हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा है। खासतौर पर टैरिफ (शुल्क) को लेकर दोनों देशों के रिश्तों में खटास आई है। अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 25% बेस टैरिफ (मूल शुल्क) और रूस से खरीदे जा रहे कच्चे तेल पर अतिरिक्त 25% शुल्क लगाने की घोषणा की है। इससे भारत को बड़ा झटका लगा है और इस फैसले को भारत सरकार ने “अनुचित और अव्यावहारिक” बताया है।
अमेरिका का रवैया- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह स्पष्ट किया कि रूस से तेल खरीदने पर लगाया गया अतिरिक्त शुल्क यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। उन्होंने 15 अगस्त को अलास्का में पुतिन से मुलाकात भी की, जिससे यह संकेत मिला कि अमेरिका इस युद्ध को खत्म कराने के लिए राजनयिक और आर्थिक दोनों रास्तों से दबाव बनाना चाहता है। इस स्थिति का सीधा असर भारत पर पड़ा है। अमेरिका के इस कदम से भारतीय उत्पादों के अमेरिकी बाजारों में प्रवेश पर बाधा आ सकती है। भारत-अमेरिका के बीच 25 अगस्त को होने वाली व्यापार वार्ता को भी इसी वजह से स्थगित कर दिया गया है।
रूस का भारत को समर्थन- ऐसे समय में रूस ने भारत के प्रति समर्थन जताते हुए एक बड़ा ऑफर दिया है। भारत में रूसी दूतावास के उप प्रमुख (चार्ज डी’अफेयर्स) रोमन बाबुश्किन ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि यदि अमेरिका टैरिफ के कारण भारतीय उत्पादों को अपने बाजार में प्रवेश नहीं करने देता, तो रूस भारतीय उत्पादों को खुले दिल से अपनाने के लिए तैयार है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग मजबूत और स्थायी है, और यह बाहरी दबावों के बावजूद जारी रहेगा। बाबुश्किन ने कहा कि भारत के लिए वर्तमान परिस्थितियां कठिन हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच आपसी भरोसे और सहयोग की मजबूत नींव है।
पश्चिमी देशों की आलोचना- बाबुश्किन ने अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की आलोचना करते हुए कहा कि उनका “नव-औपनिवेशिक” रवैया चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि एकतरफा फैसलों से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और विकासशील देशों की ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ता है। पश्चिमी देश अपने हित में फैसले लेकर दूसरों पर दबाव डालते हैं। भारत अगर रूसी तेल न भी खरीदे, तो भी उसे पश्चिम से खास मदद नहीं मिलेगी।












