India Pakistan Partition : भारत के बंटवारे के समय मैं नौ वर्ष का था। मेरा परिवार लाहौर के मुदके गांव से संबंध रखता था। मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा था। विभाजन के समय मेरा बड़ा परिवार लाहौर के भगवानपुरा इलाके में रहता था।
हालात बेकाबू होने लगे तो पिताजी पंडित दूनी चंद सभी को साथ लेकर भारत के लिए चल पड़े। यह निर्णय अत्यंत पीड़ादायक था, क्योंकि उस समय मेरे पिताजी लाहौर के संपन्न और प्रतिष्ठित नागरिकों में गिने जाते थे। उनके पास ‘वैड़ी बस सर्विस’ नाम से ट्रांसपोर्ट कंपनी थी। पंजाबी में गाय की बछिया को ‘वैड़ी’ कहा जाता है।
उस दौर में मेरे पिताजी के पास दो बसें, चार ट्रक और एक कार थी। परिवार के पास तीन बड़ी हवेलियां थीं, ढेर सारी जमीन-जायदाद थी, इन सबका त्याग करके मेरे पिताजी परिवार के सभी 52 सदस्यों को लेकर निकल पड़े। उस दिन मंगलवार था और पिताजी का उपवास था। वे ठाकुर जी और हनुमान जी की मूर्तियों को एक पीतल की बाल्टी में रखकर चले थे। जब वे लाहौर रेलवे स्टेशन पहुंचे, तो मुस्लिमों की उग्र भीड़ उनके पीछे-पीछे स्टेशन तक आ पहुंची।
भीड़ को देखकर पिताजी ने ईश्वर के सामने हाथ जोड़कर कहा था, ”हे प्रभु, आज मेरा उपवास है, मैं गाय की पूजा करता हूं, लेकिन यदि आज अपने परिवार की रक्षा के लिए मुझे गाय का मांस भी खाना पड़े, तो मैं खा लूंगा। इसके लिए मैं आपसे पहले ही क्षमा मांग लेता हूं।” लेकिन तभी एक चमत्कारिक घटना घटी। एक साढ़े छह फुट लंबा पुलिस अफसर वहां प्रकट हुआ। वह अकेला आया था, लेकिन उसका तेज और वर्दी देखकर भीड़ सहम गई और वहीं रुक गई।
उस अफसर ने अपने दो जवानों को बुलाया और आदेश दिया कि इस परिवार को सुरक्षित अमृतसर पहुंचाया जाए। वे पुलिस अफसर और जवान फिर कभी नहीं दिखे। हम लोगों को विश्वास है कि वे ठाकुर जी और हनुमान जी ही थे, जिन्होंने पुलिस की वर्दी में आकर हमारी रक्षा की और हमें सुरक्षित भारत की सीमा तक पहुंचाया। हम लोग अमृतसर पहुंचे और वहां लगभग दो महीने शरणार्थी शिविर में रहे।
चूंकि हमारे ट्रक पहले से ही लाहौर से अमृतसर तक आया करते थे इसलिए लाहौर के हमारे कुछ शार्गिदों ने तीन ट्रक चुपचाप अमृतसर भेज दिए थे। ट्रक मिलने से हमें नया सहारा मिला। दो महीने के बाद मेरा परिवार जालंधर आ गया और वहां भी ट्रकों से कचरा ढोने का काम जारी रहा। फिर पिताजी ने लुधियाना में अपना काम शुरू किया और परिवार की स्थिति सुधरी।


















