“नदी केवल जल का प्रवाह नहीं होती, वह समय का प्रवाह भी होती है।”
इस वाक्य के साथ शुरू होने वाली यह कथा हमें याद दिलाती है कि प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता किसी आंकड़े या नक्शे में नहीं बंधता। गंगा मात्र एक नदी नहीं है, वह स्मृति है, आस्था है, इतिहास है और राजनीति भी। गंगा वह धारा है जिसमें सभ्यता के उतार-चढ़ाव, संघर्ष और पुनर्जन्म बहते रहते हैं। गंगा का जल स्वयं गंगा से पूरा नहीं आता। यह तथ्य अपने भीतर गहरी विडंबना और प्रश्न समेटे है।
जब बनारस की गंगा को चंबल जैसी “कुख्यात” नदी बचाती है, तो यह केवल भौगोलिक सच नहीं है, बल्कि जीवन का दर्शन है कि उद्धार अक्सर वहीं से आता है, जिसे हम उपेक्षित या तिरस्कृत समझते हैं। यही जीवन का सत्य है, अच्छाई और बुराई की स्थायी परिभाषाएं नहीं होतीं।
गढ़वाल और कुमाऊं के घने जंगल-चीड़, देवदार, बुरांश के वृक्ष सदियों से पहाड़ों की सांस थे। किंतु जब टिहरी गढ़वाल के शासक ने अंग्रेज फ़्रेडरिक विल्सन को वृक्ष काटने का अधिकार दिया, तब वह केवल लकड़ी का सौदा नहीं था, बल्कि भविष्य का सौदा था। विल्सन ने निर्ममता से जंगल उजाड़े और लकड़ियों को गंगा में बहाकर हरिद्वार तक पहुंचाया।
यह लकड़ी भारत में रेलवे पटरियों के लिए स्लीपर बनाने में इस्तेमाल हुई। विडंबना यह कि जिन पेड़ों को गंगा ने सींचा, वही गंगा विल्सन के लिए परिवहन का साधन बन गई। इस कृत्य ने टिहरी के जंगलों की सांसें छीन लीं और विल्सन को “राजा विल्सन” का कुख्यात नाम मिला।
यह सब केवल बिखरे हुए प्रसंग नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी पुस्तक का हिस्सा हैं जो हमें गंगा की कथा उसके इतिहास, वर्तमान राजनीति, बदलते समीकरणों और सामाजिक मनोभावों के साथ सुनाती है। गंगा किनारे बसे नगर, गांव और संस्कृति, उसके साथ बहते हुए समय के साथ नए अर्थ गढ़ती हैं और पुरानी स्मृतियों को पुनः परिभाषित करती हैं।
गंगा किनारे फैली कहानियां इस पुस्तक में एक सांस्कृतिक मानचित्र की तरह खुलती हैं। गंगा की नहरों की भी अपनी कथाएं हैं, जो समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र से गुंथी हुई हैं और किसी भगीरथ प्रयास से कम महत्व नहीं रखतीं। नदी कभी स्थिर नहीं रहती। स्थिरता मृत्यु है। यह संदेश पुस्तक के पूरे आख्यान में गूंजता है।
किसी नदी का निरंतर बहना जीवन की अनिवार्यता है। प्रश्न यह है कि क्या हम उस परिवर्तन को स्वीकारते हैं, या उसे रोकने की मूर्खता करते हैं? मनुष्य का स्वभाव इसी विरोधाभास से भरा है। एक ओर वह लोभ में वृक्षों और नदियों को नष्ट करता है, दूसरी ओर मृत्यु के बाद गंगा की गोद में शांति खोजता है।
यही द्वंद्व जीवन का गहन दर्शन है विनाश और मुक्ति, दोनों का स्रोत मनुष्य ही है। अभय मिश्र की पुस्तक ‘विहंगम’ हमें यह बताती है कि सभ्यताएं, केवल स्मारकों और ग्रंथों से नहीं टिकतीं। वे नदियों और जंगलों से टिकती हैं। जब नदी सूखती है, तो समाज की संवेदनाएं भी सूख जाती हैं। जब जंगल कटते हैं, तो केवल लकड़ी नहीं बिकती-भविष्य की सांसें बिक जाती हैं।
‘विहंगम’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना की यात्रा है। यह गंगा को एक धार्मिक प्रतीक से आगे बढ़ाकर उसे एक जीवंत दार्शनिक धारा की तरह देखता है। यहां इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति और दर्शन सब मिलकर यह प्रश्न पूछते हैं, क्या गंगा को हम केवल पूजा-पाठ तक सीमित कर देंगे, या उसकी आत्मा-प्रकृति और संतुलन-को भी समझेंगे? यह कृति हमें याद दिलाती है कि मनुष्य का असली धर्म एक नदी की तरह बहना है।
अपनी सीमाओं को पार करते हुए, दूसरों को जीवन देते हुए, और अंततः समुद्र में विलीन होते हुए। गंगा का बदलता जल और उसका घटता-बढ़ता प्रवाह केवल नदी का रूपांतरण नहीं है, बल्कि हमारे समाज, राजनीति और संस्कृति का बदलता चेहरा भी है। अभय मिश्र लिखित ‘विहंगम’ इसी बदलते चेहरे की गाथा है, एक ऐसी कृति जो हमें हमारे इतिहास से जोड़ती है, वर्तमान को समझाती है और भविष्य के लिए चेतावनी भी देती है।

















