नई दिल्ली । दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के प्रथम दिवस पर कार्यक्रम में “हिंदू शब्द का अर्थ और जिम्मेदारी” पर व्याख्यान देने के बाद सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने संघ और स्वयंसेवकों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा- केवल तैयारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका उपयोग करना भी आवश्यक है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका
उन्होंने बताया कि संघ ने इस दिशा में दो भागों में काम करने की पद्धति विकसित की—पहला, मनुष्यों को तैयार करना और दूसरा, उन तैयार मनुष्यों से समाजहित के कार्य करवाना। संघ का कार्य मनुष्यों को संस्कारित और तैयार करना है। संघ स्वयं प्रत्यक्ष रूप से कोई काम नहीं करता, बल्कि उसके स्वयंसेवक समाज-जीवन की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में जाकर काम करते हैं। यही संघ की कार्यपद्धति है।
स्वयंसेवकों का योगदान
सरसंघचालक जी ने कहा- स्वयंसेवक अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी विशेषज्ञता और अनुभव के आधार पर काम करते हैं। उदाहरण के लिए भारतीय मजदूर संघ ने श्रमिक जगत में नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। इस तरह स्वयंसेवक अपने-अपने क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाते हैं।
स्वतंत्र और स्वायत्त संगठन
उन्होंने कहा- स्वयंसेवकों द्वारा स्थापित संगठन स्वतंत्र, अलग और स्वायत्त होते हैं। संघ केवल विचार और संस्कार का स्रोत है, लेकिन वह इन संगठनों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नियंत्रित नहीं करता। स्वयंसेवकों का संबंध संघ से अटूट है। वे कहीं भी रहें, संघ की प्रार्थना गा सकते हैं। संघ उनकी मदद करता है, लेकिन कोई दबाव नहीं डालता। वे अपने विवेक और क्षेत्रीय अनुभव के अनुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र रहते हैं।
उन्होंने बताया कि संघ की शिक्षा है— “मतभेद हों, लेकिन मनभेद न हों” संगठन का उद्देश्य सबको साथ लेकर चलना है। धीरे-धीरे ये संगठन स्वावलंबी बन जाते हैं और समाज में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
विचारों में विविधता और प्रगति
सरसंघचालक जी ने कहा- 30–40 साल पहले जो लोग संघ के विरोधी थे, वे आज समर्थक हो सकते हैं। अलग मत होना अपराध नहीं है, बल्कि यही प्रगति का आधार है। विविध विचारों को सुनकर ही सहमति और विकास संभव है। अंग्रेज़ी में कहा गया है-
- Coming together is beginning.
- Standing together is progress.
- Working together is success.
यही संगठन का सार है और यही समाज की प्रगति का मार्ग है।
देश की जिम्मेदारी सबकी
सरसंघचालक जी ने कहा- देश की जिम्मेदारी केवल नेता, पार्टी या सरकार की नहीं है। यह संपूर्ण समाज की है। जैसे हम होंगे, वैसे ही हमारे प्रतिनिधि, नेता और पार्टियां होंगी। इसलिए हमें स्वयं को अच्छा बनाना होगा और अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
संपूर्ण समाज का संगठन
उन्होंने कहा- संघ का मानना है कि देश के कल्याण के लिए संपूर्ण समाज का संगठन आवश्यक है। इसी लिए हमारी प्रार्थना में कहा जाता है—“विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्”। कार्यशक्ति हमारी संगठित शक्ति के आधार पर होगी— यानी संपूर्ण हिंदू समाज की।

















