधिक लड़कियों को बचाया है, जिनमें से 90 प्रतिशत लड़कियां 18 वर्ष से कम उम्र की थीं जिनकी सहमति की आड़ में तस्करी की गई थी। वह आपके बच्चों की रक्षा के लिए आगे आई है, क्या अब आप जागेंगे?
एक व्यक्ति ने निकालने में मदद की
देवी बताती हैं कि जब वह 12 साल की थीं, तब उन्हें गांव के स्कूल से निकाल दिया गया था। इस दौरान, गांव की एक महिला ने उन्हें और उनके माता-पिता को दिल्ली में अच्छी नौकरी का झांसा दिया और 2006 या 2007 में वह देवी को दिल्ली ले आई। शुरुआत में उसने देवी को एक घर में रखा, जहां उन्होंने उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। फिर उसको दिल्ली के जीबी रोड में वेश्यावृत्ति के लिए बेच दिया गया। वहां वह 4-5 साल रही। फिर उनकी दोस्ती वहां एक व्यक्ति से हुई, जिसने उन्हें वहां से निकालने में मदद की।
वेश्यालय में कई तरह के शोषण का सामना करना पड़ा
देवी ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “वेश्यालय में प्रताड़ित होने का दर्द सिर्फ 15-16 साल की लड़की ही समझ सकती है। वेश्यालय में मुझे कई तरह के शोषण का सामना करना पड़ा, जैसे 10-12 बार यौन संबंध, जलती हुई सिगरेट से यातना, वेश्यालय के मालिक और दलालों द्वारा मारपीट, बीमार होने और मासिक धर्म में भी हमें आराम करने की अनुमति नहीं थी। अलग-अलग लोग हमारे साथ अलग-अलग तरह से दुर्व्यवहार करते थे। कुल मिलाकर यह नरक था। मुझे 2011 में बचाया गया। उसके बाद मुझे दिल्ली के बाल गृह में रखा गया और बाद में स्थानांतरित कर दिया गया।”
पति के साथ चलाती हैं एनजीओ
वह आगे बताती हैं, “19 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई और अब मैं अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी रह रही हूं। वेश्यालय में नाबालिग लड़कियों के साथ होने वाले शोषण, यातनाओं को देखकर और बाल गृह में नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण जैसे अन्य मामलों को जानने के बाद मैंने ईश्वर से प्रार्थना की है कि वह मुझे तस्करी के शिकार बच्चों की सेवा करने का अवसर दें। मैंने और मेरे पति ने एक एनजीओ शुरू किया है। हम पूरे भारत में तस्करी पीड़ितों के बचाव अभियान में पूरी तरह से शामिल हैं। हम यह काम पुलिस, AHTU, CWC, SCPCR, NCPCR, NHRC, DCPU आदि सरकारी एजेंसियों के सहयोग से कर रहे हैं।
प्रियंक कानूनगो ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जताई हैरानी
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एनसीपीसीआर की हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी। प्रियंक कानूनगो ने कोर्ट के फैसले पर हैरानी जताते हुए कहा था कि अदालत ने नाबालिग की सहमति को आधार माना है यह चिंताजनक है। हे भगवान भारत के बच्चों की रक्षा करिए, आपका ही सहारा है।
















