छद्म सेक्युलरों का मुगल प्रेम: भारत की समृद्ध विरासत पर हमला
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छद्म सेक्युलरों का मुगल प्रेम: भारत की समृद्ध विरासत पर हमला

मुगलों के नाम पर भारत की पहचान को कमजोर करने की कोशिशों का विश्लेषण। पढ़ें कैसे भारतीय व्यंजनों और संस्कृति को मुगलई बताने का षड्यंत्र चल रहा है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Aug 11, 2025, 09:53 pm IST
inविश्लेषण
Pseudo Secular mughal attraction

प्रतीकात्मक तस्वीर

जैसे ही एनसीईआरटी की पुस्तकों में अकबर आदि को लेकर कुछ कि भारत मुगलों को नकारकर अपनी जड़ों को समाप्त कर रहा है। यह बात ही स्वयं में हैरान करने वाली है कि मजहबी सत्ता के विस्तार के लिए हिंदुओं की ही नहीं बल्कि मुस्लिमों की हत्या करने वाले मुगलों को भारत की परिवर्तन हुए हैं, वैसे ही कथित सेक्युलर्स लोगों का मुगल प्रेम उमड़ रहा है। कथित विदेशी लेखक भी यह लिख रहे हैं पहचान कैसे बता दिया जाता है। जिन मुस्लिमों ने भारत की पहचान को स्वीकारा, भारत उनका आदर करता है।

यह भारत ही है जो कबीर और रहीम और रसखान का आदर करता है। भारत का हिन्दू ही है जो मुगल राजकुमार दाराशिकोह को याद करता हैं। फिर ऐसे में किस पहचान की बात कथित सेक्युलर लेखक करते हैं कि मुगलों की पहचान को नकारकर भारत अपनी पहचान नकार रहा है। भारत ने तो मुगलों की एक भी पहचान नहीं नकारी है। मुगल आक्रांता औरंगजेब द्वारा तोड़े गए मंदिर आज भी उसे स्थिति में है।

छद्म सेक्युलरों का मुगल प्रेम

वह कौन सी पहचान है, जिसे बनाए रखने की बात लगातार ये सेक्युलर्स करते हैं? मुगलों के साथ ही भारत के इतिहास को आरंभ करने की बात करने वाले लोग भारत के समृद्ध इतिहास को नकारते हैं। यदि भारत में कुछ नहीं था तो भारत में लोग आक्रमण किसलिए करने आए थे? भारत की समृद्धि की कहानियाँ ही विदेशियों को आकर्षित करती थीं। भारत की समृद्धि की कहानी तो इंडिका में भी लिखी है कि कैसे भारत के लोग समृद्ध थे और शासन ऐसा था कि लोग घरों में ताला लगाने तक का कष्ट नहीं करते थे। भारत के पास भौतिक समृद्धि से लेकर सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि थी, जिसे जानने के लिए भारत में सुदूर क्षेत्रों से लोग आते थे।

मुहम्मद गोरी के गुलाम कुतुबउद्दीन ऐबक के आने के बाद भारत की इस भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि पर जो हमले आरंभ हुए वे अभी तक चल रहे हैं। वे अनवरत हैं। भारत को गुलाम बनाने का सपना जिस गुलाम वंश ने देखा था, उसने लगातार भारत की धार्मिक पहचान पर अतिक्रमण करने का प्रयास किया। कुतुबमीनार के पास बनी मस्जिद के लिए 27 हिन्दू और जैन मंदिर तोड़ डाले गए, तो क्या इस पर ये लोग चाहते हैं कि बात ही न की जाए? महज तीन या चार साल तक शासन करने वाले ये लोग क्या इतनी भव्य इमारतें बनवा सकते थे? कुतुबउद्दीन ऐबक के नाम पर यह कहा जाता है कि मात्र ढाई दिनों में अजमेर में मस्जिद बना दी गई और इसे नाम दिया गया अढ़ाई दिन का झोंपड़ा। मगर क्या इतनी विशाल मस्जिद मात्र ढाई दिनों में बन सकती है? नहीं!

संस्कृत महाविद्यालय को तोड़कर बना दिया अढ़ाई दिन का झोपड़ा मस्जिद

दरअसल, वहाँ पर एक संस्कृत महाविद्यालय था, जिसे कुतुबउद्दीन ऐबक ने तोड़कर मस्जिद के रूप में बदल दिया था। और तोड़कर मस्जिद का रूप देने में ढाई दिन का समय लगा था, इसलिए इसे अढ़ाई दिन का झोपड़ा कहा जाता है। गोरी के गुलाम ने जहां अजमेर में संस्कृत महाविद्यालय तोड़कर अढ़ाई दिन का झोंपड़ा मस्जिद बनाई थी तो वहीं उसके वजीर बख्तियार खिलजी ने तो नालंदा विश्वविद्यालय को ही जला दिया था। जिसमें भारत का प्राचीन ज्ञान था। कथित सेक्युलर्स यह चाहते हैं कि इन तमाम आग पर बात ही न हो।

बात मुगलों की

अब बात मुगलों की! ऐसा ये लोग कहते हैं कि भारत में भोजन आदि का इतिहास नहीं था, जो भी था वह मुगल लेकर आए। यह बात सत्य है कि जो व्यक्ति जिस स्वाद का आदी होता है, वह अपने स्वाद को लेकर ही आता है। परंतु भारत में जो भी व्यंजन कथित रूप से मुगलों के हवाले कर दिए जाते हैं, उनका स्वाद कहीं बाहर का है ही नहीं। जो लोग तमाम भारतीय व्यंजनों को मुगलों की देन बताते हैं, वे राजा नल द्वारा रचित पाकदर्पणम भूल जाते हैं। वे महर्षि चरक के उस उपदेश को भूल जाते हैं, जिसमें उन्होंने आहार को ही स्वास्थ्य का सबसे बड़ा कारण बताया था।

बाबर को भारत में रहने का अवसर नहीं मिला, हुमायूँ इतना अय्याश था कि उसे शेरशाह सूरी ने भगा दिया। अकबर के शासनकाल को अवश्य कुछ स्थायित्व का समय कहा जा सकता है क्योंकि उसने युद्ध के साथ-साथ संधि की भी नीति अपनाई। जो भी व्यंजन उसकी रसोई में बनते थे, वे यहीं के थे। वे कहीं बाहर के नहीं थे। जहाँगीर का शासनकाल अपने बेटों के विद्रोह को दबाने में और अपनी अय्याशी में ही लगा रहा। शाहजहाँ, जिसके काल को अभी कुछ समय पहले तक भारत का स्वर्णयुग बताया जाता रहा था, उसकी धार्मिक नीति पर भी प्रश्न उठे और साथ ही उसका समय भी आंतरिक विद्रोहों को दबाने में ही लगा रहा।

औरंगजेब की क्रूरता की गवाही देते काशी-मथुरा

औरंगजेब के शासनकाल के विषय में तो इतना लिखा जा चुका है कि अब शायद लिखने की आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि उसके शासनकाल की क्रूरता तो मथुरा और काशी में दिखती ही है। हिन्दू मंदिरों के विध्वंस के बाद मस्जिद बनाना, हिन्दू नगरों का नाम बदलकर उनकी पहचान मिटाना जिनकी आदत और फितरत रही, क्या वे कुछ नया बना सकते थे?

भारत की विशाल विरासत को नीचा दिखाने की साजिश

दरअसल भारत के इतिहास को नीचा दिखाने वाला एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है, जो भारत की विशाल विरासत और वृहद इतिहास को नकारना चाहता है और वह स्वयं को श्रेष्ठ बताना चाहता है, इसलिए वह भारत की पहचान को मुगलों से जोड़कर दिखाता है। वह राजा नल के पाकदर्पणम को नहीं पढ़ता है और न ही भारतीय ग्रंथों को, जिनमें व्यंजनों की परंपरा रही है। पानीपूरी जैसे व्यंजनों का इतिहास महाभारत से जुड़ा है, जो आज भी स्वाद लेकर खाया जाता है और खाया ही नहीं जाता है बल्कि यह भारत की पहचान है। पाकदर्पणम में मिट्टी के पात्र में दही जमाने का वर्णन है, जिसे आज तक भारतीय घरों में किया जाता है।

महाभारत में सशकुली का उल्लेख आता है। यह आधुनिक जलेबी की पूर्वज मिठाई कही जाती है और इसका उल्लेख रामायण एवं महाभारत में भी है। भारत की तमाम उपलब्धियों को मुगलों तक सीमित करने का सेक्युलर षड्यन्त्र बहुत पुराना है और यह आज तक जारी है, यह निरंतर चल रहा है। वे किसी भी व्यंजन को मुगलों का बता दें, तो उसे महानता कहा जाता है और यदि उसी व्यंजन का भारतीय इतिहास बताया जाए तो हम सांप्रदायिक ठहरा दिए जाते हैं।

परंतु जब कोई भारतीय व्यंजनों को मुगलई तक सीमित करेगा तो मुगलई व्यंजनों की जड़ें तो खोजी ही जाएंगी न? यदि कोई अढ़ाई दिन के झोंपड़े की आधी कहानी बताएगा तो अढ़ाई दिन के झोंपड़े की असली पहचान तो बताई ही जाएगी। और यही अब किया जा रहा है। हर प्रकार के एजेंडे को जब नकारकर असली पहचान की बात की जा रही है तो समस्या क्या है?

(डिस्क्लेमर: ये लेखिका के स्वयं के विचार हैं। आवश्यक नहीं कि पाञ्चजन्य उनसे सहमत हो)

Topics: ऐतिहासिक सत्यMughal lovePseudo secularHistorical truthIndian HeritageCultural Identityसांस्कृतिक पहचानभारतीय विरासतमुगल प्रेमछद्म सेक्युलर
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