स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती आधुनिक भारत के उन महान संतों में से एक थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन हिंदू धर्म, जनजातीय समाज और भारतीय संस्कृति के संरक्षण और उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। उनका जीवन त्याग, तपस्या, सेवा और देशभक्ति का अद्वितीय उदाहरण है। वह न केवल एक संत थे बल्कि एक समाज सुधारक, शिक्षक और धर्म रक्षक भी थे।
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती का जन्म ओडिशा राज्य में हुआ था। प्रारम्भ से ही उनका झुकाव आध्यात्म और त्याग की ओर था। वह शंकराचार्य परंपरा से जुड़े और संन्यास ग्रहण कर “सरस्वती” उपाधि से विभूषित हुए। साधु जीवन अपनाने के उपरांत उन्होंने अपना समूचा जीवन ओडिशा के आदिवासी एवं वंचित समाज के बीच बिताया। उन्होंने आदिवासी अंचलों में अनेक आश्रम, गुरुकुल और विद्यालय स्थापित किए। उनके प्रयासों से हजारों आदिवासी बच्चे संस्कारवान शिक्षा प्राप्त कर समाज के मुख्यधारा से जुड़े। उन्होंने आदिवासी समाज को उनके मूल धर्म, संस्कृति और परंपरा से जोड़ने का कार्य किया।
उनका स्पष्ट मत था कि आदिवासी हिंदू धर्म का अभिन्न अंग हैं और उन्हें अपनी जड़ों से विचलित नहीं होना चाहिए। स्वामी जी ने गौरक्षा के लिए अनेक प्रयास किये। उनके आश्रमों में गौशालाएँ थीं जहाँ गायों की सेवा और सुरक्षा की जाती थी। उन्होंने नशीली दवाओं के दुरुपयोग, बुराइयों और अंधविश्वासों के खिलाफ अभियान चलाया।आदिवासी समाज को स्वच्छ, शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में उनका योगदान ऐतिहासिक है। स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती ने आदिवासी समाज में हिन्दू पर्व-त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान और संस्कारों को पुनः जीवित किया। उन्होंने भगवद्गीता, रामायण, महाभारत आदि के पठन-पाठन की परंपरा को बढ़ावा दिया। स्वामी लक्ष्मणानन्द का प्रभाव इतना गहरा था कि ओडिशा के सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में हिन्दू समाज का पुनर्जागरण हुआ। उनकी प्रेरणा से आदिवासी समाज धर्मांतरण के षड्यंत्रों से जागरूक हुआ। उन्होंने समाज को एकता, आत्मगौरव और धर्मनिष्ठा का पाठ पढ़ाया।
23 अगस्त 2008 को जन्माष्टमी के पावन अवसर पर जब स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती अपने आश्रम में भजन-कीर्तन कर रहे थे, तभी नृशंस षड्यंत्र के तहत उनकी हत्या कर दी गई। इस क्रूर घटना ने सम्पूर्ण राष्ट्र को झकझोर दिया। उनका बलिदान केवल ओडिशा या आदिवासी क्षेत्र के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण हिन्दू समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। स्वामी लक्ष्मणानन्द का सम्पूर्ण जीवन हिन्दू समाज की सेवा को समर्पित रहा। उन्होंने जंगल-जंगल घूमकर आदिवासी भाई-बहनों में यह भावना जगाई कि वे हिन्दू संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। उनकी सेवा से लाखों लोगों का जीवन परिवर्तित हुआ। स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती जी का जीवन साधना, सेवा, त्याग और राष्ट्र-धर्म रक्षा का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने जिस आदिवासी समाज को शिक्षा, संस्कार और धर्म की ज्योति दी, वही आज उन्हें “आदिवासी संत” और “धर्मरक्षक” के रूप में स्मरण करता है। उनका बलिदान हमें यह स्मरण कराता है कि जब-जब धर्म पर आघात होगा, तब-तब ऐसे संत समाज को नई दिशा देंगे।

















