स्वराज्य के अजेय योद्धा
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पेशवा बाजीराव की 325वीं जयंती पर विशेष : स्वराज्य के अजेय योद्धा

श्रीमंत पेशवा बाजीराव प्रथम 20 वर्ष के कार्यकाल में सभी 41 युद्धों में अपराजेय रहे। उन्होंने मुगलों, निजामों, पुर्तगालियों और अंग्रेजों को पराजित कर हिंदवी स्वराज्य के स्वप्न को साकार किया। दिल्ली, मालवा, वसई और भोपाल विजय जैसे अभियानों से उन्होंने अखिल भारतीय मराठा परिसंघ की नींव रखी

Written byप्रो. भगवती प्रकाश शर्माप्रो. भगवती प्रकाश शर्मा
Aug 17, 2025, 11:55 pm IST
inभारत, विश्लेषण
पेशवा बाजीराव

पेशवा बाजीराव

स्वराज्य के अजेय योद्धा श्रीमंत पेशवा बाजीराव प्रथम ने अपने अद्वितीय रण-कौशल और नेतृत्व क्षमता से 18वीं सदी में मराठा साम्राज्य को भारत की शीर्ष शक्ति बना दिया था। अपने 20 वर्ष के कार्यकाल (1720-40) में उन्होंने 41 युद्ध लड़े और सभी में विजय प्राप्त की। यह एक अभूतपूर्व सैन्य कीर्ति है।

प्रोफेसर भगवती प्रकाश शर्मा
समूह अध्यक्ष, पेसिफिक एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी, उदयपुर

बाजीराव ने दिल्ली, मालवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में मुगलों, निजामों, अंग्रेजों और पुर्तगालियों के विरुद्ध अपूर्व सफलताएं हासिल कीं। हिन्दवी स्वराज्य के महान लक्ष्य को साकार करने के लिए वे एक केंद्रीय शक्ति के रूप में उभरे और अवध, रुहेलखंड जैसे राज्यों से भी सहयोग की संधियां कर देशव्यापी एकता का मार्ग प्रशस्त किया। उस समय भारत की जनता मुगल सूबेदारों, निजामों, अंग्रेजों और पुर्तगालियों के अत्याचारों से त्रस्त थी। उस समय मंदिरों का विध्वंस, जबरन कन्वर्जन और महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार आम थे।

बाजीराव प्रथम ने ऐसे कठिन समय में उत्तर से दक्षिण तक विजय पताका फहराई। उनकी अपराजेय सेना और व्यापक रणनीतिक समझ ने एक समय ऐसा वातावरण बना दिया था कि पूरे देश को लगा कि भारतभूमि विदेशी दासता से शीघ्र मुक्त होने वाली है।

विजय का स्वर्ण अध्याय

पेशवा बाजीराव प्रथम ने 1724 में शकरखेड़ा के युद्ध में मुबारिज़ खां को हराकर दक्खन को मुगल प्रभाव से मुक्त करा लिया। 1724 से 1726 के बीच उन्होंने मालवा और कर्नाटक पर नियंत्रण स्थापित किया। महाराष्ट्र के शत्रु निजाम-उल-मुल्क (निज़ाम प्रथम) को 1728 में पालखेड़ के युद्ध में पराजित कर उससे चौथ और सरदेशमुखी वसूली।

उन्होंने उसी वर्ष, मालवा और बुंदेलखंड में मुगल सेनानायकों गिरधर बहादुर और दया बहादुर को हराया तो 1729 में मुहम्मद खां बंगश को भी परास्त किया। पुर्तगालियों और अंग्रेजों को भी 1728 में बुरी तरह पराजित किया।

1737 में दिल्ली विजय अभियान बाजीराव की सैन्यशक्ति का चरमोत्कर्ष रहा, जहां उन्होंने मुगलों की राजधानी में मराठा ध्वज फहराया। उसी वर्ष भोपाल के युद्ध में उन्होंने एक बार फिर निजाम को पराजित किया। न्होंने 1739 में निजाम द्वितीय नासिर जंग को भी उहराया। अमेरिकी इतिहासकार बर्नार्ड मोंटगोमेरी के अनुसार, ‘बाजीराव भारत के इतिहास के सबसे महान सेनापति थे।’

बाजीराव और उनके भाई चिमाजी अप्पा ने पुर्तगालियों द्वारा बेसिन (वसई) में किए जा रहे कन्वर्जन और अत्याचारों के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष किया। 1739 में चिमाजी अप्पा ने पुर्तगालियों को पराजित कर ‘वसई की संधि’ संपन्न की और वहां के लोगों को मुक्त कराया।

मराठा साम्राज्य का उत्कर्ष

पेशवा बाजीराव प्रथम की सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक विजय 1728 में पालखेड़ के युद्ध में हुई, जब उन्होंने हैदराबाद के निजाम को निर्णायक रूप से पराजित किया। निजाम को आत्मसमर्पण करना पड़ा और 6 मार्च, 1728 को ‘मुंगी-शेवगांव की संधि’ पर हस्ताक्षर किए गए। इस संधि के तहत, बाजीराव को दक्खन में ‘सरदेशमुखी और चौथ’ वसूलने का अधिकार मिला। साथ ही, निजाम ने शाहूजी को ‘मराठा साम्राज्य का वैध छत्रपति’ और संभाजी द्वितीय को ‘कोल्हापुर का छत्रपति’ मान्यता दी।

बाजीराव ने अपने कार्यकाल में जितने युद्ध लड़े, उनमें 1737 की दिल्ली विजय सबसे उल्लेखनीय है। इस अभियान को इतिहास में दिल्ली पर ‘अब तक का सबसे तीव्र गति वाला आक्रमण’ माना जाता है। तालकटोरा के पास हुए भीषण युद्ध के बाद बाजीराव की सेना ने तीन दिन तक दिल्ली में मुगल बादशाह को बंधक बनाए रखा। इससे 12वां मुगल बादशाह और औरंगजेब का नाती इतना डर गया कि लाल किले से बाहर निकलने का साहस नहीं कर सका और अंततः किले के तहखाने में छिप गया। हालांकि, दक्षिण में निजाम फिर से सिर उठा रहा था, इसलिए बाजीराव को लौटना पड़ा। लौटते समय उनका सामना भोपाल के पास निजाम से हुआ। इस युद्ध में बाजीराव ने दुश्मन की दोनों सेनाओं को पराजित कर ‘दोराहा भोपाल की संधि’ की। इस संधि के फलस्वरूप मालवा का संपूर्ण क्षेत्र मराठा स्वराज्य में शामिल हो गया और मराठा संघ का प्रभाव संपूर्ण भारत में स्थापित हो गया।

युवा योद्धा का उदय

बाजीराव ने पेशवा बनने से पहले ही मात्र 18 वर्ष की आयु में अपने पिता पेशवा बालाजी विश्वनाथ भट्ट के नेतृत्व में दिल्ली पर पहली आंशिक विजय प्राप्त की थी। इस अभियान की पृष्ठभूमि 1718 में बनी, जब दक्खन के मुगल सूबेदार सैयद हुसैन अली और मराठों के बीच एक महत्वपूर्ण संधि हुई। इसके अनुसार, मराठों को स्वराज्य के सभी किले लौटाए जाने थे, दक्खन के छह मुगल सूबों से चौथ और सरदेशमुखी का अधिकार मिलना था और छत्रपति शाहू के परिवार के सदस्यों को रिहा किया जाना था।

हालांकि, मुगल शासक फर्रुखसियर ने इस संधि की पुष्टि करने से इनकार कर दिया। इसके विरोध में पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने हुसैन अली के साथ मिलकर अपने पुत्र बाजीराव और मराठा सेना के साथ दिल्ली की ओर कूच किया। 16 फरवरी, 1719 को संयुक्त मराठा सेना दिल्ली पहुंची और इसे घेर लिया। सैयद बंधुओं के सहयोग से बादशाह को बंदी बनाकर उसकी हत्या कर दी गई। उसके स्थान पर रफीउद्दारजात नामक एक कठपुतली शासक को सिंहासन पर बैठाया गया। बालाजी विश्वनाथ ने नए बादशाह पर दबाव डालकर मराठों के पक्ष में तीन महत्वपूर्ण फरमान (सनदें) जारी कराए।\

  •  छत्रपति शाहू को छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित स्वराज्य पर वैध अधिकार दिया गया, जो ताप्ती से कृष्णा नदी तक फैला था।
  •  मराठों को दक्खन के छह सूबों से चौथ और सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार मिला।
  •  छत्रपति शाहू के परिवार के सभी सदस्यों को रिहा किया गया।

इस सफलता ने न केवल मराठा शक्ति की राजनीतिक मान्यता को मजबूत किया, बल्कि एक युवा बाजीराव को भी रणनीति, राजनीति और युद्धकला में भविष्य के महान सेनापति के रूप में स्थापित कर दिया।

मराठा परिसंघ की स्थापना

पेशवा बाजीराव प्रथम की मालवा विजय उनके सैन्य कौशल और रणनीतिक नेतृत्व की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। उन्होंने 1724 में ही नर्मदा नदी पार कर मालवा को अपने नियंत्रण में ले लिया और अपने विश्वस्त सेनानायकों उदाजी पवार, मल्हारराव होल्कर और राणोजी सिंधिया के अधीन धार, इंदौर और ग्वालियर की रियासतों की स्थापना की। ये सभी रियासतें पेशवा के अधीनस्थ मराठा परिसंघ का हिस्सा बनीं और सदैव स्वराज्य के प्रति निष्ठावान रहीं।

इसी दौरान, बाजीराव ने निजाम को भी कई बार पराजित किया। यह वही निजाम था, जो कभी मुगल साम्राज्य का वजीर, सेनानायक और सूबेदार रहा था। छत्रपति शाहू और पेशवा बालाजी विश्वनाथ के समय ही मराठों ने मुगल बादशाह से दक्खन के छह सूबों से चौथ और सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार प्राप्त किया था। जब निजाम ने इस अधिकार को चुनौती दी और कर देने से मना कर दिया, तब बाजीराव ने 1728 में पालखेड़ के प्रसिद्ध युद्ध में उसे निर्णायक रूप से पराजित किया। इस जीत के बाद निजाम ने छत्रपति शाहू को कृष्णा नदी के उत्तर में महाराष्ट्र का वैध अधिपति स्वीकार किया और वह मराठों से छीने गए क्षेत्रों को लौटाने तथा चौथ और सरदेशमुखी कर वसूली को मान्यता देने पर मजबूर हुआ।

इसके दो वर्ष के भीतर ही बाजीराव ने गुजरात को भी अपने अधिकार में कर लिया। इस प्रकार, दक्खन और पश्चिम भारत में हिंदवी स्वराज्य का ध्वज फहराने लगा। धार के पंवार, इंदौर के होल्कर, ग्वालियर के सिंधिया, गुजरात के गायकवाड़ और नागपुर के भोंसले-ये सभी बाजीराव के अधीन मराठा परिसंघ (जिसे आधुनिक इतिहासकार Maratha Confederacy कहते हैं) के प्रमुख घटक बने।

मालवा पर निर्णायक विजय

पेशवा बाजीराव ने 1724 में ही मालवा पर विजय प्राप्त कर उसे धार, इंदौर और ग्वालियर की रियासतों में बांटकर पंवार, होल्कर और सिंधिया जैसे विश्वस्त सहयोगियों को सौंप दिया था। किंतु जब 28 मार्च, 1737 को बाजीराव ने दिल्ली पर सफल चढ़ाई की, तो मुगलों को गहरा आघात लगा। इसके प्रतिशोधस्वरूप, अगस्त 1737 में मुगल बादशाह ने निजाम के बेटे गाज़ीउद्दीन खां को मालवा का सूबेदार नियुक्त कर दिया। इसके बाद निजाम ने बाजीराव के विरुद्ध मालवा की ओर कूच किया।

दतिया और ओरछा के राजाओं ने भी उसका साथ दिया। लेकिन 14 दिसंबर, 1737 को भोपाल के निकट हुए निर्णायक युद्ध में बाजीराव की सेना ने मुगल-निजाम गठबंधन को घेर लिया। निजाम ने अपनी अग्रिम पंक्ति में मुगल राजपूत सैनिकों को भेजा, लेकिन शत्रु सेना की रसद समाप्त हो गई और भुखमरी फैलने लगी। स्थिति इतनी विकट हो गई कि 5 जनवरी, 1738 को मुगल सैनिकों ने तोपें खींचने वाले बैलों को मारकर अपनी भूख मिटाई, जबकि राजपूत सैनिक भूखे ही रह गए। आखिरकार निजाम ने संधि प्रस्ताव भेजा, जिसे बाजीराव ने अपनी शर्तों पर स्वीकार किया।

दोराहा सराय में हुई इस संधि की मुख्य शर्तें थीं- संपूर्ण मालवा अब पेशवा के अधीन रहेगा और नर्मदा और चंबल नदियों के बीच का प्रदेश भी मराठों को सौंपा जाएगा। इस समझौते के बाद निजाम अपमानित होकर दिल्ली लौट गया और मालवा पर मराठों का प्रभुत्व पूर्णतया स्थापित हो गया, जिससे पेशवा बाजीराव की रणनीतिक और सैन्य श्रेष्ठता फिर एक बार सिद्ध हुई।

भोपाल विजय और करार-नीति

मार्च 1737 में दिल्ली विजय के बाद 7 जनवरी, 1738 को भोपाल में पेशवा बाजीराव द्वारा मुगल सेनापति निजाम-उल-मुल्क को निर्णायक रूप से पराजित करना मराठा इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि माना जाता है। निजाम-उल-मुल्क की पराजय से भयभीत भोपाल के नवाब यार मोहम्मद खान ने बाजीराव से तीन वर्ष का करार किया। इसके तहत उसे प्रत्येक वर्ष 69,414 रुपये और महाल (राजकोषीय व्यवस्था) के लिए अतिरिक्त 3,000 रुपये पेशवा को देना स्वीकार करना पड़ा।
हालांकि, इस करार का उल्लंघन होने पर 1746 में भोपाल के तत्कालीन नवाब फैज मोहम्मद खान को अपने राज्य का आधा भाग, जैसे-आष्टा, भिलसा, देवीपुरा, दोराहा, सीहोर, इच्छावर और शुजालपुर पेशवा बाजीराव के उत्तराधिकारी बालाजी बाजीराव को सौंपना पड़ा। इस प्रकार, बाजीराव की सामरिक विजय के साथ-साथ उनकी कूटनीतिक सूझ-बूझ ने भी मराठा प्रभाव को मध्य भारत में मजबूती से स्थापित किया।

उत्तर से दक्षिण तक नियंत्रण

1739 तक उत्तर से दक्षिण तक की कई शक्तियों पर नियंत्रण स्थापित कर श्रीमंत पेशवा बाजीराव ने छत्रपति शिवाजी महाराज के ‘हिंदवी स्वराज्य’ के स्वप्न को साकार करने की दिशा में अनुकूल परिस्थितियां निर्मित कर ली थीं। उसी वर्ष, वसई में पुर्तगालियों को पराजित करने के बाद उन्होंने दिल्ली सहित संपूर्ण भारत को मुगलों और उनके सूबेदारों के नियंत्रण से मुक्त कराने हेतु अपने तीसरे दिल्ली अभियान की तैयारी आरंभ कर दी थी।

यदि 39 वर्ष की अल्पायु में उन्हें प्राणघातक ज्वर न हुआ होता, तो संभवतः वे हिंदू शक्तियों को संगठित कर दिल्ली के सिंहासन पर ‘दीवान जी’ अर्थात् मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह द्वितीय, जो भगवान एकलिंगनाथ के दीवान माने जाते थे, को आसीन कर हिंदवी स्वराज्य की स्थापना कर चुके होते। उस स्थिति में अंग्रेजों के लिए भारत में सत्ता स्थापित करना अत्यंत कठिन हो जाता। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु बाजीराव ने न केवल अपनी दो लाख मराठा सेना लाने का संकल्प लिया था, बल्कि राजपूताना से भी सवा लाख सैनिकों के सहयोग का प्रस्ताव दिया था।

इस संबंध में संस्कृत में एक पत्र भी लिखा था कि ‘शत्रु को हराने का ऐसा संयुक्त प्रयास नहीं किया गया तो हिंदुओं के शाैर्य और धर्म का नाश हो जाएगा।’ ‘एरा ऑफ बाजीराव’ के लेखक डॉ. उदय कुलकर्णी के अनुसार, पत्र की प्रमुख पंक्तियां इस प्रकार थीं-
अन्यञच श्रीमद्भिः सवाईजयसिंह भृतिनामैक्यं संपाद्य सर्वहिदूनां सेवासमुदायः एकत्र स्थापनीयः। सपादलक्षपरिमिता सेना भविष्यति भवतां। अस्माकं च सर्वापि सेनासमुदाय आयास्यति। सर्वां सेनां लक्षद्वयपरिमितां संपाद्य शत्रुपराजये यतनीयं, अन्यथा हिंदूनां शौर्यं स्वधर्मश्च अबूबुडदेव स्यात्।
इस पत्र को लिखने के बाद अप्रैल 1739 में ज्वर से बाजीराव की मृत्यु हो गई। यदि वे स्वस्थ रहते तो मराठा परिसंघ के दो लाख और राजपुताना के सवा लाख सैनिकों की मदद से दिल्ली के सिंहासन पर दीवान जी को स्थापित कर हिंदवी स्वराज की स्थापना साकार हो सकती थी।

मेवाड़ के महाराणाओं के प्रति पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट की अगाध श्रद्धा थी। जब वे जनवरी 1736 में मेवाड़ आए तो उदयपुर के चंपाबाग में महाराणा जगतसिंह द्वितीय के बराबर आसन पर नहीं बैठे। उन्होंने कहा कि ‘‘यह आसन बाप्पा रावल, राणा कुम्भा और महाराणा सांगा जैसे महायोद्धाओं का है, जिन्होंने 1,000 वर्षों तक हिंदू स्वाभिमान के लिए संघर्ष किया है। मैं मेवाड़ के महाराणा के समकक्ष आसन ग्रहण करने योग्य नहीं हूं।’’यह घटना बाजीराव की व्यक्तित्व की महानता और उनकी ऐतिहासिक चेतना का सशक्त उदाहरण है।

हिंदवी स्वराज्य का दायरा

बाजीराव की मृत्यु के बाद भी उनके पुत्र बालाजी बाजीराव (नाना साहब) के नेतृत्व में हिंदवी स्वराज्य का मराठा परिसंघ सशक्त बना रहा। 11 अगस्त, 1757 को रघुनाथ राव, मल्हारराव होल्कर और तुकोजीराव के नेतृत्व में मराठा सेना ने दिल्ली पर विजय प्राप्त की। इसके बाद अप्रैल 1758 तक लाहौर और 8 मई, 1758 तक मुल्तान, पेशावर और अटक भी मराठा नियंत्रण में आ गए। इस काल में मराठा परिसंघ का साम्राज्य पश्चिम में अटक से पूर्व में कटक तक, उत्तर में कश्मीर और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर से दक्षिण में तंजावुर और तिरुचिरापल्ली तक फैल चुका था।कुल लगभग 25 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर पेशवानीत हिन्दवी स्वराज्य का प्रभाव था।

यद्यपि 1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध में प्रतिकूल परिणाम सामने आए, फिर भी श्रीमंत पेशवा माधवराव प्रथम के नेतृत्व में मराठों ने पुनः शक्ति प्राप्त की। माधवराव प्रथम के नेतृत्व में 1771 की दिल्ली विजय के बाद पुनः पेशवानीत हिंदवी स्वराज्य के परिसंघ का दिल्ली उत्तर भारत पर नियंत्रण हो गया था। 1788 में अल्पकाल के लिए दिल्ली पर रोहिल्ला सरदार गुलाम कादिर का नियंत्रण हो गया था।

लेकिन पुनः 2 अक्तूबर, 1788 को महाद जी सिंधिया ने दिल्ली पर नियंत्रण कर शाह आलम द्वितीय की अनुनय पर रोहिल्ला गुलाम कासिर को मृत्युदंड दे दिया। इसके बाद 1788 से 1803 तक पुनः दिल्ली पेशवानीत हिंदवी स्वराज्य के इस मराठा परिसंघ के नियंत्रण में रही और शाह आलम द्वितीय मराठों के संरक्षण में तख्त पर बना रहा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1803 में द्वितीय आंग्ल–मराठा युद्ध के पश्चात् दिल्ली को मराठा परिसंघ से छीन लिया। वस्तुतः अंग्रेजों को भारत में सत्ता स्थापित करने के लिए मुगलों से नहीं, बल्कि पेशवानीत हिंदवी स्वराज्य के मराठा परिसंघ से युद्ध करना पड़ा।

भारत में अंग्रेजी सत्ता की स्थापना मुगलों को पराजित कर नहीं, बल्कि पेशवानीत हिन्दवी स्वराज्य के मराठा परिसंघ से 1775 से 1819 के बीच तीन आंग्ल–मराठा युद्धों और लगभग 150 सैन्य संघर्षों के बाद संभव हो सकी। 1764 के बक्सर युद्ध के बाद मुगलों की ओर से अंग्रेजों के विरुद्ध एक भी गोली नहीं चली।

उस युद्ध में भी बादशाह शाह आलम द्वितीय ने बंगाल के नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और काशी नरेश बलवंत सिंह के सहयोग से अंग्रेजों का सामना किया था। श्रीमंत पेशवा बाजीराव प्रथम न केवल सैन्य दृष्टि से अपराजेय योद्धा थे, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की स्पष्ट दृष्टि और सांस्कृतिक चेतना के साथ भारतवर्ष को विदेशी दासता से मुक्त कराने के महान लक्ष्य के प्रतीक थे।

Topics: पेशवा बाजीराव प्रथम के युद्धदिल्ली पर मराठा आक्रमणवसई का युद्धभोपाल का युद्धचिमाजी अप्पामराठा साम्राज्यपेशवा बाजीराव प्रथमपाञ्चजन्य विशेषहिंदवी स्वराजबाजीराव प्रथम
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ओडिशा की उड़ान 2.0 : ‘हमारा लक्ष्य सुशासन और विकास’

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी से पाञ्चजन्य की सलाहकार संपादक तृप्ति श्रीवास्तव ने बातचीत की।

ओडिशा की उड़ान 2.0 : ‘वंदे मातरम्’ पर भारतवासियों को गर्व 

ओडिशा की उड़ान 2.0’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी से बातचीत करते पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर

सुशासन संवाद : ओडिशा की उड़ान 2.0 : ‘अमेरिका में संघ को विरोध से अधिक समर्थन मिला’

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‘धर्म देखकर हत्या स्वीकार्य नहीं’ : ब्रिक्स में भारत की कूटनीतिक जीत: दिल्ली डिक्लेरेशन में पहलगाम हमले की निंदा

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में दिल्ली घोषणापत्र जारी : UNSC सुधार, स्थानीय मुद्रा और आतंकवाद पर कड़ा प्रहार

ब्रिक्स समूह के सदस्यों ने साफ कहा कि आतंकवाद बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

पाकिस्तान को कड़ा संदेश : ब्रिक्स देशों ने पहलगाम हमले की कड़ी निंदा की, कहा- आतंकवाद बर्दाश्त नहीं

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान पौधरोपण करते ब्रिक्स समूह के सदस्य।

नई दिल्ली घोषणापत्र पर मुहर: ब्रिक्स नेताओं ने खिंचवाई ‘फैमिली फोटो’, फिर एक खास पौधे से दिया दुनिया को बड़ा संदेश

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (बाएं)।

प्रधानमंत्री मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक, सीमा सहित कई मुद्दों पर हुई बात

kisan sangh free uniforms notebooks and bags distributed to 7000 flood affected students

असम: शिवसागर में भारतीय किसान संघ की मानवीय पहल, बाढ़ प्रभावित 7,000 छात्रों को दी जा रही नि:शुल्क सहायता!

dr manmohan vaidya addresses-shikshak and taruni samvad in kashi bhu

विविधता का उत्सव मनाना ही भारतीय संस्कृति है: काशी में बोले मनमोहन वैद्य जी- भारत रूपी बगीचे के हम माली नहीं, पौधे हैं

gorakhpur rss centenary youth conference suryakund-prant pracharak ramesh address

“शाखा गंगा की तरह पवित्र और व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है”: गोरखपुर में RSS शताब्दी वर्ष पर भव्य युवा सम्मेलन

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

BRICS Summit: PM मोदी का वैश्विक सुधारों पर जोर, कहा- विशेषाधिकार के पिरामिड को साझेदारी में बदलना होगा

मोदी जी ने तप-साधना और संघर्ष से बनाई पहचान : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

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