बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के सत्ता पर काबिज होने के बाद लोकतंत्र से मजहबी राज्य बनते जा रहे उस देश में कट्टरपंथ बढ़ रहा है। अमेरिकी थिंक टैंक गेटस्टोन इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट ने इस दिशा में आगाह करते हुए गंभीर चिंता जताई है। यह अमेरिकी रिपोर्ट न केवल इस्लामी मुल्क में बदलते जा रहे उस देश में राजनीतिक अस्थिरता की ओर इशारा करती है, बल्कि देश के कभी पंथनिरपेक्ष रहे ढांचे पर मंडराते खतरों को भी उजागर करती है।
अगस्त 2024 में शेख हसीना को सत्ता से बाहर करने के बाद नोबुल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनाई गई थी। तथाकथित छात्र आंदोलन की उपज इस सरकार में यूनुस को आगे रखकर दुनिया को ऐसा दिखाने की कथित कोशिश की गई कि बांग्लादेश सरकार अब एक बहुत ‘समझदार’ व्यक्ति के हाथ में है। लेकिन तब जो आशंका व्यक्त की जा रही थी, आज वह इस रिपोर्ट से सत्य होती दिख रही है कि उन ‘नोबुल विजेता अर्थशास्त्री’ ने देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठानों को अस्थिरता और मजहबी उन्माद के शिकंजों में जाने दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, उनके शासनकाल में बांग्लादेश राजनीतिक अराजकता, कट्टर इस्लामवाद और सामाजिक विभाजन की आशंकाएं सिर चढ़ कर बोल रही हैं।

वहां गत वर्ष जून—जुलाई में छात्रों के नेतृत्व में हुए तीखे विरोध प्रदर्शनों के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ था, जिसका लाभ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी जैसी इस्लामवादी पार्टियों को मिला। इससे पंथनिरपेक्ष अवामी लीग कमजोर हुई और कट्टरपंथी ताकतों को खुला मैदान मिल गया।
गेटस्टोन की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि यूनुस सरकार के दौरान हिज्ब-उत-तहरीर जैसे संगठन ‘खलीफा राज’ की वकालत कर रहे हैं। हिफाजत-ए-इस्लाम जैसे देवबंदी समूह महिला अधिकारों के खिलाफ हैं। जमात-चार मोनाई के नेता मुफ्ती फैजुल करीम ने तालिबान-शैली के इस्लामी शासन की मांग की है। यूनुस सरकार इन मांगों पर मौन है, जो या तो उनकी कमजोरी दर्शाता है या इस्लामीकरण के प्रति मौन समर्थन की ओर संकेत करता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उस देश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले बढ़े हैं। 2024 में चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में चकमा समुदाय के 100 से अधिक घर और दुकानें जला दी गईं, लेकिन सेना और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। यह सरकार की नैतिक विफलता और संभावित मिलीभगत को दर्शाता है।
यूनुस सरकार मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में असफल रही है। सामान्य मुद्रास्फीति 10.87 प्रतिशत और खाद्य मुद्रास्फीति 14 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जिससे आम जनता की आवश्यक वस्तुएं खरीदने की ताकत जाती रही है। आर्थिक सुधार की उम्मीदें अब एक दूर का सपना बन गई हैं।

इसके साथ ही, रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि यूनुस ने भारत से दूरियां बनाते हुए विस्तारवादी चीन व मजहबी उन्मादी तथा आतंकवाद की नर्सरी जिन्ना के इस्लामी देश, पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाई है। भारत पर बाढ़ जैसी समस्याओं के लिए दोषारोपण करना उनकी कूटनीतिक नासमझी को दर्शाता है। इससे भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव बढ़ा ही है।
गेटस्टोन इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बांग्लादेश के वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर एक गंभीर चेतावनी देती है। यूनुस सरकार के नेतृत्व में कट्टरपंथी ताकतों का उभार, अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिन्दुओं पर हमले, आर्थिक संकट और भारत से दूरी जैसी बातें बांग्लादेश को एक असफल राज्य बनने की ओर धकेल रहे हैं। यदि यह चलन जारी रहा, तो न केवल बांग्लादेश की पंथनिरपेक्ष पहचान खतरे में पड़ेगी, बल्कि कट्टर इस्लामी गुट वहां सिर चढ़कर बोलेंगे और दक्षिण एशिया ही नहीं, दुनिया के लिए पाकिस्तान जैसा एक बड़ा खतरा बन जाएंगे।

















