India-Pakistan Partition: 1947 में भारत का विभाजन मात्र एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह हजारों वर्षों से चली आ रही सांस्कृतिक एकता, आध्यात्मिक चेतना और ऐतिहासिक निरंतरता पर पड़ा गहरा घाव था। यह वह विभाजन था, जिसने सिंधु की ऋग्वैदिक वाणी, लाहौर की साहित्यिक चेतना, ढाका के भक्ति आंदोलन और तक्षशिला की ज्ञान परंपरा को भारत से अलग कर दिया। पांथिक सहिष्णुता, तीर्थ यात्रा, साझा त्योहारों और आध्यात्मिक चिंतन पर आधारित ‘भारत’ की जो सांस्कृतिक पहचान थी, वह विभाजन के साथ छिन्न-भिन्न और खंडित हो गई।
यह विडंबना ही रही कि स्वामी विवेकानंद और के.एम. मुंशी जैसे आध्यात्मिक-सांस्कृतिक चिंतकों द्वारा प्रतिपादित राष्ट्र की चेतना व संकल्पना को किनारे कर विभाजन को राजनीतिक समझौते की तरह स्वीकार कर लिया गया। इस ऐतिहासिक भूल से न केवल तीर्थ और ज्ञान केंद्र खोए, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को भी गहरा आघात पहुंचा। वीर सावरकर और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे द्रष्टाओं की चेतावनियों को अनदेखा कर सत्ता-लाभ के लिए मजहबी पृथकतावाद को प्रश्रय दिया गया।
विभाजन की त्रासदी मात्र सीमाओं का पुनर्निर्धारण नहीं थी, यह एक वैचारिक युद्ध की परिणति थी जिसमें भारतीय राष्ट्रभाव को तुष्टीकरण और राजनीतिक अदूरदर्शिता ने पराजित कर दिया। पाकिस्तान का निर्माण द्विराष्ट्र सिद्धांत पर हुआ, जिसमें मुस्लिम पहचान को हिंदू संस्कृति से अलग प्रस्तुत किया गया। कांग्रेस नेतृत्व ने इसकी वैचारिक काट प्रस्तुत करने के बजाय समझौतावादी रुख अपनाया। गांधीजी का मौन, नेहरू की अधीरता और पटेल की चेतावनियों की अनदेखी इस त्रासदी को और अधिक गहरा बनाती है।
1946 के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ से लेकर 1947 की नोआखाली हिंसा तक, यह स्पष्ट था कि पाकिस्तान की मांग केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मजहबी वर्चस्व की योजना थी। इसके बावजूद माउंटबेटन योजना को जनता की राय के बिना, संविधान सभा में गहन विमर्श के अभाव में, जल्दबाज़ी में स्वीकार कर लिया गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद और डॉ. लोहिया जैसे राष्ट्रनायकों ने इसे नैतिक पराजय बताया।
विभाजन के बाद भारत को लगातार कट्टरपंथ, आतंकवाद और रणनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ा। 1947 से लेकर कारगिल (1999), 26/11 और पुलवामा तक, पाकिस्तान ने भारत को एक ‘स्थायी शत्रु’ की तरह देखा। कश्मीर, खालिस्तान और आतंकवाद की लहरों ने भारत की सुरक्षा और अखंडता को बार-बार चुनौती दी। इन सबके पीछे विभाजन की अस्वीकार की गई वास्तविकता और उससे उपजा कट्टरपंथ प्रमुख कारण रहा। किंतु भारत ने इन तमाम संकटों के बीच अपनी राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखा। अनुच्छेद-370 की समाप्ति, आतंकवाद के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस नीति’, सर्जिकल और एयर स्ट्राइक्स जैसे साहसिक कदम इस बात के प्रतीक हैं कि भारत अब न केवल अपने भीतर दृढ़ है, बल्कि वैश्विक मंच पर भी स्पष्ट नीति और आत्मविश्वास के साथ खड़ा है।
भविष्य का आश्वस्त भारत
आज का भारत केवल विभाजन की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य के आत्मविश्वास की ओर अग्रसर है। आर्थिक सुधारों, जी-20 की अध्यक्षता, डिजिटल इंडिया और वैश्विक मंचों पर निर्णायक उपस्थिति ने भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया है। नई शिक्षा नीति, कौशल विकास मिशन, स्टार्टअप इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे कार्यक्रम भारतीय युवा को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर रहे हैं।
कूटनीति में भारत अब ‘नम्र अनुरोध’ की बजाय ‘स्मार्ट एक्टिविज्म’ के साथ आगे बढ़ रहा है। भारत अब रूस-यूक्रेन से लेकर इस्राएल-ईरान, क्वाड से ब्रिक्स, ग्लोबल साउथ से यूएन सुरक्षा परिषद तक में समान रूप से संवाद करता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के अनुसार, भारत अब ‘बहुस्तरीय संवादशीलता और रणनीतिक स्पष्टता’ के साथ कार्य कर रहा है।
भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अब संकीर्ण नहीं, बल्कि समावेशी चेतना के रूप में पुनर्जीवित हुआ है। यह वह राष्ट्रबोध है जो भाषा, पंथ, जाति से परे सभी भारतीयों को जोड़ता है। यही बोध हमें विभाजन की विभीषिका से उबरकर पुनः अखंडता और आत्मबल की ओर ले जा रहा है।
भारत विभाजन एक ऐतिहासिक त्रासदी थी। यह राजनीतिक असफलता, वैचारिक भ्रम और नेतृत्व की असमंजसता का परिणाम थी। किन्तु आज का भारत इस त्रासदी से सीख लेकर एक सजग, सशक्त और सांस्कृतिक रूप से चेतन राष्ट्र बन रहा है। भविष्य के भारत की भूमिका निर्णायक होगी, न केवल दक्षिण एशिया में शांति व स्थिरता के लिए, बल्कि विश्व को एक आध्यात्मिक और नैतिक नेतृत्व देने के लिए भी। विभाजन की स्मृति को विस्मृत करने की बजाय, प्रेरणा बनाना ही भारत के भविष्य की कुंजी है। त्रासदी के इस इतिहास के कई आयाम (पृष्ठ 5 से 16) भी हैं और उसके साथ ही आश्वस्त करते भारत की आहट (पृष्ठ 20) सुनी जा सकती है।
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