35 साल बाद सरला भट्ट हत्याकांड की फिर जांच: कश्मीरी पंडितों के दर्द और पलायन की दास्तां
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35 साल बाद सरला भट्ट हत्याकांड की फिर जांच: कश्मीरी पंडितों के दर्द और पलायन की दास्तां

35 साल बाद सरला भट्ट हत्याकांड की जांच फिर से शुरू। कश्मीरी पंडित नर्स की बर्बर हत्या और पलायन की दर्दनाक कहानी। जम्मू-कश्मीर पुलिस की SIA ने JKLF से जुड़े ठिकानों पर छापेमारी की। जानें इस जघन्य अपराध की पूरी कहानी।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Aug 13, 2025, 05:35 pm IST
in विश्लेषण, जम्‍मू एवं कश्‍मीर
Sarla Bhat Killing case

यासीन मलिक (बाएं) जिसने सरला भट्ट (दाएं) की हत्या की

कश्मीरी पंडितों को लेकर एक बार फिर से हलचल है। कश्मीरी पंडित सरला भट्ट, जिनकी उम्र मात्र 27 वर्ष की थी, उन्हें आतंकियों ने हॉस्टल से अपहृत करके, सामूहिक बलात्कार के बाद मार डाला था। यदि आप यह सोचते हैं कि यह घटना हाल फिलहाल की है, तो यह बात भूल जाएं क्योंकि यह बात आज से लगभग 35 वर्ष पहले की है। इस घटना के आरोपी तब से लेकर अब तक क्या कर रहे थे, इस पर क्या कहा जाए यह समझ नहीं आता।

सरला भट्ट हत्याकांड में छापेमारी

सरला भट्ट हत्याकांड को लेकर जम्मू कश्मीर पुलिस की स्टेट इंवेस्टिगेशन एजेंसी ने मंगलवार को कई स्थानों पर छापेमारी की।आज की एक बहुत बड़ी पीढ़ी इस बात को समझ ही नहीं सकती है कि आखिर सरला भट्ट के साथ हुआ क्या था? और अब इतने वर्षों के बाद सरला भट्ट पर बात क्यों करना?

कौन थी सरला भट्ट?

प्रश्न यह उठता है कि सरला भट्ट कौन थीं? सरला भट्ट दरअसल, उस समुदाय की भूली बिसरी कहानी का हिस्सा हैं, जिनके विषय में अब लगभग बात ही होना बंद हो गई है या कहें ऐसा विमर्श सामने आ गया है कि उस समुदाय के साथ कुछ हुआ ही नहीं था या फिर जो हुआ था, उसमें उन्हीं का हाथ था। बात सरला भट्ट की। 19 अप्रैल को श्रीनगर में एक युवती की क्षतविक्षत लाश मिलती है। उसके पूरे शरीर पर गोलियों के निशान थे, उसके शरीर से खून रिस रहा था और जख्म क्रूर यातना का प्रमाण दे रहे थे। उस लाश की पहचान क्या थी? उस लाश के पास हाथ से लिखा हुआ एक नोट मिला था, जिससे यह साबित किया जा रहा था कि वह दरअसल पुलिस की मुखबिर थीं।

झेलना पड़ा पलायन

सरला भट्ट उस समुदाय का एक चेहरा थीं, जिन्हें स्वतंत्रता के बाद सबसे पहले अपनी ही भूमि से पलायन झेलना पड़ा था। जिनकी धार्मिक पहचान ही उनकी मातृभूमि पर उनकी शत्रु बन गई थी। उन्हें उन लोगों द्वारा मुखबिर होने का तमगा मिला था, जो एक ही भूमि के तो थे, परंतु उनकी मजहबी पहचान थी। उनकी पहचान ऋषि कश्यप के कश्मीर से नहीं थी, बल्कि आतताइयों के बाद विकसित हुई पहचान से थी, जिसने एक ही रूपरंग के लोगों में ऐसा विभाजन कर दिया था कि सरला भट्ट को वे मुखबिर कहने में भी नहीं हिचकिचाए।

इसे भी पढ़ें: विभाजन-विभीषिका : रास्ते में कई बार मुसलमानों ने गाड़ी को रोका…गोरखा सैनिकों ने बचाई जान

कश्मीरी पंडितों के पलायन की गाथा

और जब उन्होंने मुखबिर मान ही लिया था, तो सजा भी सुनानी थी और सजा देनी भी थी। वह समय कश्मीर में आतंक के चरम का समय था, जब कश्मीरी पंडितों का शायद अंतिम पलायन होना था और उसके बाद जमीन पर कब्जा करके उसकी पहचान को बदलना था। सरला भट्ट का दिल अपने लोगों की सेवा में रमा हुआ था। उन्होंने अपने लोगों की सेवा करने के लिए नर्स की नौकरी चुनी। मगर उनके धर्म वाले लोगों को मजहबी आतंकियों ने फरमान सुना दिया था कि वे घाटी छोड़कर चले जाएं।

रालिव-गालिव-चालिव का नारा मजहबी नारा

देखते ही देखते नारा गूंजने लगा था कि “रालिव, गालिव या चालिव अर्थात या तो धर्मपरिवर्तन करें, भाग जाओ या फिर मरने के लिए तैयार रहो!” सरला भट्ट ने सेवा का काम नहीं छोड़ा, मगर उनका घाटी में बने रहना मजहबी आतंकियों को रास नहीं आया। वे जिस अस्पताल में काम करती थीं, उसी अस्पताल में अब्दुल अहद गुरु और जेकेएलएफ के डिप्टी कमांडर हामिद शेख सक्रिय थे और उन्हें यह संदेह था कि सरला भट्ट मुखबिर हैं।

अब जब आतंक फैलाने वालों ने सोच ही लिया तो फिर फैसला करना ही था और फैसला हुआ सरला भट्ट की हत्या का। 14 अप्रेल 1990 को जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकियों ने सरला भट्ट को उनके अस्पताल से अगवा कर लिया और फिर उन्हें अनजान स्थान पर ले गए। वहाँ पर उन्हें मुखबिर होने की सजा सुनाते हुए उनके साथ चार दिनों तक सामूहिक रूप से बलात्कार किया और फिर अंत में उनकी बहुत ही बेरहमी से हत्या कर दी।

इधर इनके परिजन परेशान होते रहे, बच्ची को खोजते रहे, मगर बच्ची नहीं, मिले तो बच्ची के निर्जीव टुकड़े। अभागे परिजनों ने जब अंतिम संस्कार का निर्णय लिया तो अंतिम संस्कार के लिए ले जाते समय उनके परिजनों पर भी हमला किया गया। और सजा इससे भी अधिक देनी थी, तो फिर अंत में उनके घर को भी आग के हवाले कर दिया।

और इसी आग में जल गया वह सपना जो सरला भट्ट के परिजन देखते थे और वह सपना कुछ अधिक नहीं रहा होगा, बस इतना सा सपना था कि वे अपने ही घर में, अपनी भूमि पर रहें। मगर उन्हें अपना सपना, अपना घर सब छोड़कर आना पड़ा और इतने वर्षों तक सरला भट्ट की कहानी भी न्याय के लिए भटक रही है। अब 12 अगस्त को लगभग 35 साल बाद इस हत्या के संबंध में  प्रतिबंधित जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) से जुड़े कई लोगों के घरों पर छापेमारी की गई।

सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यही है कि इस देश में सरला भट्ट या गिरिजा टिक्कू जैसी महिलाओं के लिए आज तक यह नारा भी नहीं लगा कि

“सरला और गिरिजा हम शर्मिंदा हैं,

तुम्हारे कातिल अभी तक जिंदा है!”

परंतु उससे भी बड़ा प्रश्न यही है कि क्या इनकी हत्याओं को अपराध भी माना गया था या नहीं? क्या यह भी स्वीकारा गया कि इनकी हत्याओं के पीछे कारण क्या था? क्यों गिरिजा को जिंदा ही आरे से काट दिया गया था?

Topics: #kashmirकश्मीरterrorismआतंकसरला भट्ट हत्याकांडकश्मीरी पंडित पलायनSarla Bhatt murder caseKashmiri Pandit exodus
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