कसौटी पर न्याय का तराजू !
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न्यायपालिका : कसौटी पर न्याय का तराजू !

24 साल पुराने विवाद के नए निर्णय ने मेधा पाटकर प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय की नरमी पर सवाल खड़े किए हैं, और वामपंथी इकोसिस्टम की मजबूती को फिर से उजागर किया है

Written byडॉ विश्वास चौहानडॉ विश्वास चौहान
Aug 20, 2025, 01:18 pm IST
in भारत
मेधा पाटकर और दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना

मेधा पाटकर और दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना

ग्यारह अगस्त, 2025 को देश की सर्वोच्च अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर की आपराधिक मानहानि (धारा 500, भारतीय दंड संहिता) में दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा, परंतु सजा और जुर्माने में भारी राहत दी। यह मामला वर्ष 2000 का है, जब पाटकर ने गुजरात के एक पत्रकार दिलीप गोहिल को ईमेल द्वारा एक प्रेस नोट भेजा था। इसमें उन्होंने उस समय गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार के सरदार सरोवर बांध योजना के समर्थक तथा अमदाबाद स्थित नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के प्रमुख वी.के. सक्सेना पर हवाला कारोबार में लिप्त होने के आरोप लगाए और उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाए थे।

पत्रकार गोहिल ने मेधा पाटकर के पत्र को गुजराती में प्रकाशित किया और सक्सेना ने इसे अपनी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला बताते हुए आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर किया।

यदि हम निचली अदालत से सर्वोच्च न्यायालय तक इस मामले की 24 वर्ष की यात्रा को देखें तो पता चलता है कि मामले के दर्ज होने के बाद साकेत जिला न्यायालय, दिल्ली (1 जुलाई, 2024) ने मेधा पाटकर को दोषी ठहराते हुए 5 महीने की साधारण कैद और 10 लाख रुपए जुर्माना लगाया। न्यायालय ने माना कि आरोप बेबुनियाद थे और उनका उद्देश्य सक्सेना की छवि धूमिल करना था।

मेधा पाटकर ने मजिस्ट्रेट के निर्णय के विरुद्ध सत्र न्यायालय में पुनरीक्षण आवेदन दिया, तब सत्र न्यायालय (2 अप्रैल, 2024) में दोषसिद्धि तो बरकरार रही, पर सजा में राहत मिली, साथ ही 10 लाख रुपए जुर्माने को घटाकर 1 लाख रुपए कर दिया गया और मेधा पाटकर को 25,000 रुपए के ‘प्रोबेशन बॉन्ड’ पर रिहा कर दिया गया।

पीड़ित पक्ष सक्सेना ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील की। दिल्ली उच्च न्यायालय ने (29 जुलाई, 2024) निचली अदालत के निर्णय सही ठहराया, केवल पेशी की शर्त को ऑनलाइन पेशी में बदला।

सर्वोच्च न्यायालय में इस निर्णय के विरुद्ध अपील की गई। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए एक लाख का जुर्माना और प्रोबेशन की शर्तें हटा दीं। पाटकर को केवल मुचलका भरने की औपचारिक छूट दी गई। यहां यह प्रश्न खड़ा होता है कि जब दंड संहिता के प्रावधानानुसार अपराध साबित हो गया है तो दंड भी विधिसम्मत देने में न्यायालय ने ढिलाई, क्यों की? क्या यह भारतीय संविधान के समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है?

इसी तारतम्य में एक केस सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ (2016) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि प्रतिष्ठा, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का हिस्सा है, और आपराधिक मानहानि कानून को उचित ठहराया, लेकिन पाटकर मामले में, जब अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि आरोप झूठे और दुर्भावनापूर्ण थे, तब सजा और जुर्माने को लगभग समाप्त कर देना क्या न्याय का संतुलन बिगाड़ना नहीं है? अगर यही अपराध किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा किया गया होता, तो क्या उसे भी “70 वर्ष की आयु” और “सामाजिक कार्य” के आधार पर यह राहत मिलती?

आर्थिक अनियमितताओं के आरोप

मेधा पाटकर के खिलाफ केवल यह मानहानि मामला ही नहीं, बल्कि वित्तीय गड़बड़ियों के गंभीर आरोप भी हैं। मेधा पाटकर के विरुद्ध एनजीओ फंड गबन (बड़वानी, मप्र-जुलाई 2022) का आपराधिक केस दर्ज है। इसके तहत पाटकर पर ‘नर्मदा नव निर्माण अभियान’ के लिए मिलने वाली 13–14 करोड़ रू. की राशि के दुरुपयोग का मामला दर्ज है। यह राशि आदिवासी (जनजाति) शिक्षा और पुनर्वास हेतु मिली थी, उन पर उसके दुरुपयोग का आरोप है। यह केस धारा 420 (धोखाधड़ी) और 406 (आपराधिक न्यासभंग) के तहत दर्ज है, जिसमें आरोप है कि यह राशि आंदोलनों और राजनीतिक अभियानों में खर्च हुई।

मेधा पाटकर पर एक अन्य केस मनी लॉन्ड्रिंग (ईडी केस -अप्रैल 2022) का है, प्रवर्तन निदेशालय ने पीएमएलए (धन शोधन निवारण अधिनियम) के तहत विदेशी व घरेलू दान में अनियमितताओं का केस दर्ज किया। इस केस के आरोपों में एक ही दिन में भारी मात्रा में कई दान, सरकारी कंपनी से संदिग्ध हस्तांतरण, और उद्देश्य से भिन्न उपयोग शामिल हैं। हालांकि पाटकर इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताती हैं, लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उनकी कानूनी पृष्ठभूमि पहले से विवादित है।

नर्मदा बांध और वैचारिक टकराव

मेधा पाटकर और वीके सक्सेना के बीच विवाद की जड़ गुजरात का सरदार सरोवर बांध है। नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो सक्सेना इस परियोजना के समर्थक थे। वे इसे ऊर्जा और सिंचाई का महत्वपूर्ण साधन मानते थे। उधर पाटकर की नर्मदा बचाओ आंदोलन टीम इसका कड़ा विरोध करती रही, इसे विस्थापन और पर्यावरण विनाश का प्रतीक बताती रही। इसी सिलसिले में मेधा ने 2000 का प्रेस नोट जारी किया, जिसने इस मानहानि केस को जन्म दिया, यह इस टकराव की पृष्ठभूमि में जारी हुआ था। ऐसे में, यह केवल कानूनी मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक वैचारिक संघर्ष का विस्तार भी था।

विरोधाभासी न्यायिक दृष्टांत

सर्वोच्च न्यायालय ने मेधा पाटकर जैसे मामलों में आयु और सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि होने पर भी बाल ठाकरे बनाम हरीश पिम्पलखुटे (2005) के केस में राजनीतिक व्यक्तित्व होने के बावजूद मानहानि केस खारिज नहीं किया, और ट्रायल का सामना करना पड़ा। इसी प्रकार एम.एस. जयराज बनाम कमिश्नर ऑफ एक्साइज (2000)-चरित्र पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी भी गंभीर मानी गई और कार्रवाई आवश्यक बताई गई। इन सभी मामलों में अदालत ने कठोर दृष्टिकोण अपनाया, जबकि पाटकर मामले में राहत का स्तर ‘डिटरेंस’ (निवारक प्रभाव) को कमजोर करता है।

न्याय के तराजू में झुकाव का खतरा

अनुच्छेद 14 के तहत ‘कानून के समक्ष समानता’ केवल किताबों का वाक्य नहीं है। यह विश्वास है कि अदालत सभी के साथ समान व्यवहार करेंगी। जब अदालत ‘सामाजिक कार्य’ और ‘आयु’ को राहत के कारण मानती है, तो निम्नलिखित सवाल उठते हैं, क्या लंबी राजनीतिक सक्रियता सजा कम करने का पासपोर्ट है? क्या आर्थिक अपराधों के आरोपों के बीच किसी को अतिरिक्त नरमी मिलनी चाहिए? क्या यह न्यायिक मिसाल भविष्य में वैचारिक निकटता के आधार पर सजा कम करने का रास्ता खोलेगी?

इस मामले में न्यायालय ने न्याय के बजाय विचारधारात्मक सहानुभूति प्रदर्शित की है। सर्वोच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखकर सिद्धांत की तो रक्षा की, लेकिन सजा घटाकर निष्पक्ष न्याय के संदेश को कमजोर कर दिया। यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के प्रति जनता के विश्वास को डगमगा सकता है। न्याय केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखना भी चाहिए। जब राहत का स्वरूप किसी व्यक्ति के राजनीतिक या वैचारिक प्रोफ़ाइल से मेल खाता दिखे, तो जनता न्याय नहीं, पक्षपात देखती है, और लोकतंत्र के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है।
(लेखक भोपाल के विधि महाविद्यालय में प्राध्यापक हैं)

Topics: सर्वोच्च अदालतLeft Ecosystemपाञ्चजन्य विशेषवामपंथी इकोसिस्टमनेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीजNational Council for Civil LibertiesSupreme CourtSardar Sarovar Dam Projectन्यायपालिकाNarmada Damjudiciaryसरदार सरोवर बांध योजनानरेंद्र मोदी सरकारनर्मदा बांधNarendra Modi Government
डॉ विश्वास चौहान
डॉ विश्वास चौहान
संयोजक जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र , मध्यप्रदेश ( प्राध्यापक विधि , शासकीय स्टेट लॉ कॉलेज भोपाल, मध्य प्रदेश ) [Read more]
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