भारत के सबसे स्वच्छ शहर और मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी और मिनि मुंबई के नाम से अपनी विशेष पहचान रखनेवाला शहर इंदौर इन दिनों भारी संकट में है। मामला सीधे-सीधे शहर की पहचान, सांप्रदायिक सौहार्द और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा है। चंदन नगर क्षेत्र में बिना अनुमति गलियों के नाम बदलने और उन पर मजहब विशेष से जुड़े बोर्ड लगाए जाने के बाद एक बार फिर यह साफ हो गया है कि विशेष समुदाय के कई लोग माननेवाले नहीं हैं। उन्हें आगे भी वही करना है जो उन्हें सही लगता है । इस प्रकरण ने नगर निगम प्रशासन को कठघरे में तो खड़ा किया ही है साथ में यह भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि प्रदेश में सबसे ज्यादा लव जिहाद के केस आने के बाद क्या यह इंदौर का “इस्लामीकरण” करने की दिशा में उठाया गया कोई नया तरीका है?
रातों रात बदले गए चंदन नगर के बोर्ड
दरअसल, इंदौर नगर निगम के वार्ड क्रमांक 70 (चंदन नगर) से कांग्रेस पार्षद फातमा रफीक ख़ान पर आरोप है कि उन्होंने बिना निगम की एमआईसी (Mayor-in-Council) से अनुमति लिए गलियों के नाम धर्म विशेष (इस्लामी) नाम पर बदल दिए, इतना ही नहीं, नए नामों के साथ साइनबोर्ड भी लगा दिए गए। लेकिन सोशल मीडिया पर जैसे ही तस्वीरें वायरल हुईं, शहरभर में हड़कंप मच गया। लोग सवाल करने लगे कि आखिरकार इतनी बड़ी कार्रवाई बिना प्रशासन की जानकारी और सहमति के कैसे हो सकती है?
महापौर का सख्त रुख और कार्रवाई
दूसरी तरफ इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने स्पष्ट किया कि बिना एमआईसी की मंजूरी के किसी भी गली या स्थान का नाम बदलना असंवैधानिक और गैरकानूनी है। उन्होंने इस मामले में पार्षद पर एफआईआर दर्ज कराने और अवैध रूप से लगे सभी बोर्ड हटाने के आदेश दिए। महापौर का बयान एक तरह से राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों के लिए साफ था कि नगर निगम की अनुमति से परे जाकर कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से सार्वजनिक स्थलों का नामकरण नहीं कर सकता। वहीं मामले में भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र आकाश विजयवर्गीय ने निगम आयुक्त को पत्र लिखकर साफ चेतावनी दी कि यदि इस अवैध बदलाव को तुरंत रद्द नहीं किया गया और जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो उग्र आंदोलन किया जाएगा।
“लव जिहाद के बाद लैंड जिहाद” की साजिश?
आकाश विजयवर्गीय ने इसे “लव जिहाद के बाद लैंड जिहाद” की साजिश से जोड़ा है, और कहा कि लव जिहाद के साथ अब लैंड जिहाद भी शुरू हो गया है और इसे सभी को गंभीरता से देखना चाहिए। सभी परिवर्तित नाम के बोर्ड तुरंत हटाकर पुराने नाम वाले बोर्ड लगाए जाएं। साथ ही भाजपा कार्यकर्ताओं का मानना है कि इंदौर में गलियों के नाम बदलने की यह घटना “लैंड जिहाद” का हिस्सा है। एक पार्षद अकेले इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकता। उनके अनुसार इसमें वार्ड से जुड़े निगम कर्मचारियों और कुछ अधिकारियों की मिलीभगत रही है। उन्होंने दोषी अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई की मांग की। साथ ही यहां तक कहा कि अगर इस तरह की घटनाओं पर लगाम नहीं लगाई गई तो भविष्य में इंदौर जैसे शहर की पहचान बदलने में देर नहीं लगेगी।
भारत का कानून क्या कहता है.?
भारत में किसी भी शहर या कस्बे की सड़क, गली या सार्वजनिक स्थल का नाम बदलने की प्रक्रिया तय है। नगर निगम या नगर पालिका की परिषद बैठक में प्रस्ताव पारित होता है। फिर राज्य सरकार की सहमति मिलती है। इसके बाद ही नाम बदला जा सकता है। इस केस में कोई भी आधिकारिक प्रक्रिया पूरी नहीं की गई, फिर भी बोर्ड लग गए। ऐसे में यह सीधे-सीधे कानून और संविधान की अवहेलना है। इस संबंध में एडवोकेट आशुतोष कुमार झा का कहना है कि यदि ऐसी मिसालें कायम हो जाती हैं तो कोई भी गुट या समुदाय अपनी मर्जी से बोर्ड लगाकर किसी इलाके की पहचान बदल सकता है। कानून के नजरिए से यह कृत्य अपराध है और अपराधी के लिए सजा का प्रावधान है।
इंदौर की साझा पहचान पर खतरा
उन्होंने कहा, इंदौर को हमेशा से एक सांझा सांस्कृतिक और व्यापारिक पहचान वाला शहर माना गया है। यहां विभिन्न मत, संप्रदाय, रिलीजन, धर्मों और भाषाओं के लोग रहते हैं। यदि किसी खास धर्म या समुदाय के नाम पर गली-मोहल्लों के नामकरण की कोशिश होती है, तो इससे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तेज हो सकता है। यही कारण है कि इस विवाद को “सिर्फ नाम बदलने” की घटना न मानकर, “सामाजिक मनोविज्ञान को प्रभावित करने वाली सुनियोजित कोशिश” के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा कार्यकर्ताओं के अलावा स्थानीय लोगों ने भी इसे इंदौर की पहचान पर खतरा बताया।
नागरिकों की प्रतिक्रिया और चेतावनी
प्रांजल गर्ग ने कहा कि निगम और सरकारी तंत्र में बैठे उन लोगों की पहचान करना जो ऐसी गतिविधियों में सहयोग कर रहे हैं, आज बहुत जरूरी हो गया है, इन सभी को कानून सम्मत दंड दिया जाना जरूरी है। महेश तिवारी बोले- यह मामला सिर्फ एक पार्षद या एक वार्ड का नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि अगर समय रहते ऐसे प्रयासों पर रोक नहीं लगाई गई तो शहर की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान बदलने में देर नहीं लगेगी। वहीं, वीरेंद्र व्यास, अपर्णा दुबे, सर्दुल राठौर, नरेंद्र कुमार सिंह जैसे कई नागरिकों ने कहा कि नगर निगम हर वार्ड में निरीक्षण कर अवैध बोर्ड या नामकरण की जांच करे। दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई हो। आज नाम बदलने की प्रक्रिया को सभी शहर की पहचान बचाने से जोड़कर जरूर देखें।
इंदौर के लिए चेतावनी की घंटी
फिलहाल इंदौर के चंदन नगर से शुरू हुआ यह विवाद पूरे शहर और प्रदेश के लिए एक चेतावनी की घंटी है। इतना तय है कि मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में “इस्लामीकरण” का नया तरीका खोज निकालने का ये एक नया प्रयास जरूर होता हुआ नजर आता है।

















