चीन के विदेश मंत्री मंगलवार तक भारत के दौरे पर थे। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी सहित कई नेताओं से मुलाकात की। उन्होंने भारत को साझेदार बताते हुए कहा कि हम दुश्मन नहीं है, लेकिन चीन जाते-जाते ताइवान को लेकर ऐसा कुछ कहा जिससे उनका बयान मीडिया की सुर्खियों में आ गया। इसके बाद भारत की तरफ से भी बयान आया। दरअसल 18 अगस्त को भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के बाद चीनी विदेश मंत्रालय ने दावा किया कि भारत ने वन चाइना नीति का समर्थन करते हुए ताइवान को चीन का हिस्सा माना है।
चीनी विदेश मंत्रालय ने क्या दावा किया है
चीनी विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, जयशंकर ने वांग यी के साथ बातचीत में कहा कि भारत वन चाइना नीति का समर्थन करता है। ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दे को लेकर चीनी विदेश मंत्रालय के इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अटकलों का दौर शुरू हो गया। हालांकि,भारतीय सूत्रों ने चीन के इस दावे को लेकर कहा कि ताइवान को लेकर भारत के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। भारत ताइवान के साथ अपने संबंधों को मुख्य रूप से आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक स्तर पर जारी रखेगा। भारत का कहना है कि जैसे अन्य देश ताइवान के साथ व्यवहार करते हैं, वैसा ही उसका भी नजरिया है।
क्या है चीन-ताइवान विवाद?
जानकारी के लिए बता दें कि ताइवान का इतिहास चीन के साथ लंबे और जटिल संघर्षों से जुड़ा है। यह द्वीप पहले किंग राजवंश के अधीन था,लेकिन 1895 में जापान के हाथों चीन की हार के बाद इसे जापान को सौंप दिया गया था लेकिन फिर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में चीन ने फिर से ताइवान पर नियंत्रण पा लिया। परन्तु 1949 में हुए गृहयुद्ध के परिणामस्वरूप राष्ट्रवादी सरकार ताइवान चली गई और वहां चीन गणराज्य (ROC) की स्थापना की और ताइवान के मुख्य भूमि पर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) अस्तित्व में आया।
तब से PRC और ROC दोनों पूरे चीन की वैध सरकार होने का दावा करते हैं। बीजिंग वन चाइना पॉलिसी के तहत ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है और बल प्रयोग की संभावना से कभी इंकार नहीं किया है तो वहीं दूसरी ओर ताइवान ने अपनी अलग सरकार, संविधान और लोकतांत्रिक प्रणाली के साथ एक स्वतंत्र पहचान बनाई है।












