TTP शिकंजे में जिन्ना के देश के कबायली इलाके! जानिए, टीटीपी के आतंक ​का हाल
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TTP शिकंजे में जिन्ना के देश के कबायली इलाके! जानिए, टीटीपी के आतंक ​का हाल

टीटीपी नाम का जिहादी संगठन मुख्य रूप से पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी कबायली इलाकों में सक्रिय माना जाता है, जिसमें विशेष रूप से खैबर पख्तूनख्वा और वजीरिस्तान जैसे प्रांत आते हैं। साल 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद टीटीपी को एक प्रकार से शह ही मिली

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Aug 18, 2025, 06:32 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
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भारत के पड़ोसी जिन्ना के कट्टर इस्लामी आतंकवादियों की पनाहगाह बन चुके जिन्ना के देश के माथे के बल घटने की बजाय बढ़ते जा रहे हैं। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के खौफ से उस देश की सत्ता और सेना प्रमुख ही नहीं बल्कि सैनिक भी घबराते हैं। ताजा जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान के कबायली इलाकों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की बढ़ती गतिविधियां और प्रभाव पाकिस्तान के राजनीति और सैन्य गलियारों में दशहत की वजह बनी हैं। यह गुट पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता और सैन्य प्रतिष्ठान के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है।

2007 में गठित हुआ इस्लामी जिहादी संगठन टीटीपी का उद्देश्य पाकिस्तान में शरीयत आधारित शासन स्थापित करना था। यह संगठन मुख्य रूप से पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी कबायली इलाकों में सक्रिय माना जाता है, जिसमें विशेष रूप से खैबर पख्तूनख्वा और वजीरिस्तान जैसे प्रांत आते हैं। साल 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद टीटीपी को एक प्रकार से उससे शह ही मिली। अफगान सीमा से सटे इलाकों में इस संगठन ने धीरे धीरे अपनी पकड़ मजबूत की। लेकिन हाल के महीनों में टीटीपी ने पाकिस्तानी सेना की कई सुरक्षा चौकियों पर जिहादी हमले किए हैं, जिसमें सैकड़ों पाकिस्तानी सैनिकों की जान जा चुकी है।

उधर, पाकिस्तानी सेना ने पिछले दो दशकों में इस इस्लामी जिहादी संगटन के खिलाफ कई सैन्य अभियान चलाए हैं, जैसे ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़ब और रद्द-उल-फसाद, लेकिन यह संगठन पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया। टीटीपी की नई रणनीति “गोरिल्ला युद्ध” और स्थानीय समर्थन पर आधारित है, जिससे सेना को पारंपरिक सैन्य रणनीतियों से निपटना मुश्किल हो रहा है। सेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह संगठन अब महज एक आतंकवादी संगठन नहीं रहा है, यह एक राजनीतिक और सामाजिक नेटवर्क बन चुका है, जो स्थानीय आबादी में अंदर तक घुल-मिल गया है।

अफगानिस्तान में सत्ता में कायम तालिबान लड़ाकों और टीटीपी एक ही कट्टरपंथी सोच पर तो चलते हैं, लेकिन अफगान तालिबान ने बड़ी होशियारी के साथ खुद को सार्वजनिक रूप से टीटीपी से अलग ही दिखाया है। कई मौकों पर तो उसने टीटीपी को ‘सलाह’ दी है कि पाकिस्तान में हिंसा से दूर रहे। इसके बावजूद, अफगानिस्तान में टीटीपी को सुरक्षित पनाहगाह मिलने की खबरें भी सामने आती रही हैं। पाकिस्तान की ओर से कई वार्ताकार अफगानिस्तान भेजे गए थे कि कैसे भी टीटीपी को काबू में रहने को कहा जाए, लेकिन उस कोशिश का भी इस्लामाबाद को कोई फायदा नहीं मिला।

अफगान तालिबान की सरकार टीटीपी को नियंत्रित करने में ‘नाकाम’ रही है, उसकी कोई ऐसी इच्छा भी नहीं दिखती, जिससे पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संबंधों में तनाव बढ़ता ही गया है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर टीटीपी को एक रणनीतिक खतरे के रूप में देख तो रहे हैं, लेकिन उसके विरुद्ध कोई प्रभावी कदम नहीं उठा पाए हैं। उनकी चिंता केवल सैन्य नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय छवि से भी जुड़ी है।

असीम मुनीर ने हाल ही में अमेरिका, चीन और अन्य देशों के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है, ताकि टीटीपी सहित अन्य आतंकी, विद्रोही संगठनों के खिलाफ एक व्यापक रणनीति बनाई जा सके, लेकिन जिन्ना के देश में राजनीतिक आम सहमति की भारी कमी है। नेताओं को भ्रष्टाचार से फुर्सत नहीं है। इसलिए टीटीपी जैसे गुट अपने पैर पसारते जा रहे हैं और कबायली इलाकों में तो हालत यह हो चुके हैं कि सेना उनमें दाखिल होने से थरथराती है।

कहना न होगा, टीटीपी का नए सिरे से हावी होना जिन्ना के इस्लामी देश के लिए एक बड़ा संकट बनता जा रहा है। अफगान तालिबान की इस ओर उदासीनता ने पाकिस्तान को एक मुश्किल स्थिति में ला खड़ा किया है। असीम मुनीर को पता है कि यह गुट पाकिस्तान की ईंट से ईंट बजा देने का दम रखता है। इसलिए अगर इसे उसके अस्तित्व का संकट कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

Topics: टीटीपीअसीम मुनीरTerror OrganizationPakistanafghanistantalibanterrorismttpआतंकasim munir
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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