जंगल महल पश्चिम बंगाल का एक पिछड़ा हुआ इलाका है, जहां ज्यादातर वनवासी लोग रहते हैं। उपजाऊ भूमि प्रायः नगण्य है। ज्यादातर लोग जंगलों पर आधारित कुछ विशेष पत्तों और कुछ विशेष प्रकार की घास पर जीवनोपार्जन करते हैं। इनमें विशेष रूप से साल- पत्ता और सवाई घास पर आधारित जीवन है, जिनमें से लगभग 32 लाख लोग साल पत्ते पर और लगभग 12 लाख लोग सवाई घास पर आधारित जीविका चलाते हैं। यह अंचल झारग्राम जिले और पश्चिम मिदनापुर के तीन-चार ताल्लुकों में तथा थोड़ा सा हिस्सा बांकुड़ा और पुरुलिया जिले का है।
पिछले 75 वर्षों की राजनीतिक स्वाधीनता के वावजूद यहां के निवासी घोर गरीबी और आर्थिक तंगी से त्रस्त हैं। कुछ लोग तो साल वन से सिर्फ पत्ते तोड़कर उन्हें तरह-तरह के बर्तन बनाने के लिये बेच देते हैं। इन पत्तों को तोड़कर मंडी तक पहुंचाने के काम में बहुत सी स्वयंसेविका समूह की महिलायें काम करती है, जिन्हें 70 पैसे से 1 रुपये तक की कीमत प्रति प्लेट के आधार पर औसतन मिलते हैं। 6-7 पत्तों को धागे से सिलाई करके एक पत्तल तैयार होता है। इसके अलावा छोटी कटोरी और थाली के आकार के घरेलू बर्तन छोटे-छोटे घरेलू कुटीर शिल्प द्वारा बनाए जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में महिलायें ही ज़्यादा काम करती हैं और औसतन 5000/- रुपये की मासिक आय उन्हें होती है। राष्ट्रीय ग्रामीण बैंक तथा खादी ग्रामोद्योग, जो केंद्रीय और राज्य सरकार के युग्म प्रयास से संचालित होते हैं, उनके द्वारा प्रशिक्षण तथा कौशल विकास में भी मदद पहुंचाई जाती है।
शुरुआती दिनों में साल पत्तों से बनी वस्तुओं पर जीएसटी देना पड़ता था। साल पत्ता श्रमिक संघ के लगातार प्रयासों के पश्चात जीएसटी हटा दिया गया है। परंतु यह जीविका का साधन अभी भी कई समस्याओं से जूझ रहा है,जिनमें थर्मोकोल द्वारा निर्मित चाय- नाश्ते से संबंधित उत्पाद शामिल हैं। हाल ही में पटना उच्च न्यायालय तथा अन्य कई पर्यावरण अधिकारियों द्वारा रोक लगाये जाने, राज्य सरकार के मुख्य सचिव को कई बार ज्ञापन देने के बावजूद थर्मोकोल उत्पादों पर प्रभावी ढंग से रोक नहीं लग पाई हैजो साल पत्ता व्यवसाय के विपणन व्यवस्था में एक बहुत बड़ी बाधा है।
साल पत्ता तथा सवाई घास के उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिये कुछ अनुसंधान केंद्र भी झारग्राम में बने हैं तथा इन उत्पादों के हस्तशिल्प संबंधी केंद्रों में स्वयंसेवी समूहों के माध्यम से उचित कौशल विकास की व्यवस्था की जा रही है, किंतु विपणन की व्यवस्था की कमी के वजह से श्रमिकों को उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। आर्थिक तंगी की वजह से इस इलाके में बेरोजगारी और गरीबी की समस्या बहुत गंभीर रूप ले रही है। आर्थिक असमानता की ही एक वजह यह रही कि जंगल महल के इस अंचल में नक्सलवाद और सामाजिक असंतोष की झलक मिलती रहती है। यह एक बड़ी विडंबना है कि भारत की उन्नति के नाम पर जहां एक तेज रफ्तार से विकास की दुहाई दी जा रही है, वहीं पश्चिम बंगाल में और विशेषकर जंगल महल में इतना पिछड़ापन दिखाई देता है। केंद्र सरकार की जनहित नीतियों को गांवों तक पहुंचने नहीं दिया जाता है। आर्थिक विषमता और विपन्नता एक सामाजिक जहर की तरह फैल रही है।
जंगल उत्पादों को जीवन और जीविका से जोड़कर देखने की आवश्यकता है। पश्चिम बंगाल में चाय पत्ता, तंबाकू पत्ता, पान पत्ता, केंदु पत्ता और साल पत्ता की सामूहिक रूप से अर्थनीति में भूमिका देखें तो पता चलेगा कि सिर्फ इन पांच पत्तों पर 50 लाख से ज्यादा लोगों का जीविका निर्भर है। जंगल के उत्पादों की अगर पूरी तालिका बनाई जाये तो पता चलेगा कि बहुत सी वनस्पतियां और जड़ी बूटियां भी हमारे साधारण वनवासियों के जीवन का बहुत बड़ा आधार है और सामाजिक-आर्थिक संस्कृति का भी मूल है।
पुरुलिया जिले में लाख की खेती होती है, जो कुसुम और पलास के वृक्षों के रस से प्राप्त होता है। भारत सरकार द्वारा स्थापित शेलक यानी लाख निर्यात निगम द्वारा इसके उत्पादन और निर्यात को प्रोत्साहन देकर विदेशी मुद्रा अर्जित होती है। हाल के समय में इस उद्योग के उत्पादन में काफी कमी आ रही है, किंतु जंगल से प्राप्त इस तरह के उत्पादों से स्थानीय लोगों की जीविका को चलाने में बड़ी मदद मिलती है।
इसी तरह बीड़ी बनाने के काम में आने वाले केंदू अथवा तेंदू पत्ते की भी खेती इस पूरे जंगल महल में होती है, जिससे लगभग 2 लाख लोगों की जीविका चलती है। हालांकि इससे प्राप्त प्रति व्यक्ति औसतन आय सिर्फ 4000-5000 रुपये मासिक के बराबर ही होती है, इसे बढ़ाने के प्रयासों की आवश्यकता है। एक बिनपुर नामक ताल्लुके, झारग्राम जिला का अध्ययन किया गया,जिसमें यह पाया गया कि किसी एक व्यक्तिगत अथवा सामूहिक वन अधिकार (आईएफआर/सीएफआर) वन विभाग अधिनियमों के अनुसार एक ग्राम सभा को साल पत्ता तोड़ने का और उनको मोड़कर पत्तल बनाने का अधिकार दिया जाता है और उसे नाबार्ड और खादी ग्रामोद्योग द्वारा मशीन उपलब्ध कराके संचालित किया जाता है, तो निम्न उत्पादकता मिल सकती है –
ग्रामसभा: [ग्राम का नाम]
ब्लॉक: बिनपुर–I, झाड़ग्राम (जंगलमहल)
मुख्य MFP: साल पत्ता, केंदु पत्ता, महुआ फूल, बाँस ( MFP- Minor Forest Produce)
स्थानीय प्रसंस्करण योजना
• साल पत्ता प्लेट यूनिट (ग्रामसभा द्वारा सामूहिक रूप से)
• 2 मशीनें (KVIC/NABARD सहायता से)
• प्रतिदिन 12,000 प्लेट उत्पादन (मई–जून)
• केंदु पत्ता
• बंडलिंग व ग्रेडिंग ग्रामसभा द्वारा, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के तहत विपणन
• महुआ फूल
• भंडारण व सुखाना, SHG द्वारा पैकिंग व बिक्री
• बाँस
• ग्रामसभा ट्रांज़िट पास जारी कर छोटे उद्यम/कारीगरों को बिक्री
पश्चिम बंगाल में सामुदायिक वनाधिकार (CFR) की कार्यान्वयन-प्रगति वर्षों से कमजोर बताई जा रही है। इससे ग्रामसभाओं को MFP, चराई, संरक्षण व बाजार प्रबंधन की वास्तविक शक्तियां नहीं मिल पातीं। इन कानूनों का उद्देश्य जनता को उनके अधिकारों से वंचित नहीं बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा करना है ताकि उनके व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों के अनुकूल वन साधनों का उपयोग अपनी जीविका पालन के लिये सुचारू रूप से कर सकें। साल पत्ता और सवाई घास को टिम्बर कटाई कानून से अलग रखा गया है फिर भी जन जातियों की स्वायत्तता को बाधा पहुंचाई जाती है।
जंगलमहल (झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा पश्चिम मेदिनीपुर) में वनाधिकार कानून, 2006 (FRA) का उद्देश्य अधिकार देना है-
व्यक्तिगत व सामुदायिक अधिकार (IFR/CFR): परंपरागत उपयोग की जमीन, चूल्हा-चरा, चारा, ईंधन, छोटी लकड़ी, बांस-झाड़ सहित लघु वनोत्पाद (MFP) पर स्वामित्व/उपज/बेचने का अधिकार। 2012 के संशोधित नियमों के बाद बांस व अन्य MFP की ढुलाई के ट्रांज़िट परमिट ग्रामसभा/उसकी समिति जारी कर सकती है। आज समय की मांग है कि वनवासियों के इन सभी अधिकारों की रक्षा हो और इसके लिये सरकारी अधिनियमों में लचीलेपन की आवश्यकता है। वन क्षेत्रों से आदिवासियों के पलायन को रोकने के लिये भी उनके अधिकारों के संरक्षण तथा उनके हितों के संवर्धन की आवश्यकता है।
“यदि ग्रामसभा को CFR का औपचारिक अधिकार व ट्रांज़िट पास जारी करने की शक्ति मिलती है, तो साल व केंदु पत्तों के मूल्य-संवर्धन से गाँव स्तर पर ₹24 लाख वार्षिक आय संभव है। इससे आजीविका स्थिर होगी, बिचौलियों की भूमिका घटेगी और स्थानीय स्वशासन मज़बूत होगा।” जंगल महल के भीतर से एक वनवासी की आवाज भी बहुत मुखर हो रही है। कुर्मी समाज आदिवासी जनजाति के नाम से एक आंदोलन बहुत वर्षों से चला रहा है और संविधान के अंतर्गत कुर्मी आदिवासी की मान्यता के लिये लगातार विद्रोह की आवाज उठा रहा है। राजनीतिक पार्टियों की तरह से आश्वासन दिया जा रहा है। अभी झारखंड प्रांत के एक सांसद ने कुर्मी भाषा के लिये भी आवाज उठाई है।
‘सबका साथ और सबका विकास’ तभी संभव हो सकेगा, जब हम इन पिछड़े इलाकों विशेषकर जंगल, पहाड़ तथा समुद्र के किनारे रहने वाले, जिनमें उत्तर बंगाल, सुंदरवन तथा जंगल महल के पिछड़े जिले शामिल हैं, जब इनका सर्वांगीण विकास किया जायेगा।
(लेखक – अखिल भारतीय सह संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच, कोलकाता)
















