‘सुशासन संवाद : ओडिशा की उडान’ के दूसरे सत्र ‘संघ, समाज और सोच’ में प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक श्री जे. नंदकुमार से वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा ने बात की। उस चर्चा में श्री नंदकुुमार द्वारा व्यक्त विचार इस प्रकार हैं
आज संपूर्ण भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक कोई विचार है तो वह विचार है हिंदुत्व। यदि हमें भारत को फिर से विश्वगुरु बनाना है तो इसके लिए जिस मूल विचार, जिस सशक्त दर्शन की आवश्यकता है वही हिंदुत्व के नाम से जाना जाता है। लेकिन विडम्बना है कि पिछले कई वर्ष से, वास्तव में तो अनेक शताब्दियों से हिंदुत्व को, हमारे दर्शन को आगे आने से रोका गया। क्यों? क्योंकि बाहर से आए आक्रांताओं, औपनिवेशिक शक्तियाें ने मिलकर हिंदुत्व को दबाने की कोशिश की थी। लेकिन आज हिंदुत्व के पुनर्जागरण की आवश्यकता को सामान्य समाज भी पहचानने लगा है। यह जागरण काल है।

जागरण का काल
एक छोटा सा उदाहरण देता हूं। हाल ही में प्रज्ञा प्रवाह के नेतृत्व में हमने एक इंटर्नशिप कार्यक्रम की घोषणा की थी। हमारा विचार था कि 25 इंटर्न्स को शोध के लिए चुना जाए। मैं इसे अपने ट्विटर हैंडल पर भी साझा किया। आश्चर्य है कि हमने एक सप्ताह का आवेदन समय निर्धारित किया था, लेकिन उसी दिन शाम तक भारी संख्या में आवेदन आ गए। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आज का युवा ‘हिंदुत्व’ जैसे गहन विषयों पर शोध और विचार करना चाहता है। यह एक नई चेतना का आरंभ है। और यह चेतना, केवल शाखाओं या संस्थाओं तक सीमित नहीं, यह समाज के प्रत्येक स्तर तक पहुंच रही है। यही हिंदुत्व का वर्तमान युग है-जागरण का युग। हमें कुल 528 आवेदन प्राप्त हुए, विषय था ‘हिंदुत्व’, ‘स्व’ और भारत’। सामान्य धारणा यह है कि युवाओं के मन में इन विषयों को लेकर कोई विशेष उत्साह या जिज्ञासा नहीं है। लेकिन सच यह है कि आज के युवाओं के मन में इन विषयों के प्रति श्रद्धा है। हमने केवल 25 इंटर्न लेने की योजना बनाई थी, उसे बदलकर हमने सभी 528 युवाओं को इस दो महीने की इंटर्नशिप में सम्मिलित किया। चिन्मय मिशन के संस्थापक स्वामी चिन्मयानंद जी अक्सर कहा करते थे: ‘युवा निष्क्रिय नहीं हैं, उन्हें सही दिशा में सक्रिय किया ही नहीं गया है।’ और यह बात आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। कुछ लोग जानबूझकर युवाओं के मन में कृत्रिम बाइनरी खड़ी करते हैं, जैसे: “हिंदुत्व बनाम हिंदुइज़्म”, “आधुनिकता बनाम परंपरा”, “राष्ट्रवाद बनाम सेकुलरिज़्म”। ये सभी शब्द बौद्धिक भ्रम फैलाने के लिए रचे गए हैं। लेकिन आज का युवा भ्रमित नहीं है, वह भ्रम से मुक्त होना चाहता है। उसे अगर सही जानकारी, स्पष्ट वैचारिक मार्गदर्शन मिले तो वह न केवल समझता है, बल्कि नेतृत्व के लिए आगे भी आता है।
यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है कि ‘समाज के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती क्या है? ‘नाकारा बताए जाने वाले’ युवाओं को ‘कर्तव्यशील’ बनाना? या उन झूठे विमर्श को तोड़ना जो मुख्यधारा मीडिया में बार-बार परोसे जाते हैं? मेरा मानना है कि ये दोनों कार्य समान रूप से आवश्यक हैं। हिंदुत्व को लेकर एक संगठित दुष्प्रचार किया गया है। उसे आक्रामक, कट्टर या विभाजनकारी विचार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेकिन संघ और उससे जुड़े संगठनों ने निरंतर प्रयास किए हैं कि यह भ्रम दूर हो, स्पष्ट हो कि हिंदुत्व एक सकारात्मक, समन्वयकारी और सार्वभौमिक चेतना है। आज की चुनौती यही है-युवाओं को भ्रम से निकालकर यथार्थ से जोड़ना। उनकी ऊर्जा का सार्थक उपयोग करना। यदि यह मार्गदर्शन ईमानदारी से किया जाए, तो भारत का युवा ही हिंदुत्व के नवजागरण का वाहक बनेगा।
आज की वैचारिक बहस में एक कृत्रिम ‘बाइनरी’ खड़ी की जाती है-“राइटिस्ट बनाम लेफ्टिस्ट”। लेफ्टिस्ट को प्रोग्रेसिव, लिबरल, सेक्युलर, डेमोक्रेटिक बताया जाता है। पर राइटिस्ट की परिभाषा बना दी गई है हिंदुत्ववादी, नेशनलिस्ट, पिछड़ी सोच वाले, अंधविश्वासी। इसी तरह एक और ‘बाइनरी’ गढ़ी गई-हिंदुत्व बनाम हिंदूइज़्म। हमें हिंदूइज्म शब्द से आपत्ति नहीं है, लेकिन जब हिन्दुत्व को गलत ठहराकर हिंदूइज्म को “सभ्य” बताया जाने लगे, तब सवाल उठता है। जो लोग पहले कहते थे, “Thank God I’m not a Hindu, Call me anything but don’t call me Hindu. I’m a Muslim by culture, Christian by education, and accidentally born a Hindu.” आज वही लोग “Hinduism is fine, Hindutva is dangerous” जैसे नैरेटिव बना रहे हैं।
हिंदुत्व और हिंदूइज्म में अंतर
इकोसिस्टम कैसे बदलता है, देखिए-एक खास वर्ग, सोच के व्यक्ति ने एक किताब लिखी-“Why I am not a Hindu”. कुछ साल बाद उसी सोच के एक अन्य व्यक्ति ने किताब लिखी-“Why I am a Hindu”. पहले नकार, फिर स्वीकार-यह बदलाव हिंदू चेतना की वापसी का प्रमाण है। आज कुछ बुद्धिजीवी “हिंदू” शब्द को लेकर भ्रम फैलाते हैं। ‘दलित एक्टिविस्ट’ कांचा इलैया ने Why I am not a Hindu किताब लिखी, फिर कुछ साल बाद कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने किताब लिखी, Why I am a Hindu. लेकिन थरूर साफ कहते हैं-“मैं विवेकानंद का हिंदू हूं, सावरकर या श्री गुरुजी का नहीं।” यानी वे हिंदूइज्म को स्वीकारते हैं, पर हिंदुत्व को नहीं।
वे इसे ‘पॉलिटिकल’ और ‘कम्युनल’ बताकर खारिज करते हैं। जब हिंदूज्म बनाम हिंदुत्व की बाइनरी बनाई गई, तब ज़रूरी लगा कि इसे स्पष्ट किया जाए: “इज्म” क्या है? यह है closed book of thought, जिसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता-जैसे कम्युनिज़्म, इस्लाम। लेकिन हिंदुत्व की विशेषता है-सतत आत्मसुधार। यह एक जीवंत और गतिशील दर्शन है, जो तर्क और प्रमाण के आधार पर बदलता और बढ़ता है। जैसे शंकराचार्य ने कहा-अगर श्रुति भी कहे कि बर्फ ताप देती है, तो भी अगर वह तर्कसंगत न हो, उसे नहीं मान। यही हिंदुत्व का सार है-तर्क, प्रमाण, सुधार और समावेश।
प्रज्ञा प्रवाह का प्रयास है कि युवा पीढ़ी के सामने इस जीवंत हिंदुत्व को समझाया जाए, ना कि उसे ‘इज्म’ के जड़ और सीमित खांचे में कैद किया जाए। लोग “Why I Am a Hindu” जैसी किताबें लिखकर खुद को हिंदू तो कहते हैं, लेकिन हिंदुत्व से दूरी बनाते हैं। यह कोई बौद्धिक ईमानदारी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की कमी है। जो लोग अपने ही मूल को नकारते हैं, वे या तो मानसिक रूप से भ्रमित हैं, या आत्मविश्वास विहीन वर्ग से आते हैं। हिंदुत्व की विशेषता क्या है? आत्मसुधार का रवैया। न कि आत्म-हीनता या आत्म-निंदा का। साहसी चिंतन-परिवर्तन ही हिंदुत्व की आत्मा है।
अंधश्रद्धा नहीं, तर्कपूर्ण सुधार
स्वामी विवेकानंद ने रूढ़ियों की खुलकर आलोचना की थी। संघ और प्रज्ञा प्रवाह जैसे संगठन भी आत्मसुधार की इसी परंपरा आगे बढ़ाते हैं। वे परंपरा के नाम पर अंधश्रद्धा नहीं, तर्कपूर्ण सुधार का समर्थन करते हैं। संघ के तृतीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस जी ने पुणे में वसंत व्याख्यानमाला में स्पष्ट कहा था:“If untouchability is not a sin, then there is no sin in the whole world. जातिवाद समूल नष्ट होना चाहिए-lock, stock and barrel.” हिंदुत्व हीनता, पराजयवाद नहीं देता, यह आत्मगौरव और आत्मविश्वास की विचारधारा है। एक ईसाई पादरी फादर एंथनी एलंजीमिटृम ने 1951 में किताब लिखी-“Philosophy And Action of RSS For The Hind Swaraj”. उन्होंने संघ की आध्यात्मिक शक्ति की सराहना की। वे केरल के थे, उन्होंने हिंदुत्व, बौद्ध, जैन, गांधी आदि विचारधाराओं पर गहरा अध्ययन किया था। 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उनकी यह निष्पक्षता और बौद्धिक ईमानदारी साहसिक थी, लेकिन इसके कारण उन्हें अपने ही इकोसिस्टम में आलोचना झेलनी पड़ी थी।
सवाल है: इतनी बौद्धिक संपदा होने के बावजूद, क्या संघ ‘जनसंपर्क’ या ‘पीआर’ में कमजोर रहा? फादर एंथनी ने 35 वर्ष की उम्र में (1951 में) वह किताब लिखी थी। उन्होंने “Ideology” नहीं, “Philosophy and Action” कहा। “Hind Swaraj” शब्द जानबूझकर चुना। यह गांधी जी की भाषा थी। यह किताब उस समय लिखी जब नेहरू सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगाया था। उनके 99.90 प्रतिशत लेखन का केंद्र-बिंदु हिंदुत्व ही रहा। बाद में वे डोमिनिकन पादरी बने और ईसाई मत को ‘आध्यात्मिक पथ’ के रूप में देखने लगे। शब्दावली का चयन विमर्श के युद्ध में अत्यंत महत्वपूर्ण है। फादर एंथनी ने यही समझकर शब्दों का चुनाव किया था। 1945 में गांधी जी ने नेहरू को पत्र लिखा: ‘अब जब स्वतंत्रता मिलनी तय है, तो भारत के भविष्य-राजनीतिक, आर्थिक, औद्योगिक-की दिशा की योजना बनानी चाहिए।’ उन्होंने लिखा कि उनकी कल्पना “हिंद स्वराज” की है और ‘कांग्रेस ने इसे नीति रूप में अपनाया है।’ गांधी जी के पत्र पर नेहरू जी का उत्तर चौंकाने वाला था: उन्होंने गांवों को पिछड़ा और जीर्ण बताया। कहा कि, भारत को गांवों से नहीं, शहरीकरण के रास्ते आगे बढ़ाना होगा। आगे नेहरू जी ने लिखा: “कांग्रेस ने कभी भी हिंद स्वराज को नहीं अपनाया।” यह जवाब गांधीवादी फादर एंटनी के मन को गहरी चोट पहुंचा गया। वे गांधी के हिंद स्वराज के असली वाहक की तलाश में संघ से जुड़े, और उन्होंने 1949 1960 तक ‘आर्गेनाइजर’ में नियमित लेख लिखेे। नि:संदेह एक ईसाई पादरी फादर एंथनी ने यह एक विस्फोटक पुस्तक लिखी है, जो भविष्य की वैचारिक दिशा का पूर्वानुमान था।

कांग्रेस-कम्युनिज्म ‘असाध्य रोग’
फादर एंथनी ने लिखा, “कांग्रेस एक ऐसा रोग है जिसकी कोई दवा नहीं, वह मृत्युशैया पर है।” कम्युनिज्म को भी खारिज करते हुए उन्होंने कहा, “यह केवल भौतिकवाद पर आधारित है, इसलिए इसका कोई दीर्घकालिक भविष्य नहीं।” उन्होंने स्पष्ट कहा,“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही एकमात्र संगठन है जो गांधी जी के ‘हिंद स्वराज’ के विचार को यथार्थ में लागू कर सकता है।”
‘छद्म पंथनिरपेक्षता’ शब्द का सबसे पहला प्रामाणिक प्रयोग फादर एंथनी ने 1951 में उक्त पुस्तक में पांच बार किया है। उनका मत था: “नेहरू और कांग्रेस की विचारधारा भारत को सांस्कृतिक आत्मघात की ओर ले जा रही है।” यह पुस्तक विजयादशमी के दिन प्रकाशित हुई थी। इसकी पहली समीक्षा दिसंबर 1951 में ऑर्गेनाइज़र में छपी, जो शायद के.आर. मलकानी या आडवाणी जी द्वारा लिखी गई थी। समीक्षा को लेकर एक आपत्ति यह थी कि ‘पुस्तक में नेहरू और कांग्रेस की अत्यधिक आलोचना की गई है, जबकि संघ का सिद्धांत प्रारंभ से ही आलोचना नहीं, रचनात्मक कार्य और सकारात्मक विचारों पर केंद्रित रहा है’।
प्रचार नहीं, बुनियाद पर ध्यान
संघ ने शुरू से ही ‘पीआर’ और प्रचार को प्राथमिकता नहीं दी। उसका ध्यान रहा-शाखा विस्तार, व्यक्ति निर्माण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण पर। जब कुछ लोगों ने श्री गुरुजी से कहा कि संघ प्रचार नहीं करेगा तो समाप्त हो जाएगा, तब उन्होंने शांत भाव से उत्तर दिया: “अगर संघ समाप्त भी हो जाए, तो मैं फिर पांच बच्चों के साथ ‘मोहिते का बाड़ा’ में शाखा शुरू कर दूंगा। पुनश्च हरि ओम्।” संघ का प्रारंभिक दृष्टिकोण स्पष्ट था-“काम आगे जाने दो, बात पीछे आने दो”-यह डॉ. हेडगेवार की स्थायी सोच थी। आज जब दुनिया मीडिया संचालित हो चुकी है, और तथ्यों की जगह ‘बातें गढ़ी’ जा रही हैं, तब भी संघ अपनी मूल्याधारित कार्यपद्धति पर अडिग है। एक कार्यक्रम में एक कांग्रेस के नेता ने व्यंग्य में पूछा: “Who is that fool who says this is a Hindu Rashtra?” तो डॉक्टर हेडगेवार उठे और बोले: “I am that fool.”
वैचारिकता और व्यक्ति निर्माण
संघ की विशिष्ट कार्यपद्धति और बल है शाखा के माध्यम से चरित्र निर्माण, राष्ट्र को केंद्र में रखकर सांस्कृतिक पुनर्जागरण करना और बिना आक्रोश के विचारों की दृढ़ता। यही संघ की शक्ति रही है। आज भी संघ “प्रसिद्धि” नहीं, बल्कि प्रभाव की ओर उन्मुख है। इसीलिए वह न रुका है, न रुकेगा। डॉ. हेडगेवार ने उस कांग्रेसी नेता को स्पष्ट कहा-भारत हिंदू राष्ट्र था, है, और रहेगा। उन्होंने किसी प्रचार माध्यम का सहारा नहीं लिया, कोई विज्ञप्ति या विज्ञापन नहीं दिया, पर हर शाखा में वैचारिक निर्माण की वही ज्योति प्रज्ज्वलित की। दत्तोपंत ठेंगड़ी, दीनदयाल उपाध्याय, एकनाथ रानाडे जैसे सैकड़ों स्वयंसेवक इसी शाखा से निकलेे।
संघ का साहित्य
रामायण, महाभारत, गीता, विवेकानंद साहित्य ही तो हमारे बुनियादी ग्रंथ रहे। संघ का विचार हिंदू विचार है। अलग से कुछ नया खड़ा करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। श्री मुकुल कानिटकर जी जैसे विचारकों ने ठीक कहा कि “विमर्श का युग” आ गया है। संघ अब इस वैचारिक युद्ध के लिए भी पूरी तैयारी कर रहा है-भारत में ही नहीं, विश्वभर में।
नई शिक्षा नीति और इतिहास का सच
अब जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति आई है, तो ध्यान रखें कि यह नई नहीं, राष्ट्रीय है। बुकर पुरस्कार विजेता नाइजीरियाई लेखक बेन ओकरी ने कहा था:“To poison a nation, poison its history.” जब इतिहास झूठा हो जाता है, तो पीढ़ियां नैराश्यपूर्ण हो जाती हैं। फिर वे खुद अपना झूठा इतिहास अगली पीढ़ियों को पढ़ाती हैं। हमारे देश में यही हुआ। आर्य-द्रविड़ सिद्धांत, मुगलों को ‘उद्धारकर्ता’ बताना, हिंदू समाज को आपस में लड़ाना-यह सब उसी झूठे इतिहास की उपज हैं। अब समय है उस इतिहास को सत्य से प्रतिस्थापित करने का। हमें केवल नीति नहीं, सही विमर्श भी गढ़ना होगा। आज इतिहास को फिर से लिखना केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुका है। हमें सिखाया गया, इस्लाम यानी शांति। “चूना भी सफेद है, शक्कर भी सफेद है, इसलिए दोनों एक हैं”-ऐसे बचकाने तर्क हमारे इतिहास में डाले गए। बाबर ‘महान’! अकबर ‘उदार’! और औरंगजेब को ‘सेक्युलर’ कहा गया! क्या यही सच है? क्या हमारी आने वाली पीढ़ी को ये झूठ पढ़ाया जाना चाहिए? क्या उन्हें करिकाल चोल का नाम नहीं पता होना चाहिए? एक ऐसा महान राजा जिसने 2000 वर्ष पूर्व कावेरी डेल्टा में पत्थरों का बांध बनवाया-जो आज भी काम कर रहा है! क्या हमें यह नहीं जानना चाहिए कि चोल साम्राज्य ने हजार वर्ष तक तमिल संस्कृति की ध्वजा लहराई? अभी हाल में प्रधानमंत्री जी तमिलनाडु गए, तो उन्होंने उस गौरव को सामने रखा जिसे दशकों तक छुपाया गया था। हमारे बच्चों ने पहली बार चोल वंश का नाम सुना। उत्तर पूर्व का गौरव: अहोम साम्राज्य : हमें यह नहीं बताया गया कि अहोम साम्राज्य ने न कभी अंग्रेजों को अपनी भूमि पर पैर रखने दिया, न मुगल आक्रमणकारियों को। उनका इतिहास क्यों गायब किया गया? हमें सिर्फ मीर जाफर और क्लाइव पढ़ाया गया। लक्ष्मीबाई, सावरकर, सुभाष बोस जैसे सब हाशिये पर डाल दिए गए!
जेम्स मिल और इतिहास का जहर
इस ऐतिहासिक विष का बीज कहां से पड़ा? जेम्स मिल, जिसे आज भी भारत के इतिहास लेखन का “जनक” कहा जाता है, उसने लिखा-“मैं कभी भारत गया नहीं हूं, न मुझे संस्कृत आती है, न तमिल, न कोई भारतीय भाषा। यही मेरी योग्यता है।” और आज भी उसी की किताबें कॉलेजों में पढ़ाई जा रही हैं-तारकचंद से लेकर रामिला थापर तक, सब उसी औपनिवेशिक जहर को दोहराते रहे हैं। क्या इस ज़हर का इलाज नहीं होना चाहिए? आज जब एनसीईआरटी पुस्तकों में बदलाव किए जा रहे हैं, तो शोर मचाया जाता है-“इतिहास से छेड़छाड़ मत करो!” पर प्रश्न है कि-क्या पहले जो इतिहास लिखा गया, वह सही था? या वह भी एक सोची-समझी रणनीति थी, भारतीय आत्मगौरव को तोड़ने की?
संघ का बौद्धिक कार्य और 2047 की दृष्टि
एक प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या संघ का बौद्धिक कार्य उसके संगठनात्मक कार्यों की तुलना में पीछे रह गया है? मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं-नहीं! डॉ. हेडगेवार से लेकर बाबासाहब आपटे तक, संघ के शुरुआती प्रचारकों ने सावरकर के “छह स्वर्णिम पृष्ठ” स्वयं हाथ से लिखकर प्रचारित किए। आज अभाविप हो, राष्ट्रीय सेविका समिति, पाञ्चजन्य या ऑर्गनाइज़र-संघ हर क्षेत्र में बौद्धिक युद्ध का नेतृत्व कर रहा है। हम 2047 की ओर देख रहे हैं। जब भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष होंगे, तब वह मानसिक रूप से भी स्वतंत्र हो, हम यही सुनिश्चित कर रहे हैं।
परिवर्तन के संकेत
कुछ लोगों को आज का परिवर्तन असहज करता है। वे डरते हैं, कहते हैं-“संघ यह नहीं करता, वह नहीं करता…”। पर संघ किसी को जवाब नहीं देता। संघ एक हाथी की तरह चलता है। कुत्ते भौंकते हैं, पर हाथी चलता रहता है। भारत सोने की चिड़िया नहीं, सोने का शेर बनेगा। और वह शेर अब उठ चुका है। आज आवश्यकता है कि हम झूठे इतिहास को चुनौती दें, सच्चे नायकों को सामने लाएं, बौद्धिक नेतृत्व को मज़बूत करें और 2047 के भारत को वैचारिक रूप से स्वतंत्र बनाएं। यह काम आज दिशा और गति, दोनों पा चुका है। भारत अब रुकेगा नहीं।
















