बांग्लादेश: एक वर्ष में क्या पाया? महिलाओं और छात्रों के सपने टूटे, मजहबी कट्टरता बढ़ी
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बांग्लादेश: एक वर्ष में क्या पाया? महिलाओं और छात्रों के सपने टूटे, मजहबी कट्टरता बढ़ी

आंदोलनकारी स्त्रियों और युवाओं को यह आस थी कि अब उन्हें फासीवाद से मुक्ति मिलेगी और उनके लिए रोजगार की लाइन लग जाएगी। लेकिन, सपने टूट गए।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Aug 3, 2025, 01:09 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
Bangladesh Muhammad Yunus economic crisis

मोहम्मद यूनुस

5 अगस्त 2025 को बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार को गिरे हुए पूरा एक वर्ष हो जाएगा। और इस एक वर्ष में महिलाओं और छात्रों के तमाम सपने टूटे। पिछले वर्ष इन दिनों कथित क्रांति की तमाम तस्वीरें साझा की जा रही थीं और साथ ही यह कहा जा रहा था कि नया बांग्लादेश जन्म लेने जा रहा है। अब फासीवाद का पतन होगा और बांग्लादेश में आजादी आएगी।

अंतत: 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़कर जाना पड़ा और वे तब से भारत में हैं और बांग्लादेश अब कथित प्रगतिशील नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस के हाथ में है। मोहम्मद यूनुस के बांग्लादेश की बागडोर सम्हालने के बाद आंदोलनकारी स्त्रियों और युवाओं को यह आस थी कि अब उन्हें फासीवाद से मुक्ति मिलेगी और उनके लिए रोजगार की लाइन लग जाएगी। यह आंदोलन एक प्रकार से महिलाओं का भी आंदोलन था। आंदोलनकारी लड़कियों ने यह कई बार बताया था कि वे अपने-अपने हॉस्टल्स से रात भर सड़कों पर आंदोलनकारियों के साथ रहती थीं, नारे लगाती थीं।

क्या आस हुई पूरी?

सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि क्या ये तमाम सपने पूरे हुए? गार्डियन ने कई ऐसी महिलाओं से बात की जिन्होंने इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई थीं, उन्होंने बताया कि कैसे सपने टूटे हैं। इस आंदोलन में भाग लेने वाली छात्रा फातिमा ने गार्डीयन से बात करते हुए कहा कि कैसे यह आंदोलन महिलाओं का आंदोलन बन गया था। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन ने सरकार, जबावदेही और महिलाओं के अधिकारों पर प्रश्न उठाए थे, जो अनुत्तरित थे। मगर उन्हें संबोधित करने के स्थान पर, लोगों ने अपने-अपने राजनीतिक मार्गों पर ध्यान देना आरंभ आकर दिया।

इसे भी पढ़ें: मुसलमानों को खुश और हिंदू आबादी को कमजोर करने के लिए गढ़ा हिंदू आतंकवाद का झूठा नैरेटिव

महिलाओं की भागीदारी हुई शून्य

उन्होंने कहा कि कुछ समय बाद माहौल इतना विषाक्त हो गया था कि आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी तेज़ी से कम होने लगी। हाल ही तक, वह स्टूडेंट अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन की प्रवक्ता थीं, जो छात्र क्रांति का नेतृत्व करने वाला संगठन था। और उन्होंने कहा कि अगर महिलाओं को केवल प्रतीकात्मक रूप से शामिल किया जाएगा तो उनके पास कोई ताकत नहीं होगी और इसके परिणामस्वरूप बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसे मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा क्योंकि बांग्लादेश की मौजूदा सत्ता संरचना में, महिलाओं को दोयम माना जाता है।

ट्रांसजेंडर मॉडल त्रिआना हाफ़िज़ को भी यह उम्मीद थी कि नए बांग्लादेश में ट्रांसोफोबिक घृणा कम होगी और एक समावेशीकरण का माहौल उत्पन्न होगा। परंतु हाफ़िज़ का कहना है कि “पिछले एक साल में भेदभाव और भी बदतर हो गया है, राजनेता खुलेआम ट्रांसफ़ोबिक नफ़रत फैला रहे हैं।”

युवाओं के टूटे सपने

महिलाओं और ट्रांसजेंडर लोगों के साथ ही युवाओं के भी सपने टूट रहे हैं। टेलीग्राफ ने तमाम आंकड़ों के साथ यह बताया है कि कैसे बांग्लादेश में बेरोजगारी बढ़ रही है। इसमें लिखा है कि “अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, लगभग 30% बांग्लादेशी युवा न तो रोज़गार में हैं, न ही स्कूल या प्रशिक्षण में हैं। साथ ही, लगभग 23% युवतियाँ बेरोज़गार हैं, जबकि 15% युवा पुरुष बेरोज़गार हैं – और पिछले साल के विरोध प्रदर्शनों में युवतियों की व्यापक भागीदारी देखी गई।“ इसमें लिखा है कि पिछले वर्ष हुए इस आंदोलन में हर वर्ग की भागीदारी थी। स्नातक विद्यार्थी जो सरकारी नौकरी चाह रहे थे और साथ ही कपड़ों के कर्मचारी और गुब्बारे विक्रेता तक, सभी एक आस में थे कि उनके दिन आंदोलन के बाद बहुरेंगे।

सरकार निर्वाचित होगी, तभीं आएंगी नौकरियां

टेलीग्राफ ने ढाका यूनिवर्सिटी में डेवलपमेंट स्टडीस के प्रोफेसर अल महमूद तितुमीर का कहना है कि नौकरियां तभी पैदा हो सकती हैं, जब निवेश हो और निवेश तभी आएगा जब मुल्क में एक निर्वाचित सरकार आएगी। उन्होनें कहा कि “जब हमारे पास एक स्थिर नीति व्यवस्था होगी, तो अधिक निवेश होगा, और इससे स्नातकों और महिलाओं सहित युवाओं के लिए आवश्यक नौकरियां पैदा होंगी।”

नौकरियों के लिए हुआ था आंदोलन

यह आंदोलन सरकारी नौकरियों के लिए हुआ था। मगर यह जॉब बाजार का बहुत ही छोटा हिस्सा है। टेलीग्राफ कहता है कि पिछले वर्ष 18,000 सरकारी नौकरियां उपलब्ध थीं, मगर नौकरी चाहने वाले 2 मिलियन युवा लोग थे। बांग्लादेश में वस्त्र निर्माण एक बड़ा बाजार है, मगर यह सामने आया है कि कैसे पिछले वर्ष की अस्थिरता से वस्त्र निर्माण के कई कारखाने बंद हो चुके हैं। और बेक्सिमको ग्रुप के स्वामित्व वाले कई कारखाने भी बंद हो चुके हैं, जिनमें लगभग 40,000 श्रमिक कार्यरत थे।

पिछली सरकार के समर्थकों को जिस प्रकार से निशाना बनाया जा रहा है, उसने भी श्रम बाजार पर असर डाला है। राजनीतिक परिवर्तन के कारण कई वे लोग भी अपने कारखाने बंद कर चुके हैं, जो पिछली सरकार के नजदीकी थे। एक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता अरमान हुसैन ने बताया कि कई कारखाने के मालिक जो पिछली सरकार के नजदीकी थे, वे गिरफ़्तारी के डर से काम बंद कर चुके हैं और छिपे बैठे हैं।

आशाएं टूटीं

हुसैन का कहना है कि उन्हें यह आशा थी कि अंतरिम सरकार का कहना है कि वह रोजगार परक कौशल शिक्षा भी प्रदान करेगी और नौकरियों का सृजन भी करेगी। आवश्यकता है कि निजी क्षेत्रों मे निवेश हो, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में कम हो चुका है। लोग कह रहे हैं कि उन्हें अपेक्षा थी कि रोजगार बढ़ेंगे, महिलाओं की सुरक्षा आदि पर ध्यान दिया जाएगा, परंतु ध्यान केवल और केवल राजनीतिक सत्ता को हासिल करने के लिए दिया जा रहा है।

जो भी हालात बांग्लादेश के उभर कर आ रहे हैं, उनसे यही प्रमाणित हो रहा है कि शेख हसीना की सरकार जाने के बाद कट्टरता बढ़ रही है और इस तथ्य को वे लोग भी मान रहे हैं, जिन्होनें इस कथित आंदोलन में भाग लिया था।

(डिस्क्लेमर: ये लेखिका के स्वयं के विचार हैं, आवश्यक नहीं कि पाञ्चजन्य उनसे सहमत हो।)

Topics: नौकरियांशेख हसीना तख्तापलटकट्टरताSheikh Hasina coupBangladeshरोजगारemploymentjobsबांग्लादेशमुहम्मद यूनुसMuhammad Yunusradicalism
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