100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ : डॉ. हेडगेवार और RSS स्थापना पर सरसंघचालक भागवत जी ने बताईं अनसुनी बातें
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100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ : डॉ. हेडगेवार और RSS स्थापना पर सरसंघचालक भागवत जी ने बताईं अनसुनी बातें

त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी का जीवन। जानिए डॉ. हेडगेवार जी का वंदे मातरम आंदोलन, अनुशीलन समिति से जुड़ाव, कांग्रेस आंदोलन और अंततः 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना तक का पूरा सफर।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Aug 26, 2025, 09:04 pm IST
inभारत, संघ @100, दिल्ली

नई दिल्ली । दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के प्रथम दिवस पर कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा- स्वतंत्रता मिलने के बाद समाज को जिस प्रकार प्रबोधित करना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। यह कोई दोषारोपण नहीं, बल्कि तथ्य है। समाज में कई कमियां थीं—रूढ़ियां, कुरीतियां, अंधविश्वास और आधुनिक शिक्षा का अभाव। इन्हें सुधारने के लिए अनेक आंदोलन चले, जिनका प्रभाव पड़ा लेकिन सब कुछ पूरी तरह ठीक नहीं हुआ।

सुधार आंदोलनों की धारा

सरसंघचालक जी ने बताया कि देश में तरह-तरह के सुधार आंदोलनों का उदय हुआ। स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों ने समाज को अपने मूल की ओर लौटने का संदेश दिया। इन प्रयासों ने समाज में नई चेतना जगाई और आज भी इन आंदोलनों का प्रभाव देश की सोच में दिखता है।

चार धाराओं का प्रभाव

उन्होंने बताया कि 1857 के संघर्ष, क्रांतिकारियों की धारा, राजनीतिक आंदोलन और सुधार आंदोलनों—इन चार धाराओं का असर आज भी भारत पर है। आजादी के 75 वर्ष बाद भी भारत वैसा खड़ा नहीं हुआ जैसा अपेक्षित था। इसी सच्चाई ने डॉक्टर हेडगेवार को प्रेरित किया, जो इन चारों धाराओं से जुड़े रहे।

जन्मजात देशभक्त डॉ. हेडगेवार

सरसंघचालक जी ने कहा- डॉ. हेडगेवार जी को जन्मजात देशभक्त कहा जाता है। बचपन में ही अनाथ हो गए, दरिद्रता का सामना किया, लेकिन देशभक्ति की चिंगारी उनके मन में हमेशा रही। विद्यार्थी जीवन में पढ़ाई में अव्वल रहते हुए भी उन्होंने आंदोलन में भाग लिया। 1905-06 के वंदे मातरम आंदोलन के दौरान उन्होंने नागपुर के स्कूलों में नेतृत्व किया।

स्कूल निरीक्षण के समय हर कक्षा में ‘वंदे मातरम’ गाया जाता था। अंग्रेजी प्रशासन ने नाराज़ होकर स्कूल बंद कर दिए। बाद में समझौता हुआ, लेकिन डॉ. हेडगेवार और एक साथी ने माफी मांगने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि भारत माता और वंदे मातरम हमारा श्रद्धा स्थल है, इसे सपनों में भी नकारा नहीं जा सकता।

शिक्षा और क्रांतिकारी गतिविधियाँ

सरसंघचालक जी ने बताया कि इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय विद्यालय में पढ़ाई पूरी की और मैट्रिक में फर्स्ट क्लास पास हुए। नागपुर के नेताओं ने उन्हें कलकत्ता भेजा ताकि वे मेडिकल की पढ़ाई करें और क्रांतिकारी अनुशीलन समिति से जुड़ सकें। वहां उन्होंने कठिन परिस्थितियों में रहकर मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और समिति से सक्रिय रूप से जुड़े।

क्रांतिकारी जीवन और कोड नेम

सरसंघचालक जी ने कहा- डॉ. हेडगेवार का उल्लेख त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती और रासबिहारी बोस की पुस्तकों में मिलता है। उनका कोड नेम ‘कोकेन’ था। कई घटनाओं में उनका नाम सामने आया और अंग्रेजी खुफिया विभाग सक्रिय रहा। हालांकि बाद में क्रांतिकारी आंदोलन कमजोर हो गया और अंग्रेजों ने उसे दबा दिया।

मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद बर्मा में 3,000 रुपये मासिक की नौकरी उनके लिए तैयार थी। लेकिन डॉ. हेडगेवार ने कहा कि वे नौकरी करने के लिए नहीं आए, उनका उद्देश्य देश की सेवा है। इसी संकल्प के साथ वे नागपुर लौट आए और राष्ट्र के लिए समर्पित जीवन की राह चुनी।

नागपुर लौटने पर डॉ. हेडगेवार से उनके चाचा ने विवाह के विषय में पूछा। उन्होंने पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि उनका यह जन्म केवल देश के लिए समर्पित है। उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी कि व्यक्तिगत सुख का विचार अगले जन्म में करेंगे। इसलिए उन्होंने जीवनभर देश सेवा का मार्ग चुना।

कांग्रेस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी

सरसंघचालक जी ने बताया कि डॉ. हेडगेवार जी ने कांग्रेस के आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। 1920 में आंदोलन के प्रचार के दौरान उनके भाषणों पर मुकदमा चला। अदालत में उन्होंने स्वयं अपना बचाव प्रस्तुत किया और कहा कि अंग्रेजों का भारत पर शासन किस अधिकार से है? स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसी कारण उन्हें एक वर्ष सश्रम कारावास की सजा हुई।

सभी आंदोलनों का अनुभव

उन्होंने कहा- डॉ. हेडगेवार जी ने क्रांतिकारी आंदोलन, राजनीतिक जागरण, समाज सुधार और धर्म जागरण—सभी धाराओं में निस्वार्थ भाव से कार्य किया। उन्होंने कार्यपद्धति, समाज की स्थिति और नेतृत्व की भूमिका का गहन अनुभव प्राप्त किया। यही अनुभव आगे चलकर संघ स्थापना में उनके लिए आधार बना।

संघ की स्थापना के बाद भी डॉ. हेडगेवार समाज आंदोलनों से जुड़े रहे। 1930 के जंगल सत्याग्रह में उन्होंने सरसंघचालक पद छोड़कर आंदोलन में भाग लिया और एक वर्ष का कारावास भोगा। बाद में संघ का नेतृत्व पुनः संभाला। इस दौरान उनकी मुलाकात सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु जैसे नेताओं से हुई। इस दौरान चर्चाओं से उन्हें यह स्पष्ट हुआ कि केवल आंदोलन, संगठन या नेता ही पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविक परिवर्तन पूरे समाज की गुणवत्ता में सुधार से ही संभव है। समाज की कुरीतियां और दोष दूर किए बिना स्वतंत्रता स्थायी नहीं हो सकती। इस निष्कर्ष पर वे पहुँचे कि समाज की गुणात्मक उन्नति ही राष्ट्र निर्माण का मूल है।

स्वदेशी समाज और विचारधारा

आरएसएस प्रमुख भागवत जी ने बताया कि श्री अरविंद ठाकुर, गांधीजी और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे महान विचारकों ने भी कहा था कि राष्ट्र की जागृति राजनीति से नहीं, बल्कि समाज में शुद्ध चरित्र वाले नायकों के निर्माण से होगी। गांधीजी ने ‘हिंद स्वराज’ में लिखा कि भारत अंग्रेजों के आने से पहले भी एक था। रवींद्रनाथ ठाकुर ने कहा कि भारत का स्वभाव सबको अपनाने का है और संघर्षों के बावजूद समाधान देश के भीतर ही मिलेगा।

डॉ. हेडगेवार का चिंतन और प्रयोग

सरसंघचालक जी ने बताया कि डॉ. हेडगेवार ने अनुशीलन समिति और भारत सेवाश्रम संघ जैसे संगठनों से प्रेरणा लेकर समाज निर्माण के प्रयोग किए। उनका उद्देश्य था—कैसे संपूर्ण देश को जोड़ा जाए और प्रत्येक व्यक्ति में गुणवत्ता विकसित की जाए। यह चिंतन और प्रयोग कई वर्षों तक चला और धीरे-धीरे एक ठोस रूप में सामने आया।

1925 में हुई संघ (RSS) की स्थापना

सरसंघचालक जी ने बताया कि डॉ. हेडगेवार जी ने अपने साथियों के साथ गहन चर्चा की और 1925 में विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की घोषणा की। यह संघ केवल संगठन नहीं, बल्कि समाज को गुणात्मक रूप से बदलने और राष्ट्र को सशक्त बनाने का एक उपाय था। आज संघ की यह यात्रा 100 वर्ष पूरे कर रही है। लेकिन प्रत्यक्ष यह है कि इसका बीजारोपण कई वर्ष पहले डॉक्टर साहब के मन में हुआ था। मन में उस बीज ने एक आकार धारण किया। अंदर एक अंकुर धारण किया और 1925 के विजयादशमी के बाद डॉक्टर साहब ने घोषणा की कि आज से यह संघ हम प्रारंभ कर रहे हैं।

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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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