दुनियाभर में हाथियों के संरक्षण, उनके आवासों की सुरक्षा तथा उनके अस्तित्व को बचाने के लिए वैश्विक जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से 12 अगस्त को ‘विश्व हाथी दिवस’ मनाया जाता है। यह दिन केवल एक औपचारिक अवसर नहीं है बल्कि मानव जाति के समक्ष खड़ी एक गंभीर चुनौती की याद दिलाता है कि हम पृथ्वी के सबसे विशाल स्थलचरीय जीव को किस प्रकार विनाश की ओर धकेल रहे हैं। हाथी केवल शान-शौकत, शक्ति, धैर्य और संस्कृति का प्रतीक ही नहीं, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गजराज केवल वन्यजीव नहीं बल्कि पारिस्थितिकी के ‘कीस्टोन स्पीशीज’ हैं, जो जंगलों में बीज फैलाने, वनस्पतियों के पुनर्जनन और जल स्रोतों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अफ्रीका में हाथियों को ‘जंगल का माली’ कहा जाता है क्योंकि वे पेड़ों की छंटाई और खुले घास के मैदान बनाने में मदद करते हैं, जिससे अन्य प्रजातियों को भी लाभ मिलता है। भारत में हाथी गंगा, ब्रह्मपुत्र और कावेरी जैसी नदियों के किनारे के पारिस्थितिक तंत्र को स्थिर बनाए रखते हैं।
हाथी दांत के लिए अवैध शिकार
हालांकि अफ्रीकी हाथी और एशियाई हाथी, दोनों ही प्रजातियां आज शिकार, अवैध हाथी दांत व्यापार, आवास विनाश, मानव-हाथी संघर्ष और जलवायु परिवर्तन जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रही हैं। ‘इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर’ (आयूसीएन) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार अफ्रीकी वन हाथी को गंभीर रूप से संकटग्रस्त और अफ्रीकी सवाना हाथी को संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है जबकि एशियाई हाथी पहले से ही संकटग्रस्त प्रजाति की सूची में शामिल हैं। अफ्रीकी सवाना हाथियों की संख्या पिछले एक सदी में 50 लाख से घटकर लगभग 4,15,000 रह गई है जबकि अफ्रीकी वन हाथियों की संख्या महज 93,000 के आसपास है। एशियाई हाथियों की आबादी लगभग 48,000 से 52,000 के बीच अनुमानित है। भारत, जो एशियाई हाथियों का सबसे बड़ा आवास है, में हाथियों की संख्या लगभग 30 हजार अनुमानित है, जो कुल वैश्विक आबादी का करीब 60 प्रतिशत है। हालांकि पिछले तीन दशकों में भारत में भी हाथियों की संख्या में लगभग 30 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है।
हाथियों का संरक्षण जरूरी
हाथियों का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं बल्कि संपूर्ण प्रकृति और जैव विविधता को बचाने का मार्ग है। हाथी वनों में बीज फैलाकर और जंगल के स्वास्थ्य को बनाए रखकर पारिस्थितिकी तंत्र के इंजीनियर के रूप में कार्य करते हैं। उनके द्वारा बनाए गए रास्ते न केवल अन्य जानवरों के लिए मार्ग बनाते हैं बल्कि वर्षा के पानी को धरती में समाने का अवसर भी देते हैं। जब हाथी समाप्त होंगे तो उनके साथ कई अन्य प्रजातियां और पारिस्थितिक संतुलन भी खतरे में पड़ जाएंगे। दुर्भाग्य से, आज अवैध शिकार सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। हाथी दांत की मांग अब भी कई देशों में बनी हुई है। इंटरपोल तथा वाइल्डलाइफ क्राइम इंटरनेशनल की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि पिछले दस वर्षों में हर साल औसतन 20,000 अफ्रीकी हाथियों को हाथी दांत के लिए मारा गया। एशियाई हाथियों के मामले में शिकार के अलावा, उनकी खाल, बाल और अन्य अंगों का भी अवैध व्यापार बढ़ा है।
बढ़ रहा मानव हाथी संघर्ष
भारत में भी स्थिति जटिल है, यहां मानव-हाथी संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है। वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के अनुसार 2010 से 2024 के बीच लगभग 1,500 हाथियों और 6,000 से अधिक मनुष्यों की मौत इस संघर्ष में हुई है। भारत में पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, हर साल औसतन 500 लोग और करीब 100 हाथी इस संघर्ष में मारे जाते हैं। बढ़ते शहरीकरण, सड़क और रेलवे परियोजनाओं के कारण हाथियों के पारंपरिक मार्ग (कॉरिडोर) सिकुड़ते जा रहे हैं। हाथियों को भोजन और पानी की तलाश में खेतों और गांवों में आना पड़ता है, जिससे टकराव की घटनाएं बढ़ती हैं। वन्यजीव संस्थानों का मानना है कि हाथियों के सुरक्षित मार्गों को कानूनी मान्यता देना और उनके आवासों को अतिक्रमण से बचाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
भारत सरकार का प्रोजेक्ट एलिफेंट
भारत सरकार ने ‘प्रोजेक्ट एलिफेंट’ के तहत संरक्षण के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं और हाल में एशियन एलिफेंट एलायंस जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रयास भी सामने आए हैं लेकिन इनकी सफलता के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी अनिवार्य है। हाथियों की हालत और सुधार के लिए भारत सरकार ने 1992 में ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ शुरू किया, जिसके तहत कानून प्रबल किए गए, हाथी रिजर्व और कॉरिडोर चिह्नित किए गए, सार्वजनिक जागरूकता, आनुवंशिक प्रोफाइलिंग, संरक्षण केंद्र, एंड्रॉइड फेंसिंग, इलैक्ट्रिक फेंसिंग, जीपीएस कॉलर और ड्रोन जैसी तकनीकों का उपयोग हुआ। देशभर में 33 हाथी रिजर्व अधिसूचित हैं, जो 77,705 वर्ग किलोमीटर में फैले हैं। ‘गज यात्रा’, ‘गज सुरक्षा ऐप’, ‘एशियन एलिफेंट एलायंस’ जैसे राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय अभियानों से भी हाथी संरक्षण को गति मिली है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इन योजनाओं के सफल होने के लिए स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी और नुकसान की भरपाई सिस्टम की पारदर्शिता बहुत जरूरी है। असम, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल में कई गांवों ने हाथियों के लिए सुरक्षित गलियारे बनाए हैं और फसल क्षति की भरपाई की व्यवस्था अपनाई है।
कैद कर लिए गए जंगल के माली
हाथी दुनियाभर में पर्यटन से भी जुड़ी आर्थिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लेकिन कई बार यही पर्यटन उनके लिए अभिशाप बन जाता है। कुछ देशों में हाथियों को पर्यटकों के मनोरंजन के लिए कैद में रखा जाता है, जहां उन्हें कठोर प्रशिक्षण और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। विश्व पशु संरक्षण संगठन की रिपोर्ट बताती है कि एशिया में 3,000 से अधिक हाथी ऐसे कैंपों में हैं, जहां उनकी देखभाल के नाम पर उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने इस दिशा में भी कड़े कदम उठाने की मांग की है ताकि जिम्मेदार और नैतिक पर्यटन को बढ़ावा मिले और हाथियों की भलाई सुनिश्चित हो।
जलवायु परिवर्तन का हाथियों पर प्रभाव
जलवायु परिवर्तन भी हाथियों के लिए एक उभरता खतरा बन रहा है। सूखा, असामान्य वर्षा और तापमान में बदलाव के कारण जंगलों में पानी के स्रोत सूख रहे हैं और वनस्पतियों की विविधता घट रही है। अफ्रीका में लंबे सूखे के कारण 2023-24 में हजारों हाथियों की मौत हो गई जबकि एशिया में बाढ़ और चक्रवात जैसी आपदाओं से उनके आवास नष्ट हुए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि होती है तो हाथियों के लिए उपयुक्त आवास का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अगले 50 वर्षों में समाप्त हो सकता है। कई अंतर्राष्ट्रीय संधियां और संगठन हाथियों के संरक्षण के लिए कार्यरत हैं। ‘कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन एंडेंजर्ड स्पीशीज ऑफ वाइल्ड फौना एंड फ्लोरा’ (साइट्स) ने हाथी दांत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिबंध लगाया है लेकिन अवैध तस्करी अब भी जारी है। 2024 में जब्त किए गए हाथी दांत का कुल वजन 75 टन से अधिक था, जो इस बात का प्रमाण है कि यह व्यापार कितना संगठित और खतरनाक है। इसी तरह, ‘अफ्रीकन एलिफेंट एक्शन प्लान’ और ‘एशियन एलिफेंट रेंज स्टेट्स मीटिंग’ जैसे प्रयास भी हाथियों के भविष्य को बचाने की दिशा में अहम हैं।
कई देश हाथियों का कर रहे संरक्षण
स्थानीय स्तर पर, केन्या, बोत्सवाना, तंजानिया और नामीबिया जैसे देशों ने संरक्षण के सफल मॉडल पेश किए हैं। केन्या में ‘कम्युनिटी कंजरवेंसी’ मॉडल ने न केवल हाथियों की संख्या बढ़ाई है बल्कि स्थानीय लोगों के लिए आजीविका के साधन भी पैदा किए हैं। भारत में भी असम, कर्नाटक और केरल में सामुदायिक भागीदारी वाले संरक्षण मॉडल सामने आए हैं, जहां गांवों ने हाथियों के लिए सुरक्षित गलियारे बनाए और फसल के नुकसान की भरपाई की व्यवस्था की। ऐसे उदाहरण यह साबित करते हैं कि यदि इच्छाशक्ति और जनसहयोग हो तो हाथियों को बचाना संभव है। हाथियों के संरक्षण में तकनीक का उपयोग भी बढ़ा है। जीपीएस कॉलर, ड्रोन सर्विलांस, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी और सैटेलाइट इमेजरी जैसी तकनीकों का उपयोग हाथियों की आवाजाही ट्रैक करने और शिकार रोकने में किया जा रहा है। अफ्रीका में शुरू किया गया ‘स्मार्ट एलिफेंट मॉनिटरिंग प्रोग्राम’ और भारत में ‘गज यात्रा’ जैसे अभियान तकनीक और जनभागीदारी का बेहतरीन मिश्रण हैं।
क्यों जरूरी है वन्यजीवों की सुरक्षा
हाथियों का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। भारत में गणेशजी की पूजा से लेकर अफ्रीका में हाथियों को शक्ति और ज्ञान के प्रतीक के रूप में मान्यता देने तक, यह जीव मानव सभ्यता की स्मृतियों में बसा हुआ है लेकिन यदि हमने इन्हें बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए तो यह केवल हमारी कहानियों और प्रतिमाओं में ही रह जाएंगे। यह केवल वन्यजीव संरक्षण का मामला नहीं बल्कि हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है। जिस गति से हम उनके आवास नष्ट कर रहे हैं, उनके जीवन पर खतरे बढ़ा रहे हैं, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक गहरी चेतावनी है। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, कठोर कानून, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, तकनीकी नवाचार और सबसे महत्वपूर्ण, मानव संवेदना, ये सभी मिलकर ही हाथियों के भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं। यह केवल एक प्रजाति को बचाने की लड़ाई नहीं बल्कि पृथ्वी की जैव विविधता और प्राकृतिक विरासत को बचाने का संघर्ष है।
क्या कहते हैं हाथियों के आंकड़े
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
विशेषज्ञों का मानना है कि हाथियों के बिना कई वन पारिस्थितिक तंत्र ढ़ह जाएंगे, जिससे जलवायु संकट और गहरा सकता है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाले दशकों में भी हाथियों की गर्जना और उनके झुंडों की शान हमारे जंगलों में जीवित रहे तो हमें आज ही उनके संरक्षण के लिए अपनी प्राथमिकताओं को बदलना होगा। हमें समझना होगा कि हाथियों का अस्तित्व हमारे अपने अस्तित्व से जुड़ा है और जब हम उन्हें बचाते हैं, तब हम वास्तव में अपने भविष्य को बचा रहे होते हैं। हम प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलें तो न केवल हाथी बल्कि पूरी धरती सुरक्षित रह सकती है।


















