राजशाही के पाबा उपजिला में सौतलपारा गांव में बारनोई नदी के तट पर बसे वनवासी हिन्दू परिवारों के लिए 6 अगस्त 2025 का दिन दुख और डर लेकर आया। बारह आदिवासी परिवारों के घर, जो पानी विकास बोर्ड (डब्ल्यूडीबी) की जमीन पर बने थे, एक स्थानीय बीएनपी कार्यकर्ता के नेतृत्व में हुए हमले में नष्ट हो गए। इस घटना ने न केवल इन परिवारों की जिंदगी उजाड़ दी, बल्कि सामाजिक सौहार्द पर भी सवाल उठाए।
आदिवासी बस्ती का दर्द
सौतलपारा में बारनोई नदी के तट पर बनी इस बस्ती में बारह परिवार रहते थे। इनमें सात संथाल, चार धानगर (ओरांव), और एक रबिदास समुदाय का परिवार शामिल था। इन परिवारों ने लगभग पांच साल पहले डब्ल्यूडीबी की जमीन पर अपने छोटे-छोटे घर बनाए थे। ये लोग मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालते थे। लेकिन उनकी यह छोटी-सी दुनिया तब बिखर गई, जब पड़ोस में रहने वाले बीएनपी कार्यकर्ता मोहम्मद बबलू ने उनकी बस्ती पर हमला करवाया।
हमले की शुरुआत
बबलू को लंबे समय से इस बात से नाराजगी थी कि आदिवासी परिवारों ने उसके खेत के सामने, डब्ल्यूडीबी की जमीन पर अपने घर बनाए। हालांकि यह जमीन बबलू की नहीं थी, फिर भी वह इसे अपनी जमीन मानता था। 6 अगस्त की सुबह बबलू और बस्ती के लोगों के बीच किसी बात को लेकर झड़प हुई। यह छोटी-सी तकरार दिन चढ़ते-चढ़ते हिंसक हमले में बदल गई। दोपहर में एक बार और फिर शाम को दूसरी बार, बबलू के साथ आए लोगों ने बस्ती पर हमला बोला।
हिंसा और लूटपाट
हमले इतने भयावह थे कि सभी परिवार अपनी जान बचाने के लिए घर छोड़कर भाग गए। घरों को तोड़ा गया, सामान लूट लिया गया या नष्ट कर दिया गया। इस अफरा-तफरी में एक बुजुर्ग महिला, अमला दासी, पीछे छूट गईं। अमला अपनी उम्र और कमजोरी की वजह से चल नहीं सकती थीं। वे अपने दामाद के घर इलाज के लिए आई थीं, लेकिन हमले के दौरान परिवार को उन्हें छोड़कर भागना पड़ा। भीड़ ने अमला दासी के साथ बेरहमी से मारपीट की, जिससे उनकी हालत और बिगड़ गई।
डर के साये में जिंदगी
हमले के बाद बस्ती के लोग डर के मारे इधर-उधर छिपे हुए हैं। उनकी जिंदगी अनिश्चितता के भंवर में फंस गई है। स्थानीय प्रशासन ने अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है, जिससे लोगों का डर और गुस्सा और बढ़ गया है। बस्ती में सन्नाटा पसरा है, और जो घर कभी हंसी-खुशी का ठिकाना थे, वे अब मलबे में तब्दील हो चुके हैं।

















