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नाबालिगों के यौन संबंध और पॉक्सो: कानूनी और सामाजिक बहस

सुप्रीम कोर्ट में पॉक्सो कानून के तहत सहमति की आयु 18 से 16 करने की मांग पर बहस। केंद्र सरकार ने बदलाव से इनकार किया। जानें पूरा मामला।

Written byडॉ अजय खेमरियाडॉ अजय खेमरिया
Aug 10, 2025, 02:01 pm IST
in विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट में निपुण सक्सेना बनाम संघ के विचाराधीन मामले की सुनवाई चल रही है। देश की पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल और न्याय मित्र इंदिरा जय सिंह ने कोर्ट के सामने दलील दी है कि सहमति से यौन रिश्तों की आयु सीमा लड़कियों के लिए 18 से घटाकर 16 कर दी जानी चाहिए। इससे पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ भी सार्वजनिक रूप से ऐसा ही आग्रह केंद्र सरकार से कर चुके हैं।

मेघालय, मद्रास, बॉम्बे, कर्नाटक और मप्र समेत अन्य हाईकोर्ट भी इसी लाइन पर केंद्र सरकार से पाक्सो कानून में बदलाव के लिए कहते रहे हैं। यूनिसेफ इंडिया ने कुछ समय पूर्व एक ऐसी ही रिपोर्ट में दावा किया था कि देश में पाक्सो कानून युवाओं को अपराधी बना रहा है। हालांकि, बाद में इस रिपोर्ट को वापिस ले लिया गया। अभी देश में पाक्सो अधिनियम लागू है जिसके तहत सहमति से यौन रिश्तों के लिए 18 साल की आयु निर्धारित है। इससे कम के सभी मामले अपराध की श्रेणी में गिने जाते हैं।

पॉक्सो कानून में बदलाव नहीं करेगी केंद्र सरकार

केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में स्पष्ट रूप से इस बात को दोहराया है कि सहमति से यौन रिश्तों की आयु सीमा घटाने का उसका कोई विचार नहीं है और अदालतों को इस मामले में हस्तक्षेप से बचना चाहिए। जाहिर है मौजूदा सरकार आंदोलनजीवी एनजीओ और इनसे जुड़े कानूनविदों के दबाब में कोई निर्णय नहीं करने जा रही है। असल में पाक्सो कानून 2012 में निर्भया कांड के बाद अस्तित्व में आया है और इसका उद्देश्य नाबालिगों को यौन शोषण से बचाना है। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट यह सुनिश्चित करने की लगातार कोशिश कर रहा है कि युवाओं को पाक्सो कानून के तहत यौन रिश्तों के लिए जेल नहीं जाना पड़े। इसके लिए युवा मन के रोमांटिक रिलेशनशिप को आधार बनाया जा रहा है।

इंदिरा जयसिंह का तर्क

पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट में एमिकस क्यूरी इंदिरा जय सिंह ने कहा कि यौन स्वायत्तता मानव गरिमा का हिस्सा है और किशोरों को अपने शरीर के बारे में विकल्प चुनने की क्षमता से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14,15,19 एवं 21 का उल्लंघन है। उन्होंने पिछले तीन साल में पाक्सो केसों में 180 प्रतिशत के उछाल और दोषसिद्धि की घटती दर का हवाला देकर आयु सीमा घटाने की मांग की। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि एक तरफ सरकार लड़कियों के विवाह की आयु 18 से बढ़ाकर 21 करने पर विचार कर रही है क्योंकि बाल विवाह निषिद्ध कानून के प्रभावी होने के बावजूद देश में इनकी संख्या कम नहीं हो रही है। जाहिर है केवल कानून से समाज में बुराइयों का खात्मा नहीं हो जाता है।

क्या कहते हैं NCRB के आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि देश में नाबालिग बेटियों के साथ यौन अपराध करने वाले 50 फीसदी उनके आसपास के कुटुम्बीजन या पहचान वाले ही होते हैं। ऐसे में अगर सहमति से यौन संबंधों की आयु घटा दी जाती है तो पारिवारिक-सामाजिक दबाब में शिकायतों की संख्या नगण्य ही रह जायेगी। सच्चाई यह है कि सहमति की आड़ में वयस्क आदमी नाबालिग लड़कियों से व्यभिचार करेंगे और इस कथित सहमति के संबंधों की परिणति से पैदा हुए बच्चे क्या अवैध नहीं कहलायेंगे? विदेशी धार्मिक सामाजिक मान्यताओं में यह स्थिति स्वीकार्य हो सकती है परंतु भारत में दैहिक आजादी के नाम पर किशोरी मां बनी लड़कियों का जीवन कैसा होगा इसकी कल्पना करना कठिन नही है। तथ्य यह है कि संवैधानिक ढांचा स्पष्ट रूप से इस कानूनी धारणा का समर्थन करता है कि 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति यौन गतिविधियों के लिए वैध सहमति देने में असमर्थ है।

लड़कियों के विवाह की उम्र 18 वर्ष करने का उद्देश्य

लड़कियों के विवाह की आयु 18 निर्धारित किये जाने का उद्देश्य भी यही था। 1889 में भारत में आयु सीमा 11 वर्ष थी, जिसे 1891,1925,1940 और 2013 के संशोधनों के जरिये 18 तक लाया गया है। देश में अभी मताधिकार, ड्रायविंग लाइसेंस, चुनाव लड़ने की आयु 18 से कम नहीं होने का कारण भी यही है कि इससे कम आयु को निर्णयन के लिए परिपक्व नहीं माना गया है। आयु संबन्धी इस विमर्श को विधायी और कानूनी शक्ल में आगे बढ़ाने वाला देश का वही अभिजन वर्ग है जो मूलतः अंग्रेजी में सोचता है और उसकी दृष्टि सेक्युलर होकर एक बड़े दबाव समूह के रूप में विधायिका, कार्यपालिका और यहां तक न्यायपालिका को भी नीतिगत रूप से प्रभावित करती रही है।

प्रगतिशीलता की आड़ में सांस्कृतिक मानबिंदुओं को खंडित करने की कोशिश

बुनियादी रूप से इस विषय को समझने के लिए इसकी पृष्ठभूमि को जानना भी जरूरी है। जो भारतीय व्यवस्था में एनजीओ, सेक्युलरिज्म, उदारता औऱ प्रगतिशीलता की आड़ में समाज के सांस्कृतिक मानबिन्दुओं को दशकों से खंडित, प्रदूषित और ध्वस्त करने की संगठित कोशिश में सलंग्न है। सहमति से शारीरिक रिश्तों की आयु सीमा 16 करने  का नैरेटिव भी इसी का हिस्सा है। दावा किया जा रहा है कि बच्चों को भी 16 साल में रोमांटिक प्रेम की आजादी के साथ जीने का अधिकार होना चाहिए। पॉक्सो कानून की सख्ती के कारण भारत में 16 से 18 साल के युवाओं के रोमांटिक रिश्तों का अपराधीकरण हो रहा है।

भारतीय लोकसंस्कृति 25 साल तक ब्रह्मचर्य की करती है वकालत

यह भी समझना होगा भारत की लोकसंस्कृति  25 साल तक ब्रह्मचर्य आश्रम की वकालत करती है और 1925 में महात्मा गांधी ने बाकायदा यंग इंडिया में लेख लिखकर यह कहा था कि मैं 25 साल की आयु की महिला को ही विवाह संबन्धों के लिए योग्य स्वीकार करूंगा। वस्तुतः भारतीय लोकजीवन, इसकी संयमित और कर्तव्यबोध केंद्रित जीवनचर्या के विरुद्ध पिछले 70 साल से एक संगठित तंत्र पूरी व्यवस्था पर हावी होकर काम करता रहा है। ताजा नैरेटिव इसी इकोसिस्टम का हिस्सा भर है। पिछले कुछ सालों में देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में ऐसी याचिकाओं की संख्या बढ़ी है जो पॉक्सो एक्ट के आयु से जुड़े प्रावधान को इसलिए हटवाना चाहते है क्योंकि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ के लिए परेशानी का कारण बन गया है।

क्या कहता है मुस्लिम लॉ

मुस्लिम लॉ कहता है कि बालिका जैसे ही रजस्वला होगी वह विवाह के योग्य मानी जायेगी। कभी यह आयु 15 साल थी लेकिन आज बदलती जीवनशैली में इसे 12 भी माना जाता है। किसी बालिका की इस आयु को सुरक्षित औऱ जबाबदेह यौन संबंधों के लिए क्या कोई समाज खुद को सभ्य और सुसंस्कृत कह सकता है? सवाल यह भी है कि सहमति से यौन संबंधों की आयु 16 करने के दायरे में कौन सी भारतीय लड़कियाँ आएंगी। क्या हमारे समाज में यौन रिश्ते कभी इस उन्मुक्तता के स्तर पर रहे हैं जहां परिवार में 16  साल के बाद बेटियों को यौन संबन्धों के लिए खुली आजादी रही हो।

यह ठीक वैसा ही दुराग्रही आख्यान है जो शाहबानों पर चुप रहता है या ट्रिपल तलाक में सत्ता का फासीवादी एवं साम्प्रदायिक चेहरा तलाश लेता है। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और लव जिहाद के आरोपियों को एक विधिक गलियारा उपलब्ध कराना भी इस आख्यान का मूल मन्तव्य है।

इंडिपेंडेंट थाट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मदन बी लोकूर एवं दीपक गुप्ता की पीठ यह स्पष्ट कह चुकी है कि उनकी राय में 18 साल से कम आयु की लड़की के साथ यौन संबन्ध बनाना बलात्कार है चाहे वह विवाहित हो या नहीं। वैसे पाक्सो को लेकर युवाओं के अपराधीकरण के दावे प्रामाणिक नहीं है क्योंकि डेटा एविडेंस फॉर जस्टिस रिफॉर्म के सहयोग से विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा जारी एक  रिपोर्ट “ए डिकोड ऑफ पॉक्सो” में पिछले दस सालों में दर्ज 4 लाख प्रकरणों के अध्ययन में रोमांटिक लव से जुड़े आरोपियों का आंकड़ा 20 फीसदी से भी कम बताया गया है।

जाहिर है मामला थिंक टैंकों की प्रमाणिकता और उनके हिडन एजेंडे से भी सीधा जुड़ा है। इंग्लैंड में लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन ने कुछ समय पूर्व जारी एक शोध में बताया था कि 40 फीसद लड़कियां एवं 26 फीसद लड़कों ने यह स्वीकार किया है कि उन्होंने 16 साल में यौन संबन्ध बनाकर एक भूल की थी। यह उस इंग्लैंड का मिजाज है जहां शारीरिक संबन्धों के लिये 16 साल आयु को मान्यता मिली है। भारत में  युवा यौन इच्छाओं के अपराधीकरण के तर्कों को स्थानीय परिवेश,स्वास्थ्य,पोषण औऱ सामाजिकी के संदर्भ में समझने की आवश्यकता सभी स्तरों पर है।

( लेखक जुबेनाइल जस्टिस बोर्ड के पूर्व सदस्य हैं)

(ये लेखक के स्वयं के विचार हैं, आवश्यक नहीं कि पाञ्चजन्य उनसे सहमत हो)

Topics: नाबालिग यौन संबंधconsent ageNCRB dataSupreme Courtसुप्रीम कोर्टPOCSO ActChild marriageपॉक्सो कानूनसहमति की आयुइंदिरा जयसिंह
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